वो कौन है जिसने अन्ना को धोका दिया?

Kejriwal cheated Annaपिछले कई दिनों से दिल्ली चुनाव में पहली बार राजनैतिक जोर आज़माइश कर रही आम आदमी पार्टी पर आरोप लगते रहे है. किसी ने कांग्रेस की B टीम होने का आरोप लगाया तो किसी ने BJP की B टीम होने का आरोप लगाया. किसी ने अन्ना को धोका देने का आरोप लगाया तो किसी ने स्टिंग ऑपरेशन के ज़रिये AAP को फंसाने की कोशिश की. आरोपों के दौर से गुजर रही आम आदमी पार्टी ने हर आरोप का खंडन किया और अपने बचाओ में तर्क भी दिए. AAP ने राजनीती में उतरने पहले कभी सोचा नहीं होगा की राजनीती में इतनी गन्दगी है की जब आप इसे साफ़ करने के लिए उतारते है तो लोग आपको आपकी गंदगी दिखाने में ही उलझाये रखने का प्रयास करते है.

बहारहाल दो दिन से मोदी दिल्ली में थे. बीजेपी का चुनाव प्रचार करने पहुंचे थे. हर बार की तरह अपने मनमोहक भाषण में मनमोहन सिंह और कांग्रेस की जमकर निंदा की. लेकिन दिल्ली के उनके भाषणों में निशाना एक और तरफ भी था. वो निशाना था अरविन्द केजरीवाल और आम आदमी पार्टी की तरफ. वैसे तो 3 दिन पहले ही नितिन गडकरी ने कह दिया की AAP को 2-5 सीट मिलेगी जिससे बीजेपी को कोई फर्क नहीं पड़ता, लेकिन जब नरेन्द्र मोदी ने AAP पर निशाना साधा तो लगा की शायद AAP की लोकप्रियता इतनी बढ़ गयी है की मोदी सरीखे राष्ट्रीय स्तर के नेता को इसकी आलोचना करनी पड़ी.

मोदी ने कहा की AAP कांग्रेस के पैसो से चल रहा खेल है। अगर आम आदमी पार्टी के 20 करोड़ रुपियो की बात की जाये तो उसमे कांग्रेस का एक पैसा भी नज़र नहीं आता. 20 करोड़ के सभी 70000 से अधिक दानदाताओ के नाम पार्टी ने सार्वजानिक किया है. लेकिन सवाल ये नहीं है की आम आदमी पार्टी को पैसा किसने दिया, सवाल ये है की उस पार्टी को जो अपने दानदाताओ के नाम जनता से छिपाती है,क्या उसे एक दूसरी पार्टी पर ऊँगली उठाने का अधिकार है जिसने वित्तीय पारदर्शिता का नया कीर्तिमान स्थापित किया है? मोदी के पास अगर कोई साबुत है जिसमे वो ये साबित कर सके की AAP कांग्रेस के पैसो से चलने वाली पार्टी है, तो मोदी को उस साबुत को सार्वजनिक करना चाहिए. और अगर मोदी के पास ऐसा कोई साबुत नहीं है तो क्यों ये न माना जायें की मोदी देश में भ्रम फैला रहे है?

