देश और हम

na 3स्वाधीनता दिवस के आसपास के दिनों में देशवासी देशप्रेम से ओतप्रोत होने लगते हैं .जननी जन्म भूमि , मातृभूमि , देश प्रेम , देश पर न्योछावर होने का जज्बा हवा में घूमने लगता है .मगर तब भी देश की और हमारी हालत ऐसी क्यों है .इस पर कोई विचार नहीं करता है .

शांत मन और विवेक से सोचें तो स्पष्ट है कि हमारे होने में देश का कोई योगदान नहीं है उसके लिए हमारे माता पिता ही पर्याप्त हैं और हम एक भौतिक इकाई हैं जब कि देश एक अमूर्त इकाई है .वह कहीं होता नहीं है. हम उसे मान लेते हैं. उसे मानचित्र से प्रमाणित करते हैं . यह देश की इकाई भी स्थाई नहीं है . कल तक जो हमारा देश था .आज पाकिस्तान बन गया .कल तक जो पाकिस्तान था अब कट कर बंगला देश बन गया .

हमें अपने देश की संस्कृति और इतिहास पर गर्व करना सिखाया जाता है यहाँ तक कि उसके पहाड़ों ,नदियों और पेड़ पौधों और मौसम पर भी गर्व करना सिखाया जाता है . एक बात आपको जान लेनी चाहिए कि सभी देशों में यही सिखाया जाता है . बच्चों का बाल मन यह स्वीकार कर भी लेता है कि मेरा देश ही दुनियां में सर्वश्रेष्ट है .यूरोप का कोई देश हो या अफ्रीका का कोई देश , सभी अपने देश को महानतम मानते हैं और किसी दूसरे देश को श्रेष्ठ क्या अपने समकक्ष मानने में भी वे कठिनाई महसूस करते हैं .

अजब बात यह है जब ये लोग बड़े होते हैं और किसी और देश में जा बसते हैं तो अपने मूल देश को भूल जाते हैं फिर वे अपने नए देश को अपना लेते हैं और वही उन्हें महान लगने लगता है .जैसी भारतीयों को अमरीका जाने पर लगता है या आज हम भूले बैठे हैं कि हमारे पूर्वज इरान ,ईराक अफगानिस्तान ,समरकंद ,चीन अफ्रीका और न जाने कहां कहां से आए थे .

वास्तव में देश एक प्रशासनिक राजनैतिक इकाई है .अपनी सुरक्षा और व्यवस्था के लिए समाज उसे बनाता है .इस व्यवस्था के कई मॉडल हैं वह राजशाही हो सकती है .लोकतंत्र हो सकता है .लोकतंत्र का कमुनिस्ट मॉडल हो सकता है और इनका मिला जुला रूप भी हो सकता है .

प्रत्येक देश अपने नागरिकों को अपनी भौगोलिक सीमा में बसाता है उसके अधिकार और कर्तव्य निर्धारित करता है .इसके बदले वह उन्हें सुरक्षा और व्यवस्था देने का वायदा करता है .वह .उनकी संख्या, शिक्षा ,स्वास्थय ,आय और व्यय पर नजर रखता है .अपने नागरिकों से कर लेता है और उन पर अपनी आय व्यय करता है .वह यह इसलिए करता है जिस से यह देश नाम की व्यवस्था ठीक ढंग से चलती रहे .

इस व्यवस्था को बनाए और चलाये रखने के लिए वह नियम कायदे और कानून बनाता है एक दंड व्यवस्था बनाता है .वह अपने नागरिकों को इस संहिता के अनुसार चलने के लिए बाध्य करता है .जो उस का पालन नहीं करता उसे दंड दिया जाता है . अब व्यक्ति इश्वर द्वारा पृथ्वी पर भेजा गया स्वतंत्र आत्मा नहीं है .वह एक देश का नागरिक है जिसे उस देश के नियमों का पालन करना है .वह उतना ही स्वतंत्र है जितना उस देश का कानून उसे स्वतंत्र होने की अनुमति देता है .

