बस यूँ ही – राजनीति के मानदंड

leadersसन १९६४ की अलसाई सी दोपहर थी जब बिहार के मुख्यमंत्री के. बी. सहाय दिल्ली में जवाहर लाल नेहरु से मिलने पहुंचे थे. पीएम आवास पर अनौपचारिक मुलाक़ात थी लेकिन के. बी. सहाय को बीस मिनट तक इन्तजार करना पड़ा. नेहरु आये तो उन्होंने उलाहना भी दिया “नेहरु जी! दिल्ली और पटना के बीच दूरी लगातार बढ़ रही है शायद वरना बीस मिनट इन्तजार तो कभी नहीं किया गांधी की कर्मभूमि से आये दूत ने.”

नेहरु जी शर्मिन्दा भी हुए और जवाब भी दिया- “मैं दरसल अपने स्टडी रूम में था और एक नई किताब आई थी. आपके लिए वही किताब ढूँढने में मुझे बीस मिनट लगे अन्यथा यह गुनाह करने की हिम्मत नहीं है हमारी.”

यह कहते हुए नेहरु जी ने एक किताब सहाय जी की ओर बढ़ाई. तो सहाय जी ने किताब को एक नजर देखते ही कह दिया यह तो मैं पढ़ चुका हूँ. इसके बाद मुलाक़ात का लंबा वक्त किताब में दिए राजनैतिक सिद्धांतों पर चर्चा करते ही बीता.

गौर करने लायक बात यह है कि एक समय था जब हमारे राजनेता रोज के व्यस्त कार्यक्रम में भी एकांत में चिंतन मनन और स्वाध्याय के लिए कुछ वक्त निकालते थे तो राजनीति के मानदंड ऊँचे भी हुआ करते थे. फिर आज यह राजनीति इतनी गन्दी कैसे हो गई? आखिर आज कितने हैं जो राजनैतिक जोड़ तोड़ के अलावा सिद्धांतों की बात करते हों? कितने? सवाल यही है और जवाब भी……

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About Satish Sharma

Satish Sharma is Editor, Hindi of Awaz Aapki. Writes in many News Papers & Magazines as Columnar, Analyst. Like to work as Citizen Journalist. Doing his bit of work in raising voice of unheard. Currently he is managing two shows of Awaz Live TV named Mashal and Manthan also.

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