कैसा होगा पंद्रहवीं लोकसभा का अंतिम अध्याय?

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संसद का शीतकालीन सत्र शुरू हो गया है और साथ ही लोकसभा के चुनाव की उलटी गिनती भी. एक तरफ यूपीए सरकार के लिए यह अंतिम मौक़ा है लुभावने चुनावी बिल लाने का तो दूसरी तरफ विपक्ष उसे ऐसा करने से रोकना चाहेगा. 12 दिन का यह सत्र कैसा रहने वाला है इस पर एक नजर डालें तो हालत बहुत अच्छे नहीं नजर आते.

संसद के काम करने के दिन तेजी से कम हो रहे हैं. एक ओर जहाँ 50 और 60 के दशक में संसद 120 से 140 दिन काम करती थी वहीँ अब यह बहुत कम हो गया है. इसके अलावा भी जितने दिन संसद में काम होता है उनमे से कितने दिन हंगामे की भेंट चढते हैं और कितने दिन वाकई काम होता है यह किसी से छुपा नहीं है. यह सुझाव बार बार दिया जाता है कि दुनिया के दूसरे लोकतन्त्रों की तरह संसद के कामकाज के न्यूनतम दिन तय किये जाएँ लेकिन कभी भी बात साधारण चर्चा से आगे नहीं बढ़ पाती है. संसदीय सुधार प्रशासनिक सुधारों की शुरूआती कड़ी माने जाते हैं लेकिन इन सुधारों को लेकर कोई उत्साह अब तक विधायिका की तरफ से दिखाई नहीं दिया है.

अक्सर यह होता है कि संसद के हर सत्र में कोई एक मुद्दा छाया रहता है और पूरा सत्र बर्बाद हो जाता है. जैसे मौजूदा लोकसभा का एक पूरा सत्र केवल इस बात की भेंट चढ़ गया था कि स्पेक्ट्रम आवंटन पर संयुक्त संसदीय समिति का गठन किया जाए या नहीं. उसके बाद के दो सत्रों में लोकपाल और कोल ब्लाक आवंटन का मामला छाया रहा. संसद में मुद्दों का छाया रहना अच्छी बात है लेकिन इसके लिए बहुत से जरूरी विधेयक लटक जाना किसी भी सरकार और लोकतंत्र के लिए अच्छे संकेत कतई नही कहे जा सकते. मौजूदा सत्र में कौन सा मुद्दा छाया रहेगा या इस सत्र में कोई काम होगा यह तो जल्दी ही सबके सामने होगा लेकिन आम मतदाता अब अपने प्रतिनिधियों को कुछ गंभीर काम करते हुए देखना चाहता है.

पंद्रहवीं लोकसभा का यह आखिरी सत्र है क्योंकि आगामी सत्र में केवल लेखानुदान पास होगा और अगला पूर्ण बजट अगली सरकार ही पेश करेगी. गठबंधन सरकार को इस वक्त कुछ कड़े कदम उठाने की जरूरत है ताकि उसकी दरकती हुई नींव में कुछ मिटटी बची रह सके. अगर अभी तक लंबित पड़े बिलों पर नजर डालें तो पता लगता है कि 122 विधेयक अटके पड़े हैं. 15वीं लोकसभा का कार्यकाल पूरा होते ही सभी विधेयक निरस्त हो जायेंगे, केवल उन विधेयकों को छोड़कर जो राज्यसभा में अटके हुए हैं.

एक बात साफ़ है कि डायरेक्ट टैक्स कोड और जीएसटी जैसे महत्वपूर्ण विधेयकों पर कोई फैसला नहीं होने वाला. बीमा क्षेत्र में विदेशी पूँजी के निवेश को लेकर कोई फैसला हो सकता है जिसका असर पेंशन विधेयक पर पड़ेगा क्योंकि पेंशन विधेयक में निवेश की सीमा तय नहीं है बल्कि केवल यह लिखा हुआ है कि यह बीमा विधेयक के बराबर होगी. इसके अलावा मानव संसाधन विकास मंत्रालय के 13 विधेयक भी अटके हुए हैं. इसमे एजुकेशन ट्रिब्यूनल से लेकर इनोवेशन यूनिवर्सिटी जैसे महत्वपूर्ण विधेयक भी शामिल हैं लेकिन मंत्रालय की सुस्त रफ़्तार को देखते हुए कोई उम्मीद नहीं पाली जा सकती.

न्यायिक गुणवत्ता व जवाबदेही विधेयक और जजों की नियुक्ति के लिए संविधान संशोधन विधेयक पर सभी दलों ने सहमति दिखाई है लेकिन अभी तक ज्यादा कुछ इस मामले में हो नहीं पाया है. देखना होगा कि इस बार भी नेता आपसी दंगल में उलझे रहते हैं या न्याय की आस में बैठे करोड़ों भारतीयों को कुछ मिल पायेगा. इसके अलावा संसद की स्थायी समिति ने भी इन बिलों में कुछ बदलाव करने की सिफारिशें दी हैं.

अगर भ्रष्टाचार के खिलाफ लोकपाल विधेयक, व्हिसलब्लोअर प्रोटेक्शन एक्ट, मनी लौन्डरिंग विधेयक, बेनामी ट्रांजेक्शन जैसे विधेयक इस सत्र में पास होते हैं तो सबको अच्छा लगेगा लेकिन ऐसा होने की उम्मीद कम है. अगर इन बिलों पर कुछ हो पाया तो यह इस लोकसभा का अंतिम सुखद अध्याय कहा जाएगा क्योंकि ऐसे दौर में जब आम मतदाता के मन में विधायिका के अकर्मण्य होने की धारण घर करती जा रही है जनप्रतिनिधियों का कुछ काम करना जरूरी है.

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About Satish Sharma

Satish Sharma is Editor, Hindi of Awaz Aapki. Writes in many News Papers & Magazines as Columnar, Analyst. Like to work as Citizen Journalist. Doing his bit of work in raising voice of unheard. Currently he is managing two shows of Awaz Live TV named Mashal and Manthan also.

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