इस अवधारणा से देखें तो व्यक्ति , देश के मुकाबले कमजोर पड़ जाता है .देश नाम की व्यवस्था चलाने वाले लोग ,लगातार उसके दिमाग में भरते रहते हैं कि देश आदमी से बड़ा है .हमें देश पर कुर्बान होने को तैयार रहना चाहिए .महान नेता कहते हैं कि यह मत सोचो कि देश ने तुम्हें क्या दिया यह सोचो कि तुम ने देश को क्या दिया .कहते हैं कमुनिस्ट देशों में तो यह विचार नागरिकों के दिमाग में इस सीमा तक भर दिया जाता है कि वह मानने भी लगता है कि वह कुछ नहीं ,देश ही सर्वोपरि है . वह यांत्रिक मानव की तरह कमांडर के आदेश पर अपना उत्सर्ग करने को सदा तैयार रहता है .

प्राचीन देशों या विकसित देशों में , अपने इतिहास और संस्कृति को लेकर ,एक अहंकार का भाव होता है कि वे अपने सामने दूसरे देशों के नागरिकों को या दूसरे देशों को कमतर ही मानते है . दूसरे महायुद्ध के समय जर्मनी और इटली में यही भाव था .अमरीका आज अपने को सर्वशक्तिमान मानता है .भारत भी अपने वेद पुराण और धर्म धारण के कारण अपने को श्रेष्ठ मानता है .

देश की सरकारें लगातार ऐसी व्यवस्था बानाती रहती है जिस से वे अपने नागरिकों पर निगरानी और नियंत्रण रख सकें .कहने को को यह कहा जाता है कि ये व्यवस्था देश की सुरक्षा और नागरिकों और देश हित में बनाई जा रही है किन्तु इसका वास्तविक लक्ष्य निगरानी और नियंत्रण ही होता है .आधार कार्ड ,इलोक्ट्रोनिक मनी ट्रांसफर , मोबाईल नेटवर्क पर निगरानी ऐसे ही उपाय हैं .इस व्यवस्था में नागरिक की निजता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता निगरानी के दायरे में आ जाती है और अप्रत्यक्ष रूप से उसकी स्वतंत्रता बाधित होती है .

यह समझा जा सकता है कि आज की व्यवस्था में देश शक्तिशाली होता जा रहा है और आम नागरिक कमजोर होता जा रहा है .कितु यह बात देश के सभी नागरिकों के बारे में सत्य नहीं है . देश की व्यवस्था के संचालन में लोगों ने अपने लिए ,इस व्यवस्था में ,अपने लिए एक नई व्यवस्था बना ली है .

देश में कहने को तो कानून सब के लिए समान है किन्तु पुलिस किसी बड़े सरकारी अफसर को गिरफ्तार नहीं कर सकती .संसद के संसद सदस्य को भी गिरफ्तार करने से पहले अध्यक्ष की अनुमति लेना अनिवार्य है .न्यायपालिका के लोगों के गिरफ्तार होने की खबर तो सुनाई ही नहीं पड़ती .दूसरी ओर आम जनता अपने जायज हक मांगने पर कैसे रोज पुलिस के डंडों से पिटती है यह बतलाने की जरूरत नहीं है .

देश की व्यवस्था चलाने वाले ये लोग जो सरकार के मंत्री , बड़े अफसर , उद्योगपति , डाक्टर , वकील या कोई भी रसूखदार व्यक्ति हो सकते हैं इन्होने अपने पद , पैसे और अधिकार के बल पर एक ऐसी व्यस्था खड़ी कर ली है जिस में ये व्यक्ति न हो कर देश हो गए हैं .ये देश के मूर्त रूप हैं .

इनके बच्चों के लिए अच्छे प्राइवेट स्कूल हैं जिन की फ़ीस सरकार या उनकी नियोक्ता कम्पनी देती है .इलाज के लिए सुपर स्पेशलिटी होस्पिटल हैं जिनमे इलाज का खर्चा सरकार या बीमा कम्पनी देती है .अब तो इस वर्ग के इलाज के लिए विदेश में हुए इलाज का खर्चा भी सरकार देती है .

