सवाल दर सवाल

1मनुष्य के रूप में हमारे विकसित होने का कारण है हमारा सवाल पूछना और उसका उत्तर खोजना .इस सवाल जवाब की जितनी विकसित परम्परा भारत में रही है उतनी दुनियां के किसी देश में नहीं रही है .

ज्ञात वैदिक परम्परा में सवाल है .तो उसका जवाब है .जवाब सीधा है जो प्रत्यक्ष है और कहीं जटिल भी है .जैसे ब्रह्म क्या है .नेति नेति .यह भी नहीं .यह भी नहीं .जो अंत में बच जाय वही जवाब है .सवाल ऐसा भी  है कि गुरु जवाब नहीं देता .दिशा का ज्ञान देकर शिष्य को विदा करता है और शिष्य उत्तर पा भी लेता हैं .

पूरी बौद्ध परम्परा में सवाल तो हैं मगर जवाव नहीं हैं .महात्मा बौद्ध का सन्देश है .अप्पो दीपक भव. अपने दीपक अपने आप  बनो .शास्त्र और गुरु सब को नकार दो .स्वयं अनुसन्धान करो .क्या महान परम्परा है .आपने  सवाल का जवाब आप को खुद को ही खोजना है .कोई और जवाब देगा तो वह उसका जवाब होगा .यह जवाब आप का नहीं है . आप बस उससे सहमत या असहमत हो सकते हैं .

तर्क शास्त्र में भी यही स्तिथि है .सवाल आप का है .कोई अपने तर्कों के आधार पर अपनी बात आप को मनवा देता है .आप मान जाते हैं .मगर फिर कोई दूसरा या बड़ा तर्क प्रस्तुत कर देता है तो आप उससे सहमत हो जाते हैं.कल फिर कोई नया कारण या तर्क सामने आ जाता है तब आप उसके साथ हो जाते हैं .मगर जवाब है .

कथा कहानियों में भी ऐसा होता है .हातिम को  दस सवालों के जवाब खोजने हैं.तिलस्मी दुनियां में वह जीवट से सभी मुश्किलों का सामना करता है और अंत में सभी  सवालों के जवाब खोज लेता है  और आधा राज्य और राजकुमारी से विवाह करता है.

सत्तर अस्सी के दशक तक गांव चौपालों में कथा कहानी के अंत में पूछा जाने वाला सवाल (जैसे विक्रम वेताल की कहानियां )और पूछे जाने वाली पहेलियाँ वही जन चेतना है जो सवाल कर जवाब खोजने पर बल देती है और सवाल का जवाब ऐसा होता है कि जवाब देने वाले का पूरा व्यक्तित्व ,उसके संस्कार उसका ज्ञान सब पर प्रकट हो जाता है .

यह देश का सबसे बड़ा दुर्भाग्य है कि यह सवाल जवाब की परम्परा ही समाप्त हो रही है .कहीं उसे धर्म ग्रंथों का अपमान कह कर दबाया जाता है तो कहीं बड़े बूढों के आदर के नाम पर और अब तो हालत यहाँ तक हो गयी है कि कानून ,संस्थाओं और संवैधानिक पदों पर सवाल पूछने को  अपमान और अवहेलना माना जाता है और महान लोकतान्त्रिक परम्परा के नाम पर सवाल पूछने से ही रोका जाता है .

अब चुनाव के माहौल में अजब माहौल है .चारों तरफ सवाल ही सवाल हैं .जवाब कहीं नहीं है .एक नेता तीन बड़े सवाल पूछता है . दूसरा उसका जवाब नहीं देता .बदले में सवाल पूछता है .सवाल का जबाव सवाल होता है .ऐसा तो कहीं नहीं होता .

कैसा हो अगर आप का बच्चा अपनी बोर्ड की परीक्षा में सभी प्रश्नों के जवाब में अपने सवाल लिख आए या आप अपनी नौकरी के इंटरव्यू में हर सवाल के जवाब में ,बोर्ड के सदस्यों से सवाल पूछें .ऐसा नहीं होता . मगर देख लीजिए आप के सामने हो रहा है हर नेता सवाल के जवाब में सामने वाले से सवाल पूछ रहा है . इतना ही नहीं निहायत बेशर्मी से कह रहा है .मैं आपके सवाल का जवाब क्यों दूँ .पहले आप मेरे सवाल का जवाब दो .

