केदारनाथ का दोषी कौन ? भाग 3 (मीडिया की नजर से)

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उत्तराखंड में १६ जून २०१३ को हुए हादसे के बाद सरकार की ओर से दावों और वादों की जैसे झड़ी लग गई लेकिन एसी कमरों में बनी योजनायें धरातल पर कितनी उतर पाई हैं. उत्तराखंड में ताजा हालात को लेकर आवाज आपकी की जांच में कुछ चौंकाने वाले तथ्य सामने आये हैं जिन्हें हम लगातार आपके सामने रखते रहेंगे. लेकिन उसके पहले १६ जून से लेकर अब तक सरकार द्वारा किये गए दावों को लेकर और उनके क्रियांवयन को लेकर अब तक मुख्य अखबारों में छपी खबरों के माध्यम से इसे समझने का प्रयास करेंगे जिसकी तीसरी कड़ी (पढ़िए पहली कड़ी) (पढ़िए दूसरी कड़ी) आपके सामने हैं:-

उत्तराखंड: हरिद्वार रेलवे स्टेशन पर पड़ी सड़ रही है राहत सामग्री
15 July 2013, आपदा के बाद जहां हजारों लोग भूखे प्यासे हैं वहीं हरिद्वार रेलवे स्टेशन पर पड़ा राहत का सामान सड़ने के कगार पर पहुंच चुका है। रेलवे के कर्मचारियों से जब पूछा गया कि आखिर जरूतमंदों के लिये भेजा गया ये सामान यहां क्यों पड़ा हुआ है तो उन्होंने बताया कि सारा सामान हरिद्वार के डीएम के नाम से आता है और जब तक कागजी कार्रवाई पूरी नहीं होती सामान रिलीज नहीं किया जा सकता। दूसरी तरफ जिला प्रशासन के आलाधिकारी इस मुद्दे पर सरकारी नियम समझाते नजर आये। वहीं केंद्रीय मंत्री और हरिद्वार से कांग्रेस सांसद हरीश रावत आलाधिकारियों से जवाब मांगने की बात कहकर अपना पल्ला झाड़ते नजर आये।

उत्तराखंड आपदा: आज से मिलेगा मुआवजा
16 July 2013, उत्तराखंड आपदा के शिकार लोगों के परिजनों को आज से मुआवजा देने का काम शुरू हो जाएगा। उत्तराखंड के मृतकों के परिजनों को पांच-पांच लाख रुपए जबकि दूसरे राज्यों के मृतकों के लिए साढ़े तीन लाख के मुआवजे की राशि तय की गई है। मुआवजा लेने के लिए परिजनों को उत्तराखंड जाने की जरूरत नहीं है उन्हें ये रकम सरकारी स्तर पर घर पहुंचाई जाएगी।

उत्तराखंड त्रासदी: पर्वतीय क्षेत्रों में डाप्लर रडार स्थापित करने की मांग , कैग ने भी उठाई थी लापरवाही पर उंगली
17 July 2013, बादल फटने, तूफान, चक्रवात और बारिश जैसी आपदाओं के बारे में सटीक भविष्यवाणी के लिए देश के विभिन्न हिस्सों में 14 डाप्लर रडार लगाये गए लेकिन उत्तराखंड में अभी तक एक भी डाप्लर रडार स्थापित नहीं किया गया है। कैग की रिपोर्ट में कहा गया है कि आपदाओं से निपटने की तैयारी के लिए उपग्रह से चित्र लेने से जुड़ी नेशनल डाटाबेस फार इमजेसी मैनजमेंट परियोजना 2006 में शुरू की गई थी जो अभी तक पूरी नहीं हुई है। बाढ़ की संभावना वाले क्षेत्र का मानचित्र तैयार करने से जुड़ी एयरबोर्न लेजर टिरेन मैपिंग एंड डिजिटल कैमरा सिस्टम परियोजना 2003 में शुरू की गई थी और वह भी अभी पूरी नहीं हो सकी है। बाढ़ की चेतावनी और इससे जुड़े आंकड़े जुटाने से संबंधित सिंथेटिक एपरचर रडार परियोजना 2003 में शुरू हुई और अभी तक पूरी नहीं की जा सकी । सेटेलाइट आधारित संचार नेटवर्क परियोजना 2003 में शुरू की गई और अभी पूरी नहीं हुई है। डाप्लर मौसम रडार परियोजना 2006 में शुरू हुई है और अभी भी जारी है।

उत्तराखंड: कैग की रिपोर्ट पर ध्यान दिया होता तो इतना बुरा हाल ना होता
19 July 2013, कैग रिपोर्ट के मुताबिक ऐसी मुसीबतों से निपटने के लिए साल 2007 में STATE DISASTER MANAGEMENT AUTHORITY को बनाया गया था लेकिन इस प्राधिकरण कभी कोई गाइडलाइंस तय ही नहीं किए। इसी काम के लिए बनाई गई STATE EXECUTION COMMITTEE ने एक बार बैठक तक करने की ज़हमत नहीं उठाई।रिपोर्ट में साफ तौर पर आगाह किया गया था कि राज्य का कोई DISASTER MANAGEMENT PLAN नहीं हैं। कैग ने उत्तराखंड की करीब 245 जल-विद्युत परियोजनाओं को भी इस खतरे की दावत करार दिया था।रिपोर्ट के मुताबिक इनमें से 38 फीसदी परियोजनाओं ने पेड़ लगाने का काम ना के बराबर किया। किसी भी प्रोजेक्ट को बाढ़ के मद्देनज़र डिजाइन नहीं किया गया। नदियों की गाद इन परियोजनाओं की सुरंगों में फंसने लगी और इसके चलते बाढ़ का खतरा बढ़ा। अब उत्तराखंड की सरकार हर तरफ़ मदद की गुहार लगा रही है। लेकिन कैग की इस रिपोर्ट को क्यों ठंडे बस्ते में डाला गया इसका जवाब मुख्यमंत्री के पास नहीं है।

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About Satish Sharma

Satish Sharma is Editor, Hindi of Awaz Aapki. Writes in many News Papers & Magazines as Columnar, Analyst. Like to work as Citizen Journalist. Doing his bit of work in raising voice of unheard. Currently he is managing two shows of Awaz Live TV named Mashal and Manthan also.

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