यह वर्ग विश्व स्तर का जीवन जी सके इसलिए लाखों बस स्टैंड को पीछे छोड़ कर पहले हवाई अड्डों को आधुनिक और विश्वस्तरीय बनाया जाता है .ये लोग नए खुले माल से किसी भी देश का उत्पाद खरीद कर खा सकते हैं उनके बनाये कपड़े पहन सकते हैं .उन्हें ये वस्तुएं आसानी से प्राप्त हो सकें इसलिए सरकार लगतार ऐसे माल खोलने और खरीदने वालों को प्राथमिकता दे रही है.

सरकार और सरकार चलाने वाला यह वर्ग चाहता है कि गरीब, आदिवासी अपनी जमीन जंगल ,देश हित में उसे समर्पित कर दे जिस से कल कारखाने और देश का विकास हो .जो इस विकास का विरोध करता है वह विकास का , देश के विकास और देश का दुश्मन है .विकास के रस्ते में आने वाले को कुचल ही दिया जाना चाहिए .

यह वर्ग यह तो चाहता है कि उसके बच्चे विदेश जा कर पढ़ें .वहीं रोजगार पा जायं और फिर वहीं बस जाएँ .किन्तु उसे यह बर्दाश्त नहीं कि तमिलनाडु के लोग बम्बई में आ कर बस जाएँ या बिहार से आने वाले लोग दिल्ली में आ कर रोजगार करें और यहीं बस जाएँ .वह उन्हें बाहरी मानता है जो शहर के विकास में बाधा हैं .वे बम्बई या दिल्ली के लिए समस्या हैं .

इन लोगों के लिए ये लोग , जो अशिक्षित हैं, साधनहीन हैं , गरीबी रेखा से भी नीचे हैं , देश की विकास दर को नीचा किए हुए हैं अगर ये नहीं होते तो विकास दर ऊपर होती ( आंतरिक सोच यही है ) इनके नाम पर जो योजनाएं चलाई जा रही हैं वे इनके नाम के लिए हैं वास्तव में वे सरकार और इन लोगों के बीच पड़ने वाले भ्रस्ट लोगों की लूट को जारी रखने के लिए चलाई जा रही हैं .

अचरज की बात है कि जब देश के नाम कुर्बानी देने की बात आती है तो इसी कमजोर वर्ग को आगे कर दिया जाता है .सेना में सिपाही के भर्ती के लिए भूखे पेट ६ किलोमीटर भागने वाला जवान इसी गरीब परिवार से होता है .संसद और विधानसभाओं में देश प्रेम का डंका बजाने वाले नेताओं से कोई नहीं पूछता कि उनके कितने बेटे सशस्त्र सेनाओं में हैं . सब सुरक्षित घरों में बैठे हैं .भाषा , धर्म ,सम्प्रदाय के झगड़े फसाद में सिर्फ गरीब लोगों के घर ही उजड़ते हैं .उसी शहर इन प्रभु लोगों और उनकी संपत्ति को कुछ नहीं होता .क्यों कुछ नहीं होता . क्यों कि वे व्यक्ति नहीं देश हो गए हैं जिनके लिए कमजोर को कुर्बानी देनी है .

गहनता से देखें तो साफ़ दिखता है कि हम और हमारी सरकार शक्तिशाली देश बनना और बनाना चाहती है और उसका बल देश निर्माण पर है .व्यक्ति को तो देश पर और देश के लिए अपनी कुर्बानी देनी है .यदि सरकार विवेकशील होती तो वह व्यक्ति के विकास पर बल देती .विकास के केन्द्र में व्यक्ति और उसकी स्वतंत्रता होती और ऐसे विकसित स्वत्रंत नागरिकों के समूह से समाज और देश बनता .

अशोक उपाध्याय

 

 

 

 

 

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