कितने विश्वसनीय है ओपिनियन / एग्जिट पोल ?

Exit Poll 2014

कुछ दिनों पहले न्यूज़ एक्सप्रेस नामक एक निजी टीवी चैनल ने एक स्टिंग ऑपरेशन – ऑपरेशन प्राइम मिनिस्टर जारी किया. उसमे 11 ऐसी कंपनिया जो विभिन्न मीडिया समूहों के लिए चुनाव पूर्व सर्वे करती है की सच्चाई जनता के सामने आई. इस स्टिंग ऑपरेशन को देख कर आम आदमी का इस तरह के सर्वे से पूरी तरह से विश्वास उठ गया. कैमरे के सामने बड़ी बड़ी कम्पनियो के जिम्मेदार लोग पैसे के बदले में सर्वे के नतीजो में फेरबदल करने को तैयार दिखाई दिए. वोट प्रतिशत बढ़ा या घटाकर दिखाना, सीटो का अनुमान बढ़ा या घटा कर दिखाना बड़ा ही आसान लगा बशर्ते आपके पास पैसा हो. इतने बड़े खुलासे के बावजूद अन्य टीवी चैनल एवं अखबार इस पर चुप्पी साधे रहे. ओपिनियन पोल और एग्जिट पोल आज भी जारी है.
क्या इस तरह के सर्वे की उपयोगिता है? और यदि है तो क्या खोई हुई विश्वसनीयता पाई जा सकती है?

ओपिनियन/एग्जिट  पोल की उपयोगिता –
चुनावो से पूर्व आने वाले ओपिनियन पोल जनता के रुझान का अंदेशा करा देते है. ओपिनियन पोल से आ रहे रुझानो के आधार पर कई मतदाता अपने मताधिकार का प्रयोग करते है. अमूमन कई मतदाता जितने वाली पार्टी को वोट देना चाहते है. लोकतंत्र के लिए क्या यही सही है? यह एक अलग विषय है