देवयानी मामला – बतकहियों के उस्ताद हैं हम

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भारतीय राजनयिक देवयानी खोब्रागडे के खिलाफ मुकद्दम न हटाने का अमेरिकी सरकार का फैसला अप्रत्याशित नहीं है. इसकी उम्मीद पहले से की जा रही थी, शायद सरकार के स्तर पर भी, क्योंकि इसके बाद कोई भी सरकारी अधिकारी इस मामले पर कड़ी प्रतिक्रिया देने से बचा जैसा कि इस दुर्भाग्यपूर्ण काण्ड के पहले सप्ताह में दिखाई दे रहा था जब लगभग हर भारतीय सांसद इस मामले को भारतीय अस्मिता का प्रश्न बताने पर तुला था. तो क्या अमेरिका का रवैया अड़ियल है? या भारत की तथाकथित अस्मिता की कोई परवाह अमेरिकी अधिकारियों को नहीं है? शायद मामला कुछ और है.

दरअसल इस मामले में यह फैसला प्रत्याशित इसलिए था कि भारत सरकार ने कोई भी कडा सन्देश अमेरिकी सरकार को नहीं दिया था. बड़ी बड़ी बातों के जल में मत फंसिए, यही हमारी कमजोरी है. हम सुनते अधिक हैं पढ़ते कम हैं. इस मामले पर भारत की कड़ी प्रतिक्रिया केवल सांसदों के तीखे तल्ख़ बयानों, जो उनकी राजनैतिक मजबूरी थे, और अमेरिकी दूतावास के अधिकारियों को दी गई एक तरफ़ा सुविधाएँ वापस लेने तक सीमित रही. ध्यान रखिये, एक तरफ़ा दी गई सुविधाएं. सवाल यह है कि अगर ये सुविधाएं एक तरफ़ा थी तो दी क्यों गई? और आखिर इन सुविधाओं को वापस लेने से क्या कोई राजनयिक सन्देश जाता है? नहीं.

इन सुविधाओं का सच यह था कि भारत सरकार अमेरिकी दूतावास के अधिकारियों को स्पेशल एयरपोर्ट पास प्रदान करती रही है जिस पर व्यक्तिगत पहचान के अंकित होने का कोई प्रावधान नहीं है. मतलब आपका पास मैं भी इस्तेमाल कर सकता हूँ. यही होता भी है. अमेरिकी दूतावास के चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी भी ए और बी वर्ग को दी इस सुविधा का इस्तेमाल करते हैं. इसके अलावा भी भारत की दरियादिली का तो आलम यह है कि अमेरिकी कौंसलर अधिकारियों के परिवारजनों को भी भारतीय पहचान पत्र जरी कर दिए जाते हैं जबकि कोई समझौता भारत सरकार को इसके लिए बाध्य नहीं करता. तो क्या यह गुलाम मानसिकता और भारतीय कानून को भारतीयों द्वारा तुच्छ समझे जाने का मामला नहीं है? बिलकुल है.

दूसरी तरफ अमेरिकी रुख को देखें तो अमेरिका भारतीय अधिकारीयों को न तो किसी प्रकार की कोई अतिरिक्त सुविधा प्रदान करता है, और न ही अपने कानून से उल्लंघन के किसी प्रकार के कृत्य के लिए माफ़ करता है. पहली नजर में यह किसी भी देश के सरकारी तंत्र द्वारा अपने देश की संप्रभुता और एकता की रक्षा का प्रयत्न लग सकता है लेकिन इसकी पोल तब खुल जाती है जब दो अलग अलग मामलों को बारीकी से देखते हैं जो 48 घंटे के अंतराल में हुए.

पहला मामला रूस के राजनयिकों पर धोखाधड़ी के आरोपों को लेकर था जिसमे अमेरिकी अभियोजक प्रीत भरारा ने 49 रूसी राजनयिकों पर 15 लाख अमेरिकी डॉलर की धोखाधड़ी का मामला दर्ज कराया था जो अमेरिकी कानून के तहत संगीन अपराध की श्रेणी में आता है. लेकिन इस मामले में अभी तक कोई गिरफ्तारी नहीं हुई है, सरेआम हथकड़ी और कपडे उतारकर तलाशी के बाद शातिर मुजरिमों के साथ रखने की बात तो दूर है. दूसरी ओर उपरोक्त मामले के ४८ घंटे बाद आये ऐसे मामले को देखें जो एक भारतीय राजनयिक द्वारा अपने घरेलू नौकर को कम वेतन देने से सम्बंधित है. इस मामले में अति-सक्रियता दिखाते हुए न केवल घरेलू नौकर के भारत में रह रहे परिवार को ट्रैफिकिंग वीजा के तहत अमेरिका बुलाकर सुरक्षा दी गई बल्कि भारतीय राजनयिक को सरेआम उस वक्त गिरफ़्तार किया गया जब वे अपने बच्चों को स्कूल छोड़ने गई थी. उन्हें सरेआम हथकड़ियाँ लगाईं गई, कपड़े उतार कर तलाशी ली गई और शातिर अपराधियों के साथ रखा गया. गौरतलब है कि देवयानी के ऊपर लगे आरोप संगीन अपराध की श्रेणी में नहीं आते. यह मामला राजनयिक छूट से अधिक दुर्व्यवहार का है. क्या भारत और रूस को लेकर अमेरिकी कानून की परिभाषा अलग है या सरकार की प्रतिबद्धता? शायद अमेरिकी सरकार को एहसास है कि भारत सरकार में रीढ़ की हड्डी कितनी मजबूत है.

भारत सरकार इस मामले के बाद भी इतना साहस नहीं कर पाई कि अपने नए राजदूत को अमेरिका में पदभार ग्रहण करने से तब तक रोक ले जब तक अमेरिका अपने रवैये में सुधार के संकेत न दे. एक नई खबर यह भी आई है कि इस मामले के बाद भारत सरकार ने उपहार स्वरुप अमेरिकी सरकार को एक अरब अमेरिकी डॉलर से अधिक के हथियार सौदे से उपकृत किया है. भारत सरकार ने छः सी-130 जे सुपर हरक्युलिस एयरक्राफ्ट की सप्लाई का तोहफा अमेरिका को दिया है.

जय भारत! (यह केवल नारा है, जैसा कि भारत में अक्सर चलता है.)

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About Satish Sharma

Satish Sharma is Editor, Hindi of Awaz Aapki. Writes in many News Papers & Magazines as Columnar, Analyst. Like to work as Citizen Journalist. Doing his bit of work in raising voice of unheard. Currently he is managing two shows of Awaz Live TV named Mashal and Manthan also.

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