रंजीत सिन्हा ने गलत क्या कहा ? बात एहसास की है |

एक कार्यक्रम में सीबीआई डायरेक्टर रंजीत सिन्हा का बयान आया और इसके साथ ही मीडिया और समाज में एक बहस छिड़ गई. बहस में दो पक्ष थे, एक वे, जो मुखर रूप से महिला अधिकारों के पक्षधर थे और जिनका रंजीत सिन्हा के साथ साथ पूरे पुरुष समाज पर यह आरोप था कि रंजीत सिन्हा का बयान सदियों से चलती आ रही एक साजिश के तहत आया है जिसमे महिलाओं को नीचा दिखाने की पुरुष समाज कोशिश करता है. दूसरे थोडा कम मुखर थे लेकिन वे भी इस बयान की आलोचना करने वाले व्यक्ति थे. ऐसे में एक वरिष्ठ पत्रकार साथी ने इस पूरी बहस को नकारते हुए पत्रकारिता नियमों का हवाला देते हुए कहा कि “खबर इस आधार पर नहीं बननी चाहिए कि रंजीत सिन्हा ने क्या कहा बल्कि इसका आधार पर होनी चाहिए कि रंजीत सिन्हा ने क्या किया.”

awaz_3 (315x280)सैद्धांतिक रूप से इस बात से कोई असहमत नहीं हो सकता कि जो बात ऊपर कही गई है वह पत्रकारिता की दुनिया को वह आईना दिखाती है जिसमे निशाने पर मीडिया है लेकिन साधारण मनोवैज्ञानिक नियमों का हवाला देते हुए यह कहने वाले भी कम नहीं मिलेंगे कि बयान आते तो अचानक हैं लेकिन उन्हें तैयार करने में अवचेतन मन का लंबा समय लगता है और इसमे योगदान होता है जीवन के खट्टे मीठे अनुभवों का, उन स्मृतियों का जो इस लम्बे समय में सम्बंधित व्यक्ति की एक सोच बनाने में मददगार होती हैं. शायद यही कारण है कि अधिकतर उन्हीं व्यक्तियों के बयानों पर हो-हल्ला होता है जिनके क्रियाकलापों पर हो-हल्ला अक्सर होता रहता है. बात बेनी प्रसाद वर्मा की करें या दिग्विजय सिंह की. कैलाश विजयवर्गीय की या तस्लीमा नसरीन की. नरेन्द्र मोदी की या रघुवंश प्रसाद सिंह की. लगभग हर पार्टी, हर संगठन, हर प्रशासनिक सेवा से कोई ना कोई चेहरा इस भूमिका को निभाता है. (यहाँ इन व्यक्तियों की सोच को सही या गलत कहने का लेखक का कोई प्रयास नहीं, बात केवल विवादों पर हो रही है.) फिलहाल बात रंजीत सिन्हा की करें तो रंजीत सिन्हा के बयान और उनकी जिंदगी में कोई ख़ास अंतर दिखाई देता नहीं है. इसके लिए हमें जरा पीछे मुड़कर देखना होगा.

जमशेदपुर में जन्मे और पटना यूनिवर्सिटी से जिओलोजिस्ट, 1974 बैच के आईपीएस ऑफिसर रंजीत सिन्हा सीबीआई डायरेक्टर से पहले कई बड़ी जिम्मेदारियां निभा चुके हैं और उनके साथ कई विवाद जुड़े रहे हैं. इस से पहले वे आईटीबीपी के डीजीपी, रेलवे पुलिस फ़ोर्स के डीजी और सीआरपीएफ के आईजी के तौर पर अपनी सेवायें दे चुके हैं. साथ ही वे सीबीआई में भी कई महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभा चुके हैं, जिनमे से जेडी और डीआईजी प्रमुख हैं. इसके साथ साथ एसपी के तौर पर आप रांची, मधुबनी और सहरसा जिलों में सेवायें दे चुके हैं जो नक्सली प्रभाव के लिए कुख्यात जिले हैं. इस पूरे समय में कई बड़े और महत्वपूर्ण काम इनके जिम्मे रहे जिसे रंजीत सिन्हा ने पूरी जिम्मेदारी से किया लेकिन विवादों से इनका नाता कोई आज का नहीं है.

