केदारनाथ का दोषी कौन ? भाग 1 (शुरुआत से पहले)

Kedarnathउत्त्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले की केदार घाटी में 16 जून को आई आपदा के बाद से अब तक लगभग पांच महीने बीत चुके हैं लेकिन केंद्र और प्रदेश सरकार के द्वारा हो रहे हवाई दावों के विपरीत जमीनी हालात जस के तस हैं या शायद पहले से बदतर हैं. यहाँ के आम लोगों से बात करेंगे तो हकीकत जिस प्रकार नंगी होकर सामने आती है उसे देखकर प्रशासन और नेतागणों के अलावा समाज के लगभग हर तबके की आँखें झुक जाती हैं. मुख्यमंत्री की प्रेस कांफ्रेस में होने वाले दावे और वादों के विपरीत उत्तराखंड के एक बड़े हिस्से को अभी भी आपदा राहत मिलने का इंतज़ार है. देहरादून के एसी कमरों में मीडिया को मिलने वाली ब्रीफिंग और जमीनी हालात के इसी फर्क को देखते हुए आवाज आपकी ने गहन छानबीन की है जो अगले कुछ समय में रिपोर्टों की एक कड़ी के रूप में आपके सामने आएगी. फिलहाल बात 16 जून के बाद अब तक हुए सफ़र की करेंगे.

16 जून को आई आपदा की खबर 17 और 18 जून तक तथाकथित मुख्यधारा के मीडिया तक पहुँच पाई. इससे पहले मुख्यमंत्री जी तीन बार ऐसी किसी भी आपदा के आने की बात से ही इनकार कर चुके थे. उनका कहना केवल यह था कि तेज बारिश के कारण संपर्क इलाके से टूट गया है इसके अलावा कुछ भी नहीं. लेकिन जब हालात टीवी पर दिखाई दिए तो भी सरकारी हठ खुद को सही साबित करने में लगा रहा और सेना के बुलाने को अपनी हेठी समझता रहा. भला हो उत्तराखंड कांग्रेस में चलती गुटबाजी का, जिसके कारण केन्द्रीय जल संसाधन मंत्री हरीश रावत ने (मुख्यमंत्री को नीचा दिखाने के लिए, जैसा कि अंदरूनी सूत्र मानते हैं) सेना का आह्वान कर दिया अन्यथा जान माल का नुक्सान कितना और बढ़ जाता इसका अंदाजा लगाना मुश्किल है. सेना ने अपना अभियान शुरू किया और लाखों लोगों तक राशन सामग्री भी पहुंचाई और बाहर से आये पर्यटकों को सुरक्षित तरीके से बाहर भी निकाला.

इस दौरान भी नेताओं को कैमरों के सामने बयान देने और हवाई दौरों के अलावा कुछ और सूझा हो ऐसा कभी लगा नहीं. स्थानीय नेताओं के द्वारा हैलिकोप्टरों के बेजा इस्तेमाल को लेकर आवाज आपकी के साथ साथ अन्य मीडिया माध्यमों में खबर भी छपी थी जिसके असर से मुख्यमंत्री जी ने किसी भी नेता के हवाई दौरे पर प्रतिबन्ध लगा दिया. यह प्रतिबन्ध अगले दिन ही टूट गया जब कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गाँधी का उत्तराखंड आगमन हुआ. उनकी सेवा-सुरक्षा में आईटीबीपी के लगभग दो सौ जवान और तीन सरकारी विमान लग गये. इन्हीं संसाधनों से कितने लोगों की जान बचाई जा सकती थी यह सवाल गौर करने लायक है.

पंद्रह दिन तक चले सबसे बड़े सैन्य बचाव अभियान की बदौलत लगभग एक लाख पर्यटकों को बाहर निकाला गया. अब तक भी सरकारी अमला केवल कुछ लोगों के मरने की बात करता रहा जबकि केदारनाथ के मलबे में दबी लाशें इस बात की गवाह थी यह संख्या दहाई या सैकड़ों में नहीं बल्कि हजारों में पहुँचने वाली है. लगभग पंद्रह दिन बाद जब सेना ने अपने बचाव अभियान के ख़त्म होने की औपचारिक घोषणा की तो मुख्यधारा का मीडिया, जो अब तक राहत अभियान के एक एक मिनट को लाइव दिखाने का दावा कर रहा था, भी आपदा पर्यटन के ख़त्म होने की घोषणा करते हुए दिल्ली के एसी स्टूडियोज में बंद हो गया.

लगभग एक लाख पर्यटकों को भले ही सेना की कर्मठता के कारण बचा लिया गया हो लेकिन उत्तराखंड के लाखों बाशिंदों के लिए यह आपदा की केवल शुरुआत भर थी. पांच जिलों में फैली यह आपदा दूर दराज के सभी इलाकों से मुख्य शहरों का संपर्क काट चुकी थी. इन लोगों के लिए सरकार क्या कर पाएगी इसको लेकर कोई भी अंदाजा ना तो स्थानीय लोगों को था और ना खुद सरकार को. मुख्यमंत्री ने बड़े बड़े दावे किये जिनकी छानबीन आवाज आपकी ने की है. अगले कुछ दिनों में अलग अलग जगहों से की गई रिपोर्ट के माध्यम से हम आप तक जमीनी सच्चाई पहुंचाने का प्रयास करेंगे. जारी…….

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About Satish Sharma

Satish Sharma is Editor, Hindi of Awaz Aapki. Writes in many News Papers & Magazines as Columnar, Analyst. Like to work as Citizen Journalist. Doing his bit of work in raising voice of unheard. Currently he is managing two shows of Awaz Live TV named Mashal and Manthan also.

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