लाइन में जी

4आज शिवरात्री का दिन है .सपरिवार भोलेनाथ के द्वार पहुँच गए .द्वार पर ही थे कि सिक्युरिटी वाले ने रोक दिया .अंदर साफ़ सफाई हो रही है .ग्यारह बजे मंदिर दोबारा खुलेगा .

अपना माथा ठनक गया . इस मंदिर की एक एक ईंट को जानते हैं. साफ़ सफाई की जो स्तिथि है या कहिए जो अव्यवस्था है उससे परिचित हैं .एक से कंधे पर हाथ रख कर पूछ ही लिया .क्या साफ़ सफाई हो रही है ?

उसने भी बता ही दिया .शहर के बड़े नेता .सपत्नी पूजा में बैठे हैं .व्यवधान न हो. इसलिए बाकी सब को बाहर रोक दिया है .बाकी भोले भक्त गण ,सिक्यूरटी वाले की बात मान कर पूजा की थाली लिए बाहर लाइन बना कर बाहर खड़े हुए थे .

अपना मन हुआ ,अभी पूजा की थाली से बेलफल उठा कर नेता जी के सिर पर फोड़ आएं .अपने गुस्से को  काबू में किया .विचार किया कि ऐसा करने के बाद नेता जी के चेले और पुलिस हमारा क्या हाल करेगी . और दूसरे शिव मंदिर का रुख किया .

अब मंदिर हो आए हैं सो मन शांत है .अपने भाई बंधुओं से बात की .सभी जगह यही हाल है. मेरे वाले मंदिर में नेता बैठे थे .उनके यहाँ कोई बड़ा सरकारी अफसर ,पुलिस वाला या सेठ बैठा है .बेल पत्र वाले तो आज शिवलिंग को छु लें वही काफी है .पुजारी और मंदिर के व्यवस्थापक उन लोगों के  पदों के  भभके में आए हुए हैं या उनसे मोटी दक्षिणा मिलने की उम्मीद है .वरना क्या है कि आज आम भक्त शिवलिंग से दूर या मंदिर से बाहर है . वो भी औघड़ के द्वार से ?इस सवाल का जवाब तो धर्म जानने वाले विद्वान ,उनकी पीठें या मंदिर संस्थान देंगे .

मगर अपना सवाल छोटा है .जब ये नेता अफसर या सेठ लाइन की परवाह किए बिना सीधे धडधडता हुआ .मंदिर के गर्भ गृह में पहुँच जाता है .तो वह हम बाहर लाइन में लगे लोगों के बारे में क्या सोचता है ? क्या हम उसे दिखते नहीं ? क्या उसे लगता नहीं कि इस तरह बिना लाइन के या लाइन तोड़ कर उसका पहले जाना ,भोले नाथ को पसंद हो न हो मगर उसके भक्तों को पसंद नहीं आता है .

अभी अपने में इतनी हिम्मत नहीं है कि उस लाइन तोड़ कर अंदर जाने वाले ,गर्भ गृह पर कब्जा करने वाले को अपने साथ बाहर ही रो़क लें .मगर इस का कुछ तो करना ही पड़ेगा .

आज शिव प्रसाद ग्रहण करने का सोचा था मगर इस सवाल के कारण उसे होली तक के लिए स्थगित कर दिया है

अशोक उपाध्याय

 

 

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