समर्पण ही नीति है

nsfअभी हाल ही में ,गुरु नानक जी के जीवन और सन्देश पर , एक फिल्म नानक शाह फकीर रिलीज हुई .इस फिल्म को सेंसर बोर्ड ने यू /ए सर्टिफिकेट दिया है .फिल्म का प्रोमो रिलीज होते ही फिल्म विवाद में आ गई .विवाद का कारण यह है कि फिल्म में गुरु नानक जी का चरित्र एक मानव द्वारा अभिनीत किया गया है जो कि सिक्ख परम्परा के अनुसार उचित नहीं है .फिल्म के निर्माता को शायद यह बात मालूम थी इसलिए उस ने तुरंत स्पष्टीकरण दिया कि फिल्म में गुरु नानक का चरित्र किसी मानव द्वारा अभिनीत नहीं किया गया है बल्कि कम्पुटर की उन्नत तकनीक वी एफ एक्स द्वारा उस चरित्र का चित्रण किया गया है .

 

विरोध करने वालों को न निर्माता की बात सुननी थी और न उन्होंने सुनी .विरोध करने वालों के समर्थन में सिखों के बड़े संगठन और गुरुद्वारे भी आ गए .पंजाब में हलचल हुई तो वहाँ की सरकार ने फिल्म का प्रदर्शन दो माह के लिए स्थगित कर दिया .एक सज्जन ने पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट में मुकदमा दाखिल कर दिया है .अब मुकदमें का फैसला आने तक यह फिल्म पंजाब में प्रदर्शित होने से रही .दिल्ली की नई सरकार के दो सिख एम एल ए ,जनता की भावना को लेफ्टिनेंट गर्वनर को परिचित करवाने पहुँच गए हैं कि आप यहाँ भी इस फिल्म पर रोक लगवा दो .

 

दो महीने पहले , एक गुरु की अपनी फिल्म “एम एस जी “ रिलीज करवाने पर अड् गए .सेंसर बोर्ड के सदस्यों ने त्याग पत्र दे दिए .सरकार फिल्म के समर्थन में आ गई और फिल्म रिलीज हो गई . मैं फिल्म देखने बाद कहता हूँ नानक शाह फ़कीर एक अंतरास्ट्रीय स्तर की शानदार फिल्म है .फिल्मांकन और संगीत गजब का है जो हर फिल्म प्रेमी को पसंद आएगा .

अधिकतर समाचार पत्रों के, फिल्म समीक्षकों ने इस फिल्म की समीक्षा ही नहीं लिखी है उन्हें डर है कि वे विरोधी सिख संगठनों के निशाने पर न आ जाएँ .अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करने वाले लोग भी खामोश हैं .वे खामोश क्यों हैं .इसका जबाव कौन देगा कि जब सेंसर बोर्ड फिल्म के प्रदर्शन की अनुमति दे चुका है .तब फिल्म का प्रदर्शन रोकने वाले ये लोग कौन होते हैं .सरकार को यदि सेंसर बोर्ड के लिए जरा भी सम्मान है और वह संविधान प्रदत अभिव्यक्ति की सवतंत्रता में विश्वास रखती है तो उसे यह सुनिश्चित करना चाहिए कि यह फिल्म सभी जगह निर्बाध रूप से प्रदर्शित हो .

 

राजनैतिक दल और उनके नेता , अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हुए इस आधात पर खामोश हैं .कलाकार और पत्रकार और वकील खामोश हैं .कल तक यह स्थापित था कि इस्लाम के पैगम्बर साहिब का चित्रण नहीं किया जा सकता .अब गुरु नानक भी उसी वर्ग में शामिल होते जान पड़ते हैं .सरकार को मुठ्ठी भर विरोधियों के विरोध की चिंता है ,उनके हुडदंग से कितने सभ्य सुसंस्कृत नागरिकों के अधिकारों का हनन होता है उस ओर सरकार एक पल भी विचार नहीं करती .

 

यदि हम लोग इसी तरह खामोशी से सहते रहे और सरकार इसी तरह समर्पण करती रही तो वह दिन दूर नहीं जब कोई वीर हनुमान को वानर कहने पर आहात होगा और पूरी राम कथा पर रोक लगेगी .

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