‘आम आदमी पार्टी’ की उदय के मायने

Arvind_happyमहज एक साल में ‘आम आदमी पार्टी’ का ऐसा गौरवशाली उदय एक सामान्य घटना नहीं है ! यह बताता है कि भारत के मतदाता अब परिपक्व हो रहे हैं साथ ही और अधिक मूर्ख बनने को तैयार नहीं. अब तक तमाम दलों व नेताओं के बीच होड़ रहती थी कि कौन सा दल व नेता मतदाता के साथ कितना अधिक फरेब कर सत्ता पाता है और तमाम कुत्सित तरीकों से उसी जनता को चूस कर काली कमाई से कितनी अधिक तिजोरी भरता है.
इन्हें लगने लगा था कि आम जनता निपट मूर्ख है और कोई स्वच्छ/बेहतर विकल्प न होने से फिर-फिर इन दुष्टों में से ही एक को चुनने को मजबूर है. वक्त के साथ लोगों में जागरूकता आयी और हर चुनाव के साथ यह बदलाव परिलक्षित भी होने लगे. आखिर क्या है वह शुभ बदलाव? जनता अब किसी दल विशेष को स्पष्ट बहुमत देने लगी है – एक ऐसा सच जो लंबे अरसे तक एक सपना ही होता था. कम रोचक नहीं कि पिछले आम चुनाव में कभी न हारने वाले बहुत से बाहुबलियों को भी निडर हो जम कर पटखनी दी.
अपनी अपेक्षाओं पर खरा उतरने वालों को दुबारा व तिबारा भी मौके दिए. वहीं अहंकार में डूब कर जनता और उसकी भलाई से विमुख होने पर जमीन पर ला पटका. तमाम चुनावों के साथ क्षेत्रीय दलों का मत प्रतिशत गिरा. इनका जिन कारणों से उदय हुआ था इन्होने ठीक उसके उलट काम किया और देश को तमाम तरह से नुकसान पहुंचाया. ये जमीनी विकास कार्य व सुधार का कोई प्रयास न कर जनता को टुकड़ों में बाँट उन पर अजीबोगरीब सोशल इंजीनियरिंग आदि प्रयोग करते रहे.
ऐसे हालात में इनका अस्त दूर नहीं और यह देश के लिए अच्छा ही होगा. ऐसे में नागरिकों की बदलती सोच, रुझान और जागरूकता का परिणाम है ‘आम आदमी पार्टी’ का उदय और दिल्ली में उनकी अदभुत जीत. इस जीत ने दिखा दिया कि अब राजनीति करने और जीतने के लिए कुत्सित तरीके अपनाना, अरबपति या बाहुबली होना बहुत जरूरी नहीं. ‘आप’ के उदय से स्याह और रुग्ण भारतीय राजनीति में अवश्यम्भावी सुधार/बदलाव के संकेत स्पष्ट नजर आने लगे हैं.
इसमें बेशक सर्वोच्च न्यायालय का भी महत्वपूर्ण योगदान है. सो तमाम कपटी, स्वार्थी, बेशर्म, फरेबी, भ्रष्टाचारी, अनाचारी नेता जाग जाएँ, जनता की सच्ची सुध लें और खुद को बदलने का पूरा प्रयास करें नहीं तो शीला जी जैसी लज्जाजनक अंतिम विदाई तय है

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