नए साल में अपने होने का अर्थ समझने का समय

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समय शाश्वत है, कालातीत है, हर गुजरता लम्हा इस पर असरहीन है. कैलेंडर तो स्मृतियों को पलटने भर जैसा है और घड़ियाँ शांत या शोर मचाते अलार्म से अधिक कुछ नहीं.

कुछ अन-कनेक्टेड लोगों, जैसे कि अंदमान द्वीप समूह में नार्थ सेंटनल द्वीप के वासियों, के अलावा इस प्रथ्वी पर समय से मुक्त लोग नहीं है. अगर ऐसे लोग होते तो निस्संदेह वे हमसे ज्यादा सुखी होते. वक्त की पाबंदियों के बिना वे रचनात्मकता में संभवतः हमसे अधिक व्यस्त होते. निश्चित रूप से वे नए साल के ख़त्म होने का कोई मतलब नहीं समझ रहे होते. उनके लिए नए साल के आरम्भ का कोई मतलब नहीं होता सिवाय इसके कि मौसम के संकेतों के साथ एक नए दिन की शुरुआत हुई. इसके बदलते मिजाज में समुद्र गुर्राने लगा और आकाश से भी गर्जना हुई. उनके लिए इन सबका मतलब उससे बहुत अधिक होता जितना हमारे सीमेंट युक्त जंगल में कुदरती चीजों का है.

ऐसे अन-कनेक्टेड क्षेत्रो में जहाँ केवल नार्थ सेंटनल द्वीप की तरह लोग बसे हुए हैं वहां न तो होटल-लिफ्ट्स हैं न ही सुइट्स. इसलिए वहां ऐसी कोई घटन अन्हें होती जैसी गोवा में एक समादक ने की या दिल्ली में एक पूर्व न्यायाधीश ने. वहां किसी महिला पर अधर्मियों का धर्म के नाम पर हमला नहीं होता जैसा कि दिल्ली में निर्भय के साथ हुआ. सम्भवतः निठारी हत्याकांड की तरह वहां कोई बच्चों का हत्यारा भी नहीं रहता. मार्च 2002 में 69 लोगों को धर्म के नाम पर जलाया जाना और उसके बाद एक सांसद समेत लगभग 1200 लोगों की जान लेना तो वहां आज तक कभी हुआ ही नहीं है. कारण बड़ा सीधा है कि वे लोग अभी तथाकथित विकास ए दायरे में नहीं आये.

तो क्या मैं आदिवासी तौर तरीकों को रोमांटिसाइज कर रहा हूँ? बिलकुल नहीं. मैं केवल यह कहने की कोशिश कर रहा हूँ कि वे लोग अपने अधिक करीब हैं और हमें भी साल का पहला हफ्ता खुद के बारे में जानने में खुद को समझने में बिताना चाहिए.हमें यह जानना चाहिये कि देश की जनता के रूप में हम कौन हैं और क्या हैं?

हम भारत के लोग आशावादी सोच की उत्पत्ति हैं. यह राष्ट्र-निर्माण, जीवन्तता और सियासी-सम्मोहन से उपजा है. हमारी बातचीत में मैं की जगह हम अधिक देखा जाता है. लेकिन अक्सर यह भी देखा जाता है कि हम की परिभाषा को संकीर्ण करने में भी हम माहिर हैं. आप दूसरे द्वीप में हैं तो इसका मतलब भारत-पाकिस्तानी-बांग्लादेशी हो सकता है. आप अपने एशिया में हैं तो यह केवल भारत तक सिमट जाता है. भारत में आप अपने राज्य की बात करते हैं. राज्य में अपने जिले की और अपने जिले में केवल अपने शहर की. शहर में अपनी कालोनी और कालोनी में केवल अपना घर. इस सबमे भी अधिक बुराई तब आती है जब हम का यह संकुचित रूप केवल गुटबाजी तक सिमट जाता है.

हाल में ही बंगलुरु में प्रतिष्ठित समाजशास्त्री आंद्रे बेते ने गुटों में बंटने की भारतीय मनोवृत्ति के बारे में बताया. भारतीय समाज और राजनीति में इस गुटबाजी का अलग महत्त्व है. हर जगह एक अलग वर्गीकरण है, अलग पहचान है, विभिन्न समूह हैं. लेकिन भारत में गुटबंदी जीतनी तेजी से पनपती है वैसा दूसरी जगहों पर कम है. सभी सियासी पार्टियों, सरकारी संगठनों, एनजीओ, संकायों, कारपोरेटों, खेल और सांस्कृतिक संघों के अन्दर मतभेद व गुटबंदी व्याप्त है. हालांकि अब इसमें कुछ बदलाव आये हैं लेकिन मूलभूत और व्यापक बदलाव के लिए शायद और इन्तजार करना पड़े.

इसमे कोई संदेह नहीं कि जाति की पकड़ ढीली हुई है और भारतीय माध्यम वर्ग मजबूत हुआ है. हालांकि यह मार्क्सवादी सोच से दूर ले जाता है लेकिन यह गुटबाजी से बेहतर स्थिति है. भारत का लोकतंत्र राजनैतिक पार्टियों से अधिक नहीं जुड़ा है जितना कि राजनैतिक वर्गीकरण से. हमारे नाम बड़े और दर्शन छोटे हैं. हम स्वस्थ प्रतिस्पर्धा की जगह षड्यंत्र रचते हैं. बेलाग बोलने की जगह कानों में फुसफुसाते हैं. हमने दीवारों को कान दिए हैं और कोनों को जुबान. यही कारण है कि हम आज तक गांधी के स्वराज से दूर रहे क्योंकि मूलतः हम पारदर्शी लोग नहीं हैं. अखंडता का गुण हम में अभी तक पनप नहीं पाया है.

लेकिन भारत में अभी भी बहुत सी जगहें हैं जहाँ यह गुटबंदी नहीं पहुँच पाई है. एक स्कूल से पहले की जिंदगी और दूसरा आईसीयू में. पहले में जीवन की भोर पवित्रता है और दूसरे में शाम की अकर्मण्यता. हमारे अंदर नए साल के इस मौके पर विकल्प है कि हम अपने अन्दर की आशा को जाग्रत करें या विकल्प छोड़ दें.

-गोपाल कृष्ण गांधी

(लेखक के अपने विचार हैं)

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About Satish Sharma

Satish Sharma is Editor, Hindi of Awaz Aapki. Writes in many News Papers & Magazines as Columnar, Analyst. Like to work as Citizen Journalist. Doing his bit of work in raising voice of unheard. Currently he is managing two shows of Awaz Live TV named Mashal and Manthan also.

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