नई खाप पंचायत लोक अदालत

a2भारत  में न्याय व्यवस्था की स्तिथि बहुत खराब है .करोडों मामले उसके पास लंबित हैं .यदि आज की रफ़्तार से उन पर काम किया जाता रहे तो अगले पचास सालों में भी उनका निबटारा नहीं हो सकता .न्यायपालिका ने अपने चारों ओर आत्म सम्मान की ऐसी दीवार खड़ी कर ली है कि आम जन क्या प्रबुद्ध नागरिक भी उस पर टिप्पणी करने से घबराता है कि कहीं उससे न्यायालय की मान हानि न हो जाय और उसे कोर्ट कचहरी के चक्कर काटने पड़ें .

 

निहित स्वार्थो के कारण सरकार की प्राथमिकता आर्थिक सुधार तो हैं लेकिन न्यायायिक सुधार नहीं हैं .आज की स्थिति में यह न्यायालय के बस में नहीं है कि वह नए कोर्ट बना ले या नई नियुक्तियां कर लें या अपने काम करने के घंटे बढा ले .दूसरी ओर वकीलों के संगठन और बार इतने शक्तिशाली हो गए हैं वे मुकदमें की न्याय पीठ और उसके निबटान की गति निर्धारित कर सकते हैं .

 

ऐसे में न्यायपालिका की पहल पर सरकार ने लोक अदालत की अवधारणा को अमलीजामा पहनाया था जिस से पीड़ित पक्ष को शीघ्र न्याय मिल सके .इस अदालत में दोनों पक्ष या उनके वकील मिल कर एक समझौते पर पहुँचते हैं और न्यायालय उनके इस समझौते पर अपनी मोहर लगा देता है .फिर इस समझौते को न्यायालय का निर्णय माना जाता है जिस के खिलाफ किसी कोर्ट में अपील नहीं की जा सकती है .

 

गरीबों को त्वरित न्याय देने के नाम पर ये अदालते साल में कई बार लगाई जाती हैं जिन में से कुछ महा अदालतें होती हैं जिन में अदालत और सरकार द्वारा समाचार पत्रों में इन अदालतों के होने के विज्ञापन दिए जाते हैं .अदालत द्वारा सम्बन्धित सरकारी विभागों को इन अदालतों में बढ़ चढ़ कर भाग लेने को कहा जाता है .सतही तौर पर लोक अदालत के इस काम में कोई बुराई नहीं दिखती है. किन्तु जमीन पर जो होता है वह इससे भिन्न है .

 

वह पीड़ित जिस ने न्याय पाने के लिए न्यायालय का दरवाजा खटखटाया है उसे कहा जा रहा है कि आरोपित पक्ष से समझौता कर ले .पहली बात यही है कि उसे अगर दूसरे पक्ष से समझौता ही करना होता तो वह न्यायालय की शरण में ही क्यों आता . न्यायालय इस के लिए कारण बतलाता है कि हमारे पास इतना अधिक काम है कि हम आने वाले कई सालों तक तुम्हें न्याय नहीं दे सकते इसलिए तुम समझौता कर लो .

 

कहने को कहा जाता है कि दोनों पक्षों के बीच हुआ यह समझौता किसी के लिए बाध्यकारी नहीं होता .कोई भी पक्ष इसको मानने से इंकार कर सकता है इस स्तिथि में उसका फैसला नियमित अदालत में होता है .पीड़ित पक्ष लंबे समय तक न्याय की प्रतीक्षा नहीं कर सकता इसलिए वह मजबूरी में इन अदालतों में आता है और समझौता करने को मजबूर होता है .

 

पीडित के सामने दूसरा पक्ष सरकार या उसका कोई विभाग या कोई बड़ी कम्पनी होती है जिसे जल्दी फैसला करने में कोई रुची नहीं होती है . अदालत में मामला जितना लंबा खींचता है सामने वाला पीड़ित उतना ही कमजोर होता जाता है .ऐसे में सरकार या कम्पनी की ओर ऐसे प्रस्ताव रखे जाते हैं .जिसे मरता क्या न करता की स्तिथि में उसे स्वीकार करने को मजबूर होना पड़ता है .

 

इसके अतिरिक्त पीड़ित पर वकीलों का भी दबाव होता है जो जल्द मुकदमें को निबटा कर अपनी पूरी फीस तत्काल पा लेना चाहते हैं .अदालत परिसर में ऐसे सलाहकार भी होते हैं जो उदहारण दे कर पीड़ित को यह समझाते हैं कि अभी समझौता कर लो वरना जज साहब इससे भी कम राशि का फैसला सुना देंगे तब क्या करोगे या अभी समझौता कर लो वरना अगले दस साल तक यह मामला सुनवाई के लिए ही बोर्ड पर नहीं आएगा . न्यायाधीश महोदय भी चाहते हैं कि दोनों पक्षों के बीच समझौता हो जाय जिस से उस पर अपना निर्णय दे सकें .इस से उनके द्वारा निबटाये गए केसों की संख्या में वृद्धि होती है और कोर्ट में लंबित मामलों की संख्या कम होती हैं .

 

इस तरह लोक अदालत में केस की सुनवाई में राज्य , उसके संस्थान , बड़ी कंपनियां , कोर्ट .वकील सब का फायदा है .घाटे में रहता है तो पीड़ित .जिस के नाम पर ये सब संस्थान खड़े हैं और चल रहे हैं .यदि इसी तरह समझौते से फैसले होने हैं तो खाप पंचायत के निर्णयों में भी कोई बुराई नहीं है .

 

अब समय आ गया है कि सरकार और न्यायालय अपनी इस लोक अदालत की अवधारणा और व्यवहार को दोबारा देखें .देश की अदालतें बन्दर बाँट की तर्ज पर समझौते न करवा कर समय पर संविधान सम्मत न्याय दें जिस से आम नागरिक का विश्वास उन पर बना रहे .

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