हथियार और हम

gun 1नई सरकार आने पर हमें पता लगा है कि हमारा देश भारत विश्व में सबसे अधिक हथियार आयात करने वाला देश है अर्थात हम दुनियां में सबसे अधिक हथियार खरीदने वाले देश हैं .हम सबसे अधिक हथियार क्यों खरीद रहे हैं इसके कारण हमें ज्ञात नहीं हैं .सरकार इसके कारण हमें नहीं बतलाती है .रक्षा से जुड़ा विषय होने के कारण आर टी आई के अंतर्गत भी इस विषय में जानकारी सरकार से नहीं ली जा सकती है .

सरकार का कहना है कि हम हथियार नहीं बनाते हैं इसलिए हमें विदेशों से हथियार आयात करने पड़ते हैं . हम हथियार क्यों नहीं बनाते हैं ? इस सवाल के जवाब में सरकार का कहना है कि आजकल हथियार निर्माण के लिए नई तकनीक और अनुसंधान की आवश्यकता होती है जिस के लिए हमारे पास संसाधन और पूंजी नहीं है इसलिए नए हथियार खरीदना हमारी प्राथमिकता नहीं मजबूरी है .

इस हथियार खरीद पर रहस्य का इतना मोटा पर्दा पड़ा है कि समझ ही नहीं आता कि जो खरीदा जा रहा है वह हथियार है या कुछ और ही है .अगुस्ता हैलीकॉप्टर को ही लें . यह सेना के लिए खरीदे जाने वाला हथियार था या मंत्रियों को ऊंचाई पर घुमाने का उड़न खटोला .या इटली के व्यपारियों को पैसा देने और लेने के लिए लिया एक उपकरण मात्र ही था .एन. डी .ए सरकार में भी उस अंधरे में देखने वाली दूरबीन को खरीदने के लिए सब ललचा रहे थे जो कहीं थी ही नहीं .

जब भारत द्वारा परमाणु विस्फोट किया गया था तब कहा गया था कि अब हम परमाणु बम बना लेंगे उसके बाद हमें परंपरागत हथियारों की जरूरत नहीं होगी . क्योंकि यह परमाणु बम हमारे लिए एक अवरोधक ( डेटेरेनट ) के रूप में काम करेगा .इसका मतलब था कि शत्रु देश ,यह जान कर कि इनके पास परमाणु बम हैं हम पर हमला ही नहीं करेगा .इस तर्क पर सरकार को खुद भरोसा नहीं था .इसलिए हथियार खरीदने का काम पहले की तरह लगातार जारी रहा .

अब नई सरकार को शक्तिशाली बनना और दिखाना है तो जरूरी है कि उसके पास ऐसे आधुनिक और इतनी मात्रा में हथियार होने चाहिए जिन से कमजोर या विरोधी डरें .हथियार खरीदने के लिए अब सरकार के खजाने में अकूत पैसा नहीं है .फिर एक गरीब देश कब तक अपनी नागरिकों कल पेट काट कर हथियार खरीदता रहेगा .सरकार ने इस समस्या का हल यह निकला है कि हम अपने यहाँ हथियारों के निर्माण का काम शुरू करें .

सरकार यह चाहती अब रक्षा उत्पादन में निजी क्षेत्र का भी सहयोग लिया जाय .भारत के उद्योगपति इस घोषणा से गदगद हैं .सरकार रक्षा क्षेत्र का इतनी तेजी से विकास चाहती है कि उसने अपने राष्ट्रीय बजट में रक्षा उत्पादन में विदेशी कंपनियों को १००% की एफ डी आई की अनुमति दे दी है .वे चाहें तो खुद आकार अपने पूर्ण स्वामित्व वाले उद्योग लगा लें या किसी भारतीय कम्पनी के साथ साझेदारी में उद्योग लगा लें .सरकार देश को हथियार निर्माण के हब के रूप में विकसित करना चाहती है .जिस से लोगों को रोजगार मिलेगा और हमें हथियार निर्माण की उन्नत तकनोलॉजी मिलेगी और हम विदेशी मुद्रा भी अर्जित कर सकेंगे .

अचरज होता है कि कोई भी सरकार के इस विचार का विरोध नहीं कर रहा है .हमारे पास आत्मरक्षा के लिए पर्याप्त मात्र में हथियार हों इसका सभी समर्थन करते हैं और करना भी चाहिए. इस तर्क को आगे बढ़ा कर यहाँ तक लाया जा सकता है .कि हम इतने शक्तिशाली हो कि दुश्मन ,हम पर हमला करने से पहले यह सोचे कि अगर मैंने हमला किया तो बाद में मेरा क्या हाल होगा . परमाणु अस्त्रों को लेकर वाजपेयी सरकार ने यही नीति अपनाई थी .कि ये परमाणु बम हमारी आत्मरक्षा के लिए हैं हम किसी भी देश पर पहला आणुविक हमला नहीं करेंगे.

किन्तु नई सरकार की हथियार निर्माण की यह सोच वास्तव में नई है जो भारत के स्वभाव और संस्कार से मेल नही खाती है .आदि काल से हमारी यह पहचान रही है कि हम हमलावर देश नहीं रहे हैं हम आत्मरक्षा में ही हथियार उठाने वाले देश रहे हैं . इस देश में बौद्ध और जैन परम्परा का व्यापक प्रभाव है जिस के मूल में ही अहिंसा है .यह धारा आधुनिक काल में महात्मा गांधी तक आती है जिस की अहिंसा ने देश को आजादी और दुनियां में एक पहचान दिलवाई .

वह भारत जिस का आधार और पहचान सत्य और नैतिकता हैं .आज अपने को हथियार निर्माण के हब के रूप में विकसित करना चाहता है .हमें ध्यान देना चाहिए कि हथियार कोई कृषि उपकरण नहीं हैं उस का एक ही उपयोग है कि उससे अनिवार्यता किसी को चोट पहुंचाई जायेगी या किसी की हत्या की जायेगी .कैसा लगेगा यह जानकार कि जिस गोली से किसी की हत्या हुई है उस पर मेड इन इण्डिया लिखा है .जिस ड्रोन के बम से किसी का घर या अस्पताल तबाह हो गया .वह भारत में बना था और उस पर अशोक चक्र अंकित था .फिर चाहे मरने वाला कोई भी क्यों न हो .

भारत आज आर्थिक रूप से पिछड़ा हुआ गरीब देश हो .जहाँ आधी आबादी भूखे पेट खुले आसमान के नीचे सोती है .मगर तब भी हम अपनी पहचान एक नैतिक और धार्मिक समाज के रूप में करते हैं .जहाँ पेट और रोटी के लिए इमान् नहीं बेचा जाता .हथियार निर्माण कर और बेच कर ,हो सकता है हम कुछ रोजगार पैदा कर लें .कुछ विदेशी मुद्रा बचा लें या कमा लें मगर इससे नैतिकता का जो ह्रास होगा उससे उबार पाना कठिन होगा . इस विकास की आंधी में न जाने हम अपना कितना पतन कर लेंगे .

अशोक  उपाध्याय

 

 

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