एक ही शौचालय

t2 दो अक्टूबर को गांधी जयंती के अवसर पर भारत सरकार में सचिव से लेकर अवर सचिव तक के अधिकारियों ने स्वछता की शपथ ली .नेताओं ने झाड़ू लगाते हुए अपनी तस्वीर खिंचवा ली. स्वछता अभियान आरम्भ करने के लिए यह एक सही कदम है .

भारत में शौचालय / मूत्रालय नहीं हैं या उनमें साफ़ सफाई नहीं होती यह अर्धसत्य है .आप देश के फाइव स्टार बने होटलों के शौचालयों, एयर पोर्ट पर बने शौचालयों, मल्टीप्लेक्स में बने सिनेमाघरों के शौचालयों को देखिए .उनकी साफ़ सफाई और चमचमाहट देखिए .वे आम आदमी के घरों से ज्यादा साफ़ सुथरे होते हैं .

प्रत्येक सरकारी कार्यालय में , उनमें काम करने वाले लोगों के लिए शौचालय होता है .स्त्री और पुरुष के लिए अलग अलग शौचालय होता है यह तो समझ आता है .किन्तु लगभग सभी कार्यलयों में अधिकारियों और कर्मचारिओं के लिए अलग अलग शौचालय होते हैं .ये अधिकारियों और कर्मचारिओं के लिए अलग अलग शौचालय क्यों होते हैं इस पर कोई सवाल नहीं करता .

एक अधिकारी अपने कार्यालय के क्लर्क के साथ मूत्र क्यों नहीं कर सकता .इसमें पद बीच में कहां आता है .दोनों इंसान हैं और दोनों मूत्रालय में एक जैसा ही काम कर रहे हैं .फिर कार्यालयों में अलग मूत्रालय क्यों बनाए जाते हैं .इस से भी आगे कार्यालय सबसे बड़े अधिकारी ,जिनके कमरे में दरवाजा खटखटा कर उनके सचिव से पूछ कर अंदर जाना होता है .उनके कमरे के साथ ही उनका अपना शौचालय होता जिसमें उनके अलावा कोई नहीं जा सकता . यह क्या सोच है ?

यह अंग्रजों के जमाने से चली आ रही सोच है .बड़ा अंग्रेज अफसर .अपने सामने दूसरे को इंसान नहीं मानता था और उसका अधीनस्थ अफसर अपने अधीनस्थ वैसा ही तुच्छ प्राणी मानता है .आज स्वत्रंत भारत में अधिकारी और क्लर्क दोनों सरकारी कर्मचारी हैं .जो एक टीम में मिल कर एक उद्देश के लिए काम कर रहे हैं यदि आप ऐसा समझते हैं तो आप सरकारी कार्यालयों के बारे में कम ही जानते हैं .

यह बीमारी सरकारी कार्यालयों तक सीमित हो ऐसा नहीं है .विश्वविद्यालयों और उनके कॉलिजों में प्राध्यपकों के लिए ,छात्रों और कर्मचारिओं के लिए अलग अलग मूत्रालय और शौचालय होते हैं .यही स्तिथि न्यायालयों की हैं जज साहब के लिए अगल .वकीलों के लिए अलग और और कोर्ट में आने वाले फरियादियों के लिए अगल मूत्रालय होते हैं .

यह गडबड हमारी सोच में ही है .हम अपने घर में काम करने आने वाले लोगों को अपना शौचालय इस्तेमाल नहीं करने देते .खुद के होटल में जाने के बाद साथ आया ड्राइवर कार में सो तो लेगा लेकिन सुबह क्या करेगा यह चिंता हमारी नहीं है .फिर वह सड़क किनारे या रेलवे लाइन पर ही जाएगा .

देश के लगभग आधे लोगों के पास रहने को घर नहीं है जो खुले आसमान के नीचे ,फुटपाथों पर ,तिरपालों के नीचे टप्परों में अपना जीवन जीते हैं .जिनको यह नहीं मालूम कि अगले दिन उन्हें या उनके बच्चों को खाना मिलेगा या नहीं .जो लगातार बीमारिओं से लड़ते हैं .सरकार को उनकी यह भुखमरी और गरीबी नहीं . उनका सामने आ कर शौच करना अखरता है .

शौच जीनव का सहज कर्म है .जिसके पास घर नहीं है वह खुले में आ कर सरकार का कोई विरोध नहीं कर रहा है वह जीवन का सहज कार्य कर रहा है .किन्तु सरकार को लगता है कि वह विरोधी है जो देश की छवि खराब कर रहा है .

सरकार को उसकी भुखमरी ,गरीबी से  ज्यादा  उसका खुले में शौच करना बुरा लग रहा है इसलिए गरीबी हटाने या घर बनाने से पहले शौचालय बनाना उसकी प्राथमिकता पर आ गया है .ऐसा लगता कि सरकार शौचालय बना कर इस निर्बल गरीब आदमी को नजर से छुपाना चाहती है .अब उसे ऐसी जगह रहना और बसना होगा जहाँ उसके लिए शौचालय होगा . आप समझ रहे हैं न .

हमारे देश के लोग अपने आप को महान धार्मिक आदमी मानते हैं जो यह मानते हैं सब में इश्वर विद्यमान है .सब सामान हैं .किन्तु विडंबना यह है कि इसी समाज और देश के लोग एक कार्यालय या किसी एक स्थान पर मूत्र त्याग तक एक स्थान पर नहीं कर सकते . उस तक में गैर बराबरी है . स्वछता समानता मानवता और धर्म तो बहुत दूर की बातें हैं.सब के लिए एक जैसे शौचालय हों क्या यह जरूरी नहीं है .

अशोक उपाध्याय

 

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