क्या होगा 2014 के बाद का आर्थिक भविष्य

narendra modi

किसी भी देश में आर्थिक और राजनैतिक परिद्रश्य एक दूसरे के हमराह चलते हैं और भारत में भी यह बात कोई अपवाद नहीं है। यूपीए दो के नीतियों के मामले में ढुलमुल रवैय्ये के कारण अर्थव्यवस्था में निराशाजनक माहौल है। ऐसे में बाजार की सभी शक्तियों की निगाह 2014 के चुनावों की ओर लगी है जहाँ बाजार को कम से कम यह आश्वस्ति है कि मौजूदा सरकार के आने की संभावना न के बराबर है। हाल ही में पांच राज्यों में हुए चुनावों के नतीजों में भी जन-आक्रोश की झलक साफ़ दिखाई दी। बात लोकसभा चुनावों की करें तो बड़े बदलाव इन्तजार में हैं, भले ही ये बदलाव केंद्र में कांग्रेस की सरकार हटने को लेकर हों या एक नवोदित पार्टी द्वारा लोकसभा चुनावों में बड़ी पार्टियों को चुनौती देने को लेकर हों। लेकिन अभी के हालात में राजनैतिक पंडितों की मानें तो केंद्र में नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा की गठबंधन सरकार बनने की संभावना प्रबल है।

ऐसे में यह सवाल महत्वपूर्ण हो जाता है कि क्या नरेन्द्र मोदी का आर्थिक विजन और विकास का गुजरात मॉडल भारतीय अर्थव्यवस्था को कोई नई दिशा दे सकता है या नहीं? इसके लिए गुजरात मॉडल को भारत के सन्दर्भ में परखना जरूरी है। इस बात में कोई दो राय नहीं है कि गुजरात में व्यापार के नजरिये से अच्छा माहौल है और वहां के सेवा और कृषि क्षेत्र में भी उत्साह का माहौल है। लेकिन साथ ही साथ हमें यह भी याद रखना होगा कि गुजरात की विकास दर हमेशा से देश के मुकाबले अधिक रही है और गुजरात ही पूरे भारत में अकेला ऐसा देश है जहाँ स्व-रोजगार को नौकरी के मुकाबले वरीयता दी जाती है। इसके अलावा भी प्राकृतिक संसाधनों और अनुकूल परिस्थितियों के कारण हमेशा से गुजरात की आर्थिक विकास दर देश के मुकाबले अधिक रही है। ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि क्या मोदी का गुजरात मॉडल उन राज्यों के लिए कारगर होगा जहाँ प्राकृतिक संसाधन नहीं हैं?  यही सवाल देश के उन 275 जिलों के बारे में भी है जहाँ माओवाद की समस्या है।

इसके अलावा भी गुजरात मॉडल को ध्यान से देखें तो वहां बड़े व्यवसाय अधिक हैं और यह लगभग नेहरु के बड़े उद्योगों को लेकर अत्यधिक प्रेम जैसा ही है जिसमे माना जाता था कि छोटे व्यवसाय बड़े उद्योगों के साथ खुद ही उग आते हैं जबकि समय के साथ यह प्रमाणित हुआ है कि यह धारणा बिलकुल गलत है। ऐसे में क्या मोदी का विकास मॉडल लम्बे समय तक टिक पायेगा या यह पूँजीवाद का और घृणित रूप हमारे सामने लेकर आयगा?

इसके साथ साथ यह सवाल भी महत्वपूर्ण है कि 2014 में यदि मोदी सरकार बना पाने में सफल होते हैं तो उनके गठबंधन में साथी कौन होंगे? यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि गठबंधन सरकार में मोदी के नेतृत्व में चलती सरकार के कई फैसले साथी दलों के अनुसार होंगे जिनमे से सब्सिडी कम करना या ख़त्म करना एक होगा। मौजूदा वित्तीय वर्ष में यदि वित्त मंत्री राजकोषीय घाटे को 4.5% के दायरे में लाने में सफल हो भी जाते हैं तो भी आने वाले समय में अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों और भारत के आयात बिल का सीधा असर जीडीपी ग्रोथ पर पडेगा जिसके लिए तेल सब्सिडी कम करने जैसे कड़े फैसले लेने होंगे। क्या मोदी यह कर पायेंगे? यदि कर पाए तो क्या भारत का उम्मीदें पाले बैठा निम्न और मध्यम वर्ग उनसे यूँ ही प्रेम जताएगा?

इसके अलावा गुजरात में व्यवसायियों के लिए उत्साहजनक माहौल होने का मुख्य कारण उनके लिए भूमि इत्यादि मूलभूत सुविधाओं का एकदम उपलब्ध होना है। लेकिन भूमि अधिग्रहण बिल की मौजूदगी में और क्षेत्रीय दलों के सामने क्या यह मुमकिन हो पायगा?
इसके अतिरिक्त भी खाद्य सुरक्षा बिल जैसी लोकलुभावन योजनाओं को रोकना या उन्हें चलाने का फैसला करना मोदी के लिए अग्नि परीक्षा जैसा ही होगा। क्योंकि इन योजनाओं को चालू रखना जहाँ अर्थव्यवस्था के लिये नुकसानदेह होगा वहीं इस प्रकार की योजनाओं को बंद या सीमित करना मानव संसाधन विकास के लक्ष्य में बाधा बनेगा।

कुल मिलाकर 2014 के बाद भी किसी बड़े चमत्कार की उम्मीद करना बेमानी होगी ख़ास तौर पर जब भाजपा के नेतृत्व में केंद्र सरकार भी कमोबेश उन्हीं नीतियों को लागू करने वाली हैं जिनके कारण आम जनता मौजूदा सरकार से निराश है। मोदी की केवल एक खासियत है जिसके दम पर गोल्डमैन सैच जैसी संस्था भी अपनी रिपोर्ट में मोदी के प्रधानमंत्री बनने की दशा में आशाजनक हालात होने की भविष्यवाणी करता है, वह खासियत है त्वरित निर्णय लेने की क्षमता। देखना है यह खासियत दिल्ली से भारत की तस्वीर को कितना बदल पाती है।

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About Satish Sharma

Satish Sharma is Editor, Hindi of Awaz Aapki. Writes in many News Papers & Magazines as Columnar, Analyst. Like to work as Citizen Journalist. Doing his bit of work in raising voice of unheard. Currently he is managing two shows of Awaz Live TV named Mashal and Manthan also.

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