केदारनाथ का दोषी कौन ? भाग 6 (यात्रा का मौजूदा हाल)

दूर कहीं बैठकर 24 घंटे खबर देने वाले चैनलों की खबर पर यकीन करें तो पूरा उत्तराखंड तबाह हो गया है इस बरसात में आई आपदा के बाद, लेकिन उत्तराखंड की सडकों पर उतरेंगे तो बात अलग दिखेगी. उत्तराखंड में प्रवेश करते वक्त कहीं से लगता नहीं कि यह उत्तर प्रदेश से कुछ अलग है. वहीँ मैदानी इलाका, वही धान और गन्ने के खेत और लगभग वही आबोहवा. सत्तर किलोमीटर निकलने के बाद जब पर्वत चोटियां दिखने लगती है तो पता लगता है हरिद्वार आ गया, जो पहले की तरह ही गुलजार है.

ऋषिकेश के आगे घुमावदार पहाड़ी रास्तों पर चलते हुए पता ही नहीं लगता कि यह उसी प्रदेश का रास्ता है जो लगभग छः महीने पहले आई आपदा में पूरी तरह तबाह हो गया था. फिर भी कहीं कहीं भूस्खलन के निशान बरसाती तांडव की याद दिलाते हैं. इस बरसात में आई तबाही का पहला बड़ा निशान देवप्रयाग से बीस किलोमीटर आगे दिखाई देता है जहाँ भूस्खलन के बाद सड़क पर बनी पुलिया का आधे से ज्यादा हिस्सा बह चुका है और एक समय पर एक ही वाहन निकल सकता है वह भी कुशल चालक के साथ. आस पड़ोस के गाँव के कई युवक यहाँ यही सेवा देने आते हैं. एक गाड़ी निकालने का बीस रुपया. पहाड़ के रास्तों से अंजान चालक इस सेवा का लाभ भी उठाते हैं और सरकार दावों पर हैरानी भी जताते हैं जो सभी सड़कों के ठीक होने की बात कहती है.

गढ़वाल विश्विद्यालय के मुख्यालय और उत्तराखंड की छात्र राजनीति के गढ़ माने जाने वाले श्रीनगर में घुसते ही अंदाजा हो जाता है कि सरकारी विज्ञापनों में जिन जख्मों के भरने का दावा किया जा रहा है वे घाव कितने गहरे हैं. नौकरीपेशा लोगों का यह शहर गवाह है उस तबाही का जिसमें बरसात के बाद उफनती नदी का पानी श्रीनगर के निचले इलाकों में घुस आया था, और जब पानी वापस गया तो अपने पीछे छोड़ गया दस से बीस फुट ऊचे रेत के पहाड़ जिनके नीचे लगभग एक हजार मकानों की एक एक मंजिल दब चुकी है. पिछले पांच महीने में सरकारी मदद के वादे कई बार हुए पर मदद के तौर पर मिले तो केवल आठ हजार रुपये, जिनसे न घर से रेत निकाली जा सकती थी न अन्दर के सामान के हर्जाने की भरपाई हो सकती थी. अभी भी कई इलाकों में आप जायेंगे तो मकान की छत तोड़कर रेत बाहर निकलवाते लोग मिल जायेंगे. पूछेंगे तो पता लगेगा कि मजदूरों के साथ काम करने में मालिक भी लगे हुए हैं ताकि कुछ लागत बचाई जा सके. गौरतलब बात यह है कि जो मलबा घरों में घुस आया वह श्रीनगर से पांच किलोमीटर आगे बनते डैम का था जिसे सरकारी दावों के अनुसार उत्तराखंड के मैदानी इलाकों में फिंकवाया जाना था लेकिन ऐसा नहीं हुआ इसलिए उस रात जब नदी में पानी चढ़ा तो आसपास लगे मलबे के ढेर भी उसी पानी का हिस्सा बन गए और आधा शहर अब मलबे का ढेर बना नजर आता है.

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श्रीनगर से बाहर निकलते ही नदी के निचले इलाके में धारी देवी का वह मंदिर नजर आता है जिसके बारे यह मान्यता है कि इस मंदिर की मूर्ति से छेड़छाड़ करने के कारण ही उत्तराखंड में आपदा आई. दरअसल श्रीनगर डैम की राह में बाधा बना यह मंदिर टिहरी राजपरिवार की कुलदेवी का माना जाता है जिसे हटाने के सवाल पर लगभग दो साल से स्थानीय निवासी और प्रशासन आमने सामने थे. अंत में जीत पूँजी के दम पर चलती सरकार के सामने हाथ बांधे खड़े मगर जनता से दो दो हाथ करने को हरदम उत्सुक प्रशासन की हुई और इस मामले का दूसरा सच यह भी है कि धारी देवी मंदिर की प्रतिमा के विस्थापन के चंद घंटे बाद ही केदारनाथ में यह तांडव शुरू हुआ. आपदा के बाद भी जहाँ एक ओर सरकारी प्रशासन इस मान्यता को मानाने से इनकार करता रहा वहीँ खुद मुख्यमंत्री चोरी से आकर उस यज्ञ में शामिल हुए जो धारी देवी से माफ़ी मांगने के लिए किया जा रहा था. यह सब तब हो रहा था जब उत्तराखंड के पहाड़ों पर सेना के हेलिकोप्टर यात्रियों को बचाने के लिए उड़ान भर रहे थे. अब यह मंदिर नदी के बीचोबीच स्तंभों के सहारे टिकाया गया है और प्रतिमा स्थापना के बाद पूजा विधिवत शुरू हो गई है.

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(जारी……..)

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About Satish Sharma

Satish Sharma is Editor, Hindi of Awaz Aapki. Writes in many News Papers & Magazines as Columnar, Analyst. Like to work as Citizen Journalist. Doing his bit of work in raising voice of unheard. Currently he is managing two shows of Awaz Live TV named Mashal and Manthan also.

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