दिल्ली के चुनावो में ये बहुत व्यापक चर्चा रही की अरविन्द ने अन्ना को धोका दिया. लेकिन आज तक ये साबित नहीं हो पाया की अरविन्द अन्ना को धोका कैसे दिया. अन्ना और जनरल वीके सिंह ने जंतर मंतर पर साफ़ शब्दों में कहा की अब इस देश को राजनैतिक विकल्प देने की जरुरत है. राजनैतिक विकल्प के बगैर अब जनलोकपाल हासिल करना मुमकिन नज़र नहीं आता. बाद में अन्ना ने अपना बयान पलट दिया, क्यों पलटा और किसके कहने पर पलटा ये चर्चा का विषय नहीं है. लेकिन बड़ा विषय ये है की अन्ना अपनी बात से मुकर गए और केजरीवाल अपनी बात पर अटल रहे, तो इसमें अरविन्द ने अन्ना को धोका कैसे दिया? अगर एक मंजिल के लिए 2 लोग दो रास्तो पर चलते है और आपसी रजामंदी से चलते है तो क्या इसे धोका माना जायेगा? स्वतंत्रता संग्राम में गाँधी जी और सुभाष चन्द्र बोस ने भी अपने रास्ते अलग कर लिए थे, तो क्या ये माना जायेगा की सुभाष चन्द्र बोस ने गांधीजी को धोका दिया? लाल कृष्ण आडवानी जिनके चुनाव प्रचार की बदौलत बीजेपी 2 सीटो से 180 सीटो तक पहुंची, उन्होंने मोदी को PM पद का उम्मीदवार बनाने की घोषणा के बाद अपनी नाराजगी पार्टी अध्यक्ष को लिखी चिट्टी में दर्ज की और सभी बड़े पदों से इस्तीफा दे दिया. तो क्या इसे हम ये माने की बीजेपी ने अपने सबसे बड़े नेता को धोका दे दिया? दरअसल धोका देने की बात में कोई दम नहीं है, और इस बात को कोई साबित भी नहीं कर सकता, लेकिन भ्रम जरुर फैलाया जा सकता है. शायद बीजेपी और कांग्रेस फिलहाल यही कर रहे है. जिन पार्टियों ने 76 वर्ष के बुजुर्ग को 12 भूखा रखने के बाद उन्हें दिया हुआ आश्वासन तोड़ कर धोका दिया, आज उन्ही पार्टियों का अन्ना के प्रति सम्मान जताना हैरानी की बात है. लोगो को समझना चाहिए की अन्ना के नाम का इस्तेमाल केवल दिल्ली चुनाव में एक पार्टी को हराने के लिए किया जा रहा है.

मोदी ने नाम लिये बगैर केजरीवाल पर अन्ना को धोका देने का आरोप लगाया. मोदी यह भी कहा की केजरीवाल ने भ्रष्टाचार के खिलाफ चल रहे पवित्र आन्दोलन की पीठ में छुरा भोंकने का काम किया. मोदी ने अपने भाषणों में अन्ना की तारीफ़ करते हुए उनकी तुलना जयप्रकाश नारायण से की. लेकिन उनके भाषण के पीछे की राजनीति को समझना बेहद ज़रूरी है. हमने दिल्ली चुनाव से पहले मोदी के मुह से अन्ना और अन्ना के संघर्षरत मुद्दों पर कभी एक लफ्ज़ नहीं सुना. और जिस पवित्र आन्दोलन की बात मोदी कर रहे थे, उसकी असली मांग जनलोकपाल पर आज भी उनकी राय स्पष्ट नहीं है. वैसे भी गुजरात में जो नया लोकायुक्त कानून मोदी ने बनाया है, वो अन्ना के जनलोकपाल से बिलकुल उल्टा है.

अब सवाल ये उठता है की जब मोदी खुद अन्ना के मुद्दों को अमल में नहीं लाते, तो क्या उन्हें उन लोगो पर ऊँगली उठाने का नैतिक अधिकार जो अन्ना के मुद्दों को दिल्ली में लागु करने की बात कर रहे है? आजतक हमने मोदी के जितने भी भाषण सुने, उनमे तथ्य होते थे और आरोप लगाने के कारण होते थे. लेकिन मोदी ने केजरीवाल पर अन्ना को धोका देने का आरोप तो लगा दिया, लेकिन ये बताने में असमर्थ रहे की केजरीवाल ने अन्ना को धोका कैसे दिया. जिस जनलोकपाल के लिए अन्ना लड़ रहे थे, उस जनलोकपाल के लिए राजनैतिक संघर्ष का रास्ता अपनाना, जिसे पूर्व में अन्ना ने भी सही ठहराया था, क्या ये अन्ना से धोका है?

ऐन दिल्ली चुनावो से पहले अन्ना की आड़ में मोदी ने केजरीवाल को घेरने की कोशिश की. मोदी ने कहा की जो अन्ना का नहीं हो सका, वो आपका क्या होगा. लेकिन मुद्दा ये नहीं है की केजरीवाल अन्ना के हुए या नहीं हुए. मुद्दा ये है की क्या केजरीवाल और आम जनता अन्ना के लिए लड़ रहे थे या फिर जनलोकपाल कानून के लिए? अन्ना का नाम लेकर मोदी ने शायद राजनैतिक बेशर्मी का परिचय दिया. जिस अन्ना के एक बात आपने और आपकी पार्टी ने नहीं मानी, उस अन्ना का नाम आप अपने बयानों से लेकर किस नैतिकता का परिचय दे रहे है, ये भी सवाल उत्पन्न होता है। अन्ना 10 दिसम्बर को फिर से जनलोकपाल बिल के लिए रालेगन सिद्धि में अनशन पर बैठ रहे है, अगर मोदी को अन्ना के प्रति इतनी ही सहानुभूति और श्रद्धा है तो मोदी और बीजेपी के तमाम लोगो को उस अनशन में शामिल हो जाना चाहिये और बिना किसी शर्त के, जैसा लोकपाल अन्ना चाहते है, वैसा लोकपाल देने का आश्वासन बीजेपी को अपने घोषणा पत्र में देना चाहिए.

