‘आप’ का ऐतबार ?

kejriwal_newsmakerचुनाव की औपचारिक घोषणा होते ही जैसे स्टिंग आपरेशन्स के मौसम की भी अनौपचारिक घोषणा भी हो जाती है. कभी यह अवैध रूप से बंटती सीडी के रूप में सामने आता है कभी किसी चैनल के माध्यम से बिना जांच पड़ताल के लेकिन पूरी सावधानी से सम्पादित किये गये स्टिंग के रूप में. अपने शुरूआती दिनों में देशहित के लिए इस्तेमाल हुई खोजी पत्रकारिता की यह विधा भी धीरे धीरे जैसे नैतिक प्रदूषण का शिकार होती जा रही है. सबको एक लाइन में खड़ा करना शायद पूर्वाग्रहपूर्ण हो लेकिन अधिकतर स्टिंग अब केवल आपने विरोधियों के चरित्र हनन के द्वारा राजनैतिक फायदे के लिए किये जाते हैं. यही ताजा चुनाव में भी देखने को मिल रहा है.

कहने को चुनाव इस बार पांच राज्यों में हैं लेकिन जैसे सारा मीडिया और पूरा देश केवल दिल्ली की ओर आँख लगाये बैठा है. सारी बेचैनी, सारा उत्साह, सारे आरोप-प्रत्यारोप, सारी ईमानदारी, छल-कपट जैसे दिल्ली चुनाव में हथियार बन गए हैं. क्या है ये और क्यों? बदलाव की आहट से परेशान दो जमे जमाये दलों की प्रतिक्रिया? नई राजनीति से डरे पुराने राजनेताओं की घबराहट? मुद्दों को भटकाने की इस प्रक्रिया की शुरुआत हो चुकी है और हो सकता है कि आने वाले दिनों में राजनीति के स्तर में और गिरावट से दिल्ली और देश की जनता का परिचय हो.

अगर दिल्ली में स्टिंग आपरेशन के पीछे के घटनाक्रम को गौर से देखें तो यह केवल एक मीडिया चैनल द्वारा किसी राजनैतिक पार्टी का स्टिंग आपरेशन नहीं था. यह स्टिंग था उस यकीन को लेकर जो देश की आम जनता में लोकतंत्र को लेकर जगा है. यह स्टिंग उस विकल्प के खिलाफ था जो एक नई पार्टी देना चाहती है अभी तक भाई-भतीजावाद की पुरानी परिपाटी से हटकर. यह स्टिंग था उन बड़े मीडिया-उर्फ़-कारपोरेट हाउसेज का आम आदमी के खिलाफ जो विधानसभा को आम आदमी के लिए खोले जाने के वादे को लेकर डरे हुए हैं क्योंकि तब बंद कमरों में करोड़ों की लॉबिंग करके कानून पास कराना संभव नहीं होगा. यह स्टिंग था उस डरे हुए तंत्र का कुछ ईमानदार लोगों के खिलाफ जो इस स्टिंग के बाद भी ईमानदारी की इस अग्नि-परीक्षा से बिना झुलसे बाहर आये और बुझे हुए कोयले की राख अब साजिशकर्ताओं के चेहरे पर दिखाई दे रही है.

इस स्टिंग के बाद दिल्ली के चुनाव के बदले समीकरणों को लेकर भी तरह तरह के कयास लगाए जा रहे हैं. क्या होगा? क्या जनता अब भी वोट देगी? अब तो इन पर भी आरोप लग ही गया. अब तो ये भी हमारे जैसे ही हो गए तो इन्हें क्यों चुनोगे? हमें ही चुन लेना. किसी भी हमले के दौरान देश की आम जनता और सेना में जो एकजुटता दिखाई देती है लगभग वही स्थिति आज आम आदमी पार्टी कार्यकर्ताओं और समर्थकों की है. इसे उन लोगों की एकाएक बढती संख्या के रूप में देखा जा सकता है जो दिल्ली विधानसभाओं में काम करने जा रहे हैं. स्टिंग के तीसरे दिन यह आंकड़ा एकाएक तीन गुना हो गया है, जैसा कि एक पार्टी कार्यकर्ता ने बताया.

हर सिक्के के दो पहलू हैं और ऊंचे नैतिक मानदंडों पर खड़े आन्दोलन से बनी यह पार्टी भी कुछ पार्टी कार्यकर्ताओं की नाराजगी झेल रही है जिनके इस्तीफे की खबर सोशल मीडिया और तथाकथित मुख्यधारा के मीडिया में आ रही है. उनकी नाराजगी है कि जब स्टिंग आ गया था तो प्रत्याशी बदल देने चाहिए थे. भले ही स्टिंग झूठा क्यों न हो. ‘मीडिया सरकार’ को कानूनी कार्रवाई का डर दिखाना गलत है. लेकिन सोचिये क्या होता अगर महाभारत में छलिया कहे जाने वाले कृष्ण को पांडव अपना भगवान ना मानते? क्या होता अगर शिखंडी की मदद लेने का निर्णय उसके सद्कर्मों के बजाय उसके तथाकथित पौरुषत्व को आधार बनाकर किया जाता? क्या होगा अगर राजनैतिक जंग में आम आदमी पार्टी अपने सही साबित हुए प्रत्याशियों को भी बदल दे? शायद लोकतंत्र के इस उत्सव रुपी युद्ध में हार, जो अब यह देश सह नहीं सकता.

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