आखिरकार लोकपाल को मिली हरीझंडी

Author: Ashwani Kumar

Lokpal Bill Passed in Indian Parliament

Lokpal Bill Passed in Indian Parliament

Lokpal Bill Passed in Indian Parliament,President gives his approval

46 वर्ष बाद ही सही आखिरकार लोकपाल को भारत के माननीय दोनों सदनों ने पास कर ही दिया. एक ऐसी संस्था का निर्माण होगा जो आमजन से जुड़े सभी मामलों को गंभीरता से लेकर उनका निवारण करेगी. यह संस्था निष्पक्ष रूप के कार्य करने के लिए प्रतिबद्ध होगी. 2013 की 15वीं लोकसभा में पास किया गया, प्रधानमंत्री, मंत्री और सांसदों के साथ-साथ देश के शासन से जुड़ा हर व्यक्ति इसके अंतर्गत आयेगा, इनके द्वारा किये गए भ्रष्टाचार के मामलों पर कार्रवाई की ताकत भी लोकपाल को होगी, इससे पहले भी कई बार यह विधेयक सरकार द्वारा सदन में पेश किया जा चुका है. लेकिन हर बार इस विधेयक को मुंह की खानी पड़ी है, अगर इसके पीछे कारण को देखें तो साफ़ है कि इसके दृढ राजनीतिक इच्छाशक्ति का अभाव था इसके अलावा हमारे राजनेताओं के मंसूबे क्या रहे हैं उनकी भी पोल कई बार पहले भी खुल चुकी है.

इसके इतिहास पर नज़र दौडाएं तो हम देखते हैं कि सबसे पहले इस विधेयक को चौथी लोकसभा 1968 में पेश किया गया. लोकसभा से यह 1969 में पारित भी कर दिया गया, परन्तु राज्यसभा में पहली बार में इसे रोक दिया गया. इसी दौरान लोकसभा भंग हो जाने के कारण लोकपाल विधेयक ठन्डे बसते में चला गया. इसके बाद इस विधेयक को नए सिरे और कुछ नए प्रवाधानों के साथ 1971, 1977, 1985, 1989, 1996, 1998, 2001, 2005 और 2008 में पेश किया गया परन्तु हर बार इसे किसी न किसी कारण फंसना पड़ा. साफ़ है कि सरकारें आती गई जाती गई पर लोकपाल वहीँ का वहीँ रहा. हर बार विधेयक में सुधार के लिए या तो किसी संयुक्त संसदीय समिति या गृह मंत्रालय की विभागीय स्थायी समिति के पास इसे भेजा जाता रहा, जब भी कोई सरकार इसे पारित करने का प्रयास करती तभी किसी न किसी कारण सदन भंग हो जाते. ऐसा करते करते लंबा समय बीत गया, पर हम तो आम जनता हैं हमें लोकपाल या जोकपल से क्या लेना देना, आज भी अगर एक बुजुर्ग एक दृढ इच्छा लिए मैदान में नहीं उतरता तो क्या लगता है कि लोकपाल कभी पारित हो सकता था?

2011 में भारतीय जनता के लिए गाँधी के आधुनिक स्वरुप ने एक जन आन्दोलन का आगाज़ किया, और लोकपाल को जनता के हित में न बताते हुए अन्ना हजारे ने जनलोकपाल को हमारे सामने पेश किया. जैसे हम उस समय बिना कुछ जाने गांधी के पीछे चल दिए थे वैसे ही अन्ना के पीछे चल दिए उसी का नतीजा है कि जनलोकपाल तो नहीं बल्कि सरकार द्वारा बनाया गया लोकपाल 18 दिसम्बर 2013 को दोनों सदनों से पारित किया गया. अब यहाँ सवाल उठता है कि अगर यह बुड्ढा व्यक्ति अनशन पर नहीं बैठता तो क्या यह कभी संभव था कि हमारी सरकार जो पिछले 46 सालों में नहीं कर पायी थी आज कर देती. जनता के अन्ना के सहयोग को भी नाकारा नहीं जा सकता. आन्दोलन हुआ और नतीजा हमारे सामने है.

46 वर्षों से लंबित पड़ा लोकपाल सरकार ने अन्ना या उसके जनसमर्थन के दबाव में किया है या किसी और कारण यह तो दिल्ली के कांग्रेस की बड़ी हार से ही साफ़ है, केजरीवाल की आम आदमी पार्टी भी अन्ना के इसी जनआन्दोलन के कारण ही अस्तित्त्व में आई है, और आज उसी ने कांग्रेस का दिल्ली से मानो सफाया कर दिया है. अब या तो सरकार को और सरकार के पिछलगू विपक्ष को यह दिखने लगा था कि अब लोकसभा चुनाव बहुत पास है तो जनता के सामने वोट मांगने का कोई तो बहाना होना चाहिए तो लोकपाल को पारित किया गया. अगर आम आदमी पार्टी लोकसभा में भी इस तरह का प्रदर्शन करती है तो शायद भारत की राजनीति से भारतीय शासन की कॉपीराइट अपने पास रखने वाली दोनों पार्टियां जड़ से ही ख़त्म हो जायेंगी. शायद इसी के चलते दोनों बड़ी पार्टियों आँख फडकी और उन्होंने जनता के कल्याण का ढोंग करके चुनाव के करीब लोकपाल को पारित कर राष्ट्रपति के पास भेज दिया.

यहाँ रोचक बात ये हैं कि केवल एक साल पुरानी पार्टी के हाथों सत्ता गवाने के डर से दोनों पार्टियों ने मात्र आधा घंटे की अवधि में ही लोकपाल विधेयक को पारित कर दिया. एक सवाल यह उठता है कि लोकसभा के चुनाव को सामने आता देख ही यह कदम क्यों उठाया गया, क्या इससे पहले कभी किसी सत्र की बैठक नहीं हुई? क्या इसे पहले इस वर्ष या अन्ना के आन्दोलन के बाद कोई विधेयक पारित नहीं किया गया? और अगर किया गया है तो लोकपाल क्यों नहीं उस श्रेणी में था. केवल दिल्ली में कांग्रेस की शर्मनाक हार के बाद ही यह कदम क्यों उठाया गया. क्या सरकार आम जनता को इतना बेवकूफ समझती है कि वह कोई निर्णय नहीं ले सकती. यहाँ हम देना चाहते हैं उन हुक्मरानों को कि जनता अब सयानी हो गई है अपना अच्छा बुरा भलीभांति जानती है. जनता को बेवकूफ समझना सरकार कि भूल हो सकती है. जनता ने दिल्ली में यह दिखा दिया कि अब आम जनता जाग गई है, बहुत हो गया अंधा शासन, बहुत हो गए घोटाले, अब हम चुप नहीं बैठेंगे.

अगर राष्ट्रपति ने बिना किसी आपत्ति के लोकपाल विधेयक को क़ानून में तब्दील होने दिया तो इसका लाभ मिल सकता है अन्यथा हमारे महामहीम राष्ट्रपति भी तो उसी दल से हैं जो न जाने कब से हमें बेवकूफ बना रही है. क्या वह निष्पक्ष होकर निर्णय लेंगे या पार्टी के दबाव में? जो भ हो अभी कुछ और दिन हमें लोकपाल के क़ानून में तब्दील होने की राह देखनी है. खुश होने की बात है पर अभी और इंतज़ार करना है, और देखना है कि लोकपाल बनने वाला क्या अपना काम सही तरीके से कर रहा है या वह भी हमारी दलगत राजनीति के फेर में फंसकर रह जाएगा.

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About Yogesh Mandhani

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