बात 1996 की करें तो लालू प्रसाद यादव के खिलाफ चारा घोटाले की जाँच कर रहे रंजीत सिन्हा पर रिपोर्ट को बदलने का आरोप लगा था जिसे उन्होंने कोर्ट में यह कहते हुए स्वीकार किया कि पहले वाली रिपोर्ट में लालू के खिलाफ ज्यादा कड़ी भाषा का इस्तेमाल हुआ था. कोर्ट के आदेश के बाद सिन्हा को उस केस से हटा दिया गया था. इस मामले में सिन्हा को बिहार विधान सभा की प्रिविलेज कमिटी काउन्सिल के सामने हाईकोर्ट में शिकायत ना करने के लिए माफ़ी भी मांगनी पड़ी थी जिसे कमिटी ने मंजूर किया और सिन्हा को अभयदान मिला. इस केस से हटने के बाद भी सिन्हा तबादला बिहार भवन में लालू के इशारे पर ऐसी पोस्ट पर हुआ जो केवल सिन्हा के लिए खासतौर पर सृजित की गई थी.

बाद में एक इंटरव्यू में सिन्हा ने लालू प्रसाद यादव से अपनी करीबी का इजहार भी किया. इसका कारण उन्होंने यह बताया कि वे स्वयं पटना से हैं, साथ ही बिहार और आरपीएफ में लालू उनके बॉस रह चुके हैं इसलिए उन दोनों के सम्बन्ध काफी प्रगाढ़ हैं. लालू भी इन संबंधों को पूरा सम्मान देते दिखाई देते हैं जब वे रेल मंत्री के तौर पर आरपीएफ के डायरेक्टर जनरल की पोस्ट को तीन साल तक खाली रखते हैं जब तक कि सिन्हा की नियुक्ति इस पद पर नहीं हो जाती. इसी प्रगाढ़ता की एक बानगी तब दिखाई देती है जब सीबीआई डायरेक्टर बनते ही रंजीत सिन्हा चारा घोटाले की जांच करने वाले चार बड़े अधिकारीयों का तबादला का आदेश देते हैं जिसे कोर्ट के हस्तक्षेप पर रद्द करना पड़ता है.

इसके अलावा भी रंजीत सिन्हा की टोपी में विवादों के तुर्रे अक्सर अपनी जगह बनाते रहे हैं. कोल घोटाले पर रिपोर्ट कानून मंत्री को दिखाना और उनके अनुसार बदलाव करना जिस पर सुप्रीम कोर्ट से सीबीआई को तोते की उपाधि मिली थी शायद किसी को भी भूला नहीं होगा. ममता बनर्जी से आरपीएफ चीफ के तौर पर रंजीत सिन्हा का विवादित वाकयुद्ध सभी के जहन में शायद ताजा है. इसके अलावा बहुत कम लोग जानते हैं कि रेल घूस काण्ड मामले का खुलासा दरअसल रंजीत सिन्हा और महेश कुमार के बीच रेलवे के दिनों की खुन्नस की देन था. आरोप है कि इसी खुन्नस के कारण रंजीत सिन्हा ने सीबीआई डायरेक्टर के तौर पर महेश कुमार के फोन टैप करने का आदेश दिया था जहाँ से इस काण्ड का खुलासा हुआ और अपने पुराने विरोधी को निशाने पर लेने का यह मौक़ा रंजीत सिन्हा ने हाथ से नहीं जाने दिया.

सवाल यह है कि क्या सिन्हा किसी छोटी क्लास में पढ़ते बच्चे हैं जिनसे अचानक इस तरह का बयान निकल गया. क्या उन्हें इतनी भी समझ नहीं कि सट्टेबाजी और बलात्कार में जमीन आसमान का फर्क है. एक ओर जहाँ सट्टेबाजी व्यावसायिक रूप से कानून का मोहताज है जिसे कानूनी दर्जा दिए जाने पर आपसी सहमति से होने वाला लेनदेन जो आज गैरकानूनी है कल वैध बन सकता है. दूसरी ओर किसी भी देश, समाज, सरकार में बलात्कार मनुष्य द्वारा सृजित सबसे घ्रणित अपराध ही कहा जाएगा. परन्तु जो बात एक साधारण व्यक्ति इतनी आसानी से समझ जाता है उसे समझने के लिए शायद तंत्र को अभी वक्त लगेगा. गनीमत इस बात की है कि तमाम विवादों से पल्ला झाड़ने के लिए रंजीत सिन्हा ने कम से कम माफ़ी तो मांगी अन्यथा बाकी महानुभाव तो बाकायदा अपने बयान पर अड़े रहते हैं.

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About Satish Sharma

Satish Sharma is Editor, Hindi of Awaz Aapki. Writes in many News Papers & Magazines as Columnar, Analyst. Like to work as Citizen Journalist. Doing his bit of work in raising voice of unheard. Currently he is managing two shows of Awaz Live TV named Mashal and Manthan also.

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