क्योंकि सवाल मोदी का नहीं देश का है……

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बात लोकतंत्र की हो या राजसत्तात्मक संघर्ष की, बदलाव खामोशी से नहीं आते.महाभारत की शुरुआत में पांचजन्य का उद्घोष केवल प्रतीक भर नहीं है. पिछली छमाही में भारतीय लोकतंत्र ने दो बड़े बदलाव देखे. पहला दिल्ली में आम आदमी पार्टी का उदय, जिसमे जनआकांक्षाओं के उभार के साथ आन्दोलन से निकली एक पार्टी ने जहाँ एक शताब्दी से अधिक पुरानी पार्टी के पतन की गाथा लिखने की शुरुआत की, वहीँ देश कि दूसरी सबसे बड़ी पार्टी को भी बड़ी चुनौती दी. दूसरा बड़ा बदलाव पहले बदलाव का ही दूसरा अध्याय मात्र था, जिसमे कांग्रेस के पतन की गाथा पर मतदाताओं ने मुहर लगाई और तीस साल बाद किसी एक पार्टी को जनादेश देकर गठबंधन युग से मोहभंग की घोषणा की.

दोनों मौकों पर पदभार ग्रहण करने के लिए होने वाला शपथ ग्रहण समारोह चर्चा का विषय रहा. एक ओर अरविन्द केजरीवाल ने दिल्ली के आम-ओ-ख़ास को शपथ ग्रहण समारोह में आमंत्रित कर वीआईपी कल्चर की समाप्ति की उम्मीद जगाई, वहीँ नरेंद्र मोदी ने प्रधानमन्त्री शपथ ग्रहण समारोह की भव्यता को पश्चिम एशिया में भारत के उभार और राष्ट्र गौरव से जोड़कर अच्छे दिन आने के सपनों को पंख लगा दिए. एक ओर जहाँ पहले बदलाव के नतीजों को परखने के लिए हमारे पास समुचित तथ्य हैं वहीँ दूसरा बदलाव अभी शुरूआती चरण में है जिसके बारे में कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी.

बात आम आदमी पार्टी की करें तो लोकतान्त्रिक मान्यताओं और संवैधानिक संस्थाओं पर प्रहार कर आन्दोलन से निकली पार्टी के स्वराज का सपना अराजकता के भंवर में फंस कर रह गया है. केजरीवाल सरकार का समय से पहले गिरना (या जैसा कि कहा जाता है, स्वयं केजरीवाल द्वारा हड़बड़ी में गिराया जाना) दिल्ली के मतदाताओं की आशाओं पर तुषारपात था. इसका खामियाजा पार्टी को लोकसभा चुनाव में भी भुगतना पड़ा जहाँ ४३४ में से ४२१ सीटों पर पार्टी प्रत्याशी अपनी जमानत भी नहीं बचा पाए. केवल पंजाब में पार्टी के लिए कुछ सुखद हुआ लेकिन उसमे भी पार्टी के स्थानीय प्रत्याशियों को अपने दम पर विजय मिली है जिसमे कांग्रेस की केंद्र सरकार के खिलाफ तो भाजपा की राज्य सरकार के खिलाफ गुस्से ने आग में घी का काम किया है. आम आदमी पार्टी के केन्द्रीय नेतृत्व का योगदान पंजाब की जीत में न के बराबर रहा है, बल्कि आश्चर्यजनक रूप से कई अन्य राज्यों में पार्टी की करारी हार में केन्द्रीय नेतृत्व का महती योगदान रहा है. लोकसभा की हार और पार्टी संयोजक अरविन्द केजरीवाल के जमानत प्रकरण में यू-टर्न के बाद पार्टी नेता और कार्यकर्ता आमने सामने हैं. एक दो अपवादों को छोड़कर बाहर कोई कुछ नहीं कहना चाहता लेकिन छटपटाहट हर तरफ है. नव-क्रांति का पैगाम लेकर आई इस पार्टी की नियति अभी भविष्य के गर्त में हैं लेकिन आसार अच्छे नहीं हैं.

वहीँ दूसरी ओर एक ऐसे देश में, जो अपने पडोसी चीन से हर तरह से अधिक सम्भावना-पूर्ण और संसाधन संपन्न है लेकिन राष्ट्र गौरव की कमी जिसकी तरक्की में सबसे बड़ी बाधा है, नरेंद्र मोदी अपने शपथ ग्रहण को भव्य समारोह में तब्दील करके राष्ट्र गौरव की नींव डाल चुके हैं. चौबीस घंटे के खबरिया चैनलों को छोड़ भी दें तो देश के किसी भी शहर के गली कूचों, ठेलों खोमचों, चाय की छोटी छोटी दुकानों, रेलगाड़ियों, सरकारी बसों में दस मिनट बिताने पर ही आपको समझ में आएगा कि इस शपथ ग्रहण समारोह का आम मतदाता पर क्या असर पड़ा है. देश की अर्थव्यस्था के पिरामिड के आखिरी पायदान पर खड़े वर्ग को मानों पहली बार यह महसूस हो रहा है कि इस देश में लोकतंत्र अभी जिन्दा है और वे उसका हिस्सा हैं. इस से पहले कभी देश के प्रधान मंत्री के शपथ ग्रहण समारोह को इस तरह नहीं लिया गया. अंतर्राष्ट्रीय मीडिया हो, पडोसी देशों के राष्ट्राध्यक्ष हों, तथाकथित दुश्मन मुल्क हों या देश की जनता हो, सभी में एक गौरव मिश्रित उत्सुकता का भाव है कि अब आगे क्या?