सवाल अन्ना से भी है. अन्ना ने पिछले दिनों अरविन्द को चिट्ठी लिख कर कहा की उनके नाम का इस्तेमाल राजनीति में नहीं होना चाहिए और अरविन्द केजरीवाल ने उसके उत्तर में अन्ना को आश्वस्त किया की वो उनके नाम का उपयोग न कर रहे है और नाही कभी करेंगे. लेकिन अन्ना के नाम का उपयोग अरविन्द केजरीवाल के विरोधी अरविन्द केजरीवाल के खिलाफ कर रहे है. जब अन्ना ने उनके नाम का उपयोग न करने का आदेश अरविन्द केजरीवाल को दिया, तो क्यों नहीं अन्ना ऐसा ही आदेश बीजेपी और कांग्रेस को देते है? अन्ना को राजनीती से मोह नहीं है और वे इस रास्ते को अपने लिए उचित नहीं मानते, लेकिन अन्ना की उन बयानों पर ख़ामोशी जिसमे बीजेपी और कांग्रेस  उनका नाम लेकर केजरीवाल को निशाना बना रहे है, उन्ही के एजेंडे के खिलाफ जा सकता है जिसमे वो देश को भ्रष्टाचार मुक्त करना चाहते है.

आजतक बीजेपी के अपरिपक्व और अधुरा ज्ञान रखने वाले अंधभक्त समर्थक केजरीवाल को धोकेबाज़ कहते रहे है. लेकिन आज मोदी ने भी ऐसे समर्थको के सुर में सुर मिलकर अपना ही स्तर नीचे किया है. बेहतर होता की मोदी AAP की नीतियों पर टिपण्णी करते, स्वराज और जनलोकपाल की खामिया गिनाते, ये साबित करते की जो बाते केजरीवाल कर रहे है, उन्हें हासिल किया ही नहीं जा सकता. लेकिन मोदी ने वो किया जो उनसे अपेक्षित नहीं था.

अन्ना ने जन लोकपाल के लिये 4 बार अनशन किये, ऑगस्ट में हुई क्रांति देश के इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों से लिखी जायेगी। संसद और तमाम पार्टियों को अन्ना की मांग के आगे झुकना पड़ा और पूरी संसद जिसमे बीजेपी के 166 सांसद शामिल है, उस संसद ने अन्ना की मांगो को मानते हुए सर्व सम्मति से एक प्रस्ताव पारित किया। उस प्रस्ताव का क्या हश्र हुआ, हम सब जानते है। इस प्रस्ताव के इस हश्र की जिम्मेदार अकेली कांग्रेस नहीं है, बीजेपी ने कभी इस प्रस्ताव को लेकर सदन में विरोध दर्ज नहीं किया। क्या बीजेपी के ये ख़ामोशी अन्ना के साथ धोका नहीं है? कुछ लोग कहते है कांग्रेस सहित सभी पार्टियों ने एक रणनीति के तहेत अन्ना से छल किया, इस बात में सच्चाई भी नज़र आती है क्योकि बीजेपी ने कभी अन्ना का या उनके मुद्दों का खुल कर समर्थन नहीं किया।

अब जनता तय करे की किसने किसको धोका दिया और क्या एक व्यक्ति का किसी एक व्यक्ति को धोका देना या न देना, चुनाव का मुद्दा बन सकता है? क्या ये मुद्दा दिल्ली के बिजली, पानी, सड़क स्कूल, अस्पताल आदि बुनियादी मुद्दों पर हावी हो सकता है? इस देश की जनता समझदार दिखती तो है, लेकिन यह समझदारी जनता को मतदान के दिन भी दिखानी होगी.

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About Yogesh Mandhani

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