छात्र राजनीती में आशा की एक नई किरण जगाती छात्र युवा संगर्ष समिति

Student politics in delhi university AAPदिल्ली विश्वविद्यालय में भले ही छात्रसंघ के चुनाव छह महीने दूर हो, पर अभी से ही लगभग हर कॉलेज में टोपी लगाये हुए कुछ जोशीले छात्र-छात्राएँ बदलाव के लिए लड़ते हुए दिख ही जाते है, शायद दिल्ली विधानसभा के बाद अब दिल्ली विश्वविद्यालय में बदलाव की बारी है ।

दिसंबर 2012 के विरोध- प्रदर्शन से निकली छात्र युवा संगर्ष समिति को लेकर दिल्ली विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों में उत्साह की कमी नहीं है, और हो भी क्यों, आखिर यह वह जमात है जो न अन्ना आन्दोलन और न ही दिसंबर में हुयी क्रांति में पीछे रही है । इनके पास दफ्तर न हो, भले ही पर्चे छपवाने के लिए पैसे न हो पर दिल में बदलाव का जज्बा है और सर पर उम्मीदों का बोझ, शायद इसीलिए ही तो बाकी छात्र नेताओ में अभी से हलचल मच गयी है ।

भारत में छात्र राजनीती ने भी अलग अलग समय देखे है , एक ज़माने में छात्रों ने आज़ादी की लडाई में अपना अहम् योगदान दिया था, और साठ के दशक में छात्र राजनीती पर वामपंथ का कब्ज़ा रहा, इसी दशक के अंत में बंगाल के छात्र विद्रोह पर उतर आये और जादवपुर विश्वविद्यालय हो या फिर दिल्ली का सेंट स्तेफेंस कॉलेज, हर जगह चेयरमैन माओ की तस्वीरे दिख ही जाती थी । सत्तर के दशक में जब इंदिरा गाँधी की दमनकारी नीतियाँ अपने चरम पर थी, तब बिहार के छात्रों ने ‘छात्र संगर्ष समिति’ बनाकर देश बदलने की ठानी, और जयप्रकाश नारायण के नेत्रत्व में एक विशाल आन्दोलन खड़ा किया, उसके बाद छात्र राजनीती पतन की तरफ गयी, बीच में चंद्रशेखर ने इसे दिशा देने की कोशिश की, पर असफल रहे ।

इस समय भारत में छात्र राजनीती में तीन गुट ही सक्रिय है, पहला NSUI जो अब अपनी मूल पार्टी की तरह हो गया है, भ्रष्ट, वंशवादी, और भी बहुत कुछ, हालत यह है की किसी के पास भी इनकी तारीफ में गालियाँ कम नहीं पड़ती । दूसरा ABVP जो सिर्फ अराजकता में ही विश्वास रखता है, कहीं भी तोड़ फोड़ करनी हो या हिन्दू मुस्लमान करना हो ये लोग हमेशा आगे रहते है । तीसरे, वामपंथी छात्र संगठन है जो अब भी जिन्दा रहने की कोशिश कर रहे है, जिनके पास जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय के आलावा कुछ बचा नहीं है और वहां भी इतने सालों के बाद कुछ ख़ास बदलाव नहीं करा पाए ।

छात्र राजनीती में भी मुख्यधारा की राजनीती की तरह नए विकल्प के लिए जगह है, समस्याएं भी वही है और शायद समाधान भी वही हो । शायद जिस तरह आम आदमी पार्टी इतिहास लिख पायी है, छात्र युवा संगर्ष समिति भी लिख पाए। अभी आगे का रास्ता आसान नहीं है, जिस तरह आम चुनावो में शराब बटती है, यहाँ पर भी फिल्मो के टिकेट या विदेशी कम्पनियों के बर्गर बटते है, गुंडागर्दी यहाँ भी है, चुनावो से दो तीन दिन पहले ही कैंटीन और आस पास की दुकाने तोड़ फोड़ के डर से अपने आप ही बंद हो जाती है, इन सबसे भी लड़ना होगा । पर आगे का रास्ता इतना मुश्किल भी नहीं, अरविन्द केजरीवाल जैसा सेनापती भी है, आम आदमी पार्टी के सबसे जुझारू कार्यकर्ता भी है, देश को बदलने का जज्बा भी है, अब तक इन्हें कौन रोक पाया है जो अब रोक पायेगा ।

Photo: http://www.thehindu.com/

Author is solely responsible for his/her views in article, Awaz Aapki may or may not subscribe to the views in this article

Share this:

PinIt
Top