इस शपथ ग्रहण समारोह के भावनात्मक पक्ष को छोड़ भी दें तो बहुत सी ऐसी बातें हैं जो इस समारोह को भारत के उत्थान में बड़े कदम के तौर पर स्थापित करती हैं. सार्क देशों के राष्ट्राध्यक्षों को बुलाकर नरेंद्र मोदी ने मास्टरस्ट्रोक खेला है. १९८५ में अस्तित्व में आया सार्क १९९४ के ‘दक्षिण एशिया मुक्त व्यापर क्षेत्र (साफ्टा)’ समझौते के बाद भी कोई बड़ा असर आपसी व्यापार पर छोड़ने में नाकामयाब रहा था. पिछली सरकार (पूरे दस साल) के दौरान भी पडोसी देशों से रिश्ते सुधारने की कोई सकारात्मक पहल कभी दिखाई नहीं दी. ऐसे में नई सरकार की शुरुआत ही स्वागत योग्य है. अगर सुषमा स्वराज के नेतृत्व में विदेश मंत्रालय इस पहल को गति प्रदान कर पाया तो यह सामरिक, कूटनीतिक और आर्थिक तीनों मोर्चों पर एक बड़ी छलांग होगी. इन देशों के बीच सम्बन्ध मजबूत होने का सीधा प्रभाव इन सभी देशों की आर्थिकी पर भी पड़ेगा. अभी तक एक गैर-महत्वपूर्ण व्यापारिक संगठन के तौर पर जाने जाने वाले सार्क के आठ देशों का कुल सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) विश्व जीडीपी के केवल दो प्रतिशत के बराबर है जबकि यहाँ विश्व कि बीस प्रतिशत आबादी निवास करती है. अगर कुछ सकारात्मक नतीजे इस पहल से निकलते हैं तो निस्संदेह नरेंद्र मोदी प्रशंसा के पात्र होंगे.

देश के अंदरूनी माहौल पर नजर डालें तो १६ मई से लेकर अब तक निस्संदेह अल्पसंख्यक समुदाय ने भी राहत की सांस ली होगी, जिसे चुनाव प्रचार के दौरान एनडीए और खास तौर पर भाजपा के कट्टरपंथ का हौवा लगातार दिखाया गया. लेकिन उत्साहजनक नतीजों के बावजूद भाजपा और घटक दलों का संयम सराहनायोग्य है और चुनाव-विश्लेषकों का यकीन करें तो जिन मुस्लिम मतदाताओं ने नरेंद्र मोदी के विकासवादी एजेंडे में विशवास जताया था उन्हें अपने फैसले पर खुशी हुई होगी. उम्मीद है कि नरेंद्र मोदी समाहितवादी हिंदुत्व और अल्पसंख्यक सहभागिता की पतली और धारदार रस्सी पर चलते हुए भारतीय लोकतंत्र की अपनी यात्रा पूरी करेंगे. एक तथ्य यह भी है कि अगर इसके बाद भी कहीं साम्प्रदायिक सौहार्द बिगड़ता है तो उसका फायदा एनडीए के राजनैतिक विरोधियों को मिलेगा और किसी भी क़त्ल की जाँच में उठने वाले साधारण सवाल की यहाँ उपयोगिता है कि दोषी वही होगा जिसे इस घटना से फायदा होगा.

खैर! अभी तो सारा देश, मीडिया, और एक हद तक सम्पूर्ण विश्व भी, नरेंद्र मोदी के करिश्मे में बंधे दिखाई देते हैं. देखना यह है कि यह हालात कब तक बने रहते हैं और यही नरेंद्र मोदी की कबिलियत की परीक्षा है. विरोध की छिटपुट आवाजें उठाने वालों से भी मेरा व्यक्तिगत अनुरोध है कि समय गुजरने दें, विरोध नतीजों पर करें फैसलों पर नहीं. जनता देख रही है, नकारात्मक राजनीति की हांडी लम्बे समय तक इस्तेमाल नहीं हो पाती, खुद को मजबूत करें और इन्तजार करें मोदी सरकार की पहली गलती का. उसके पहले की गई हर आलोचना नरेंद्र मोदी को मजबूत और आपको कमजोर करेगी. दिल से दुआ है कि लम्बे समय से निराशा के गर्त में डूबे देश में उत्साह का संचार करने वाले मोदी कामयाब हों क्योंकि सवाल नरेंद्र मोदी, राहुल गांधी या अरविन्द केजरीवाल का नहीं है, देश का है.

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About Satish Sharma

Satish Sharma is Editor, Hindi of Awaz Aapki. Writes in many News Papers & Magazines as Columnar, Analyst. Like to work as Citizen Journalist. Doing his bit of work in raising voice of unheard. Currently he is managing two shows of Awaz Live TV named Mashal and Manthan also.

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