टी वी शो में भी पहले तो सामने वाला जवाब ही नहीं देगा और जवाब देगा तो इस तरह से देगा . माना सवाल है .मख्खन क्या है ? तो वह जवाब देना शुरू करेगा .एक गाय होती है .उसके चार पैर होते हैं .दो सींग होते हैं .बीच में एंकर टोकता है .सर आप जवाब नहीं दे रहे हैं तो वह कहता है .आ रहा हूं जवाब दे रहा हूं .उसके एक पूंछ होती है .वह गाँव में रहती है .एंकर फिर टोकता है सर आप जवाब नहीं दे रहे .नेता फिर कहता है आप मुझे बोलने ही नहीं दे रहे .फिर बीच में कोई दूसरा नेता बोल पड़ता है .आप मख्खन पर जवाब दो .फिर वह सवाल करता है आप मख्खन पर पूछने से पहले अपनी भैसों के बारे में बतलाओ . इसी बीच विज्ञापन के लिए ब्रेक आता है .गरमा गरम बहस होती है .ये देख के एंकर खुश होता है .आधा घंटा बीत जाता है मगर सवाल का जवाब नहीं आता .

अब तो स्तर इससे भी नीचे गिर गया है .नेता सीधे बेशर्मी से कहता है मैं आपके सवाल का जवाब क्यों दूँ आप कौन होते हैं हम से पूछने वाले .हम चुनाव आयोग का जवाब देते हैं .इनकम टैक्स वालों को जवाब देंगे . आपको जवाब क्यों दें .जनता ने हमें चुना है .और आगे भी हमें ही चुनेगी .दर्शक मुंह फाड़े उनकी बातें सुनता रहता है.

आधे घंटे में टी वी का कार्यक्रम खत्म हो जाता है .दूसरा वैसा ही कार्यक्रम आता है मगर जवाब नहीं आता .फेस बुक पर लिखा कमेन्ट एक घंटे में पेज से नीचे आ कर विलुप्त हो जाता है .आपका लाइक संख्या बन कर गायब हो जाता है मगर जबाव नहीं आता . क्यों ?

परिवार में आप अपने पांच वर्ष के पुत्र के प्रश्नों का जवाब न दें .बदले में उससे अनर्गल सवाल करें ( इसका जबाव तेरी मम्मी को दूँगा . यह दादा जी से पूछ .पहले तू ये बता इत्यादि )तो बच्चे को कैसा लगेगा .जरा सोचें .यही हालत हमारी है .

गरीबी और भुखमरी से मरी जनता वैसे ही कोई सवाल नहीं पूछती है .अब करोड़ों रुपयों के विज्ञापन से टी वी और अख़बारों में ,नारों और स्लोगनों की बौछार से मध्यवर्ग के दिमाग को  कुंद किया जा रहा है .टी वी .अखबार विज्ञपन और रैलियों से जनता को आवेशित किया जा रहा है जिस से वे एक भीड़ में परिवर्तित हो कर भेड़ों की तरह बैलेट बोक्स में जा गिरें .

कठोपनिषद में नचिकेता की कथा आती है वह यमराज से मृत्यु का रहस्य जानना चाहता है .यमराज उसे वह नहीं बतलाना चाहते .वे उसे भय दिखलाते हैं उसे लालच देते हैं उसे भरमाते हैं  किन्तु नचिकेता अपने सवाल पर अडिग रहता है .कथा के अंत में यमराज को उसे मृत्यु और जीवन का रहस्य बतलाते हैं.जिसे जानकार वह अमर हो जाता है . हमें भी अपने प्रश्नों पर अपने सवालों पर  अडिग रहना होगा और उनका उत्तर पाना होगा .

अन्यथा आप ही बतलाइए ,मैदान में घास चरती भैंस में और हम में क्या अंतर है ? न उसके पास कोई सवाल है न उसके पास कोई जवाब है और न ही उसे कोई  जवाब चाहिए .

अशोक उपाध्याय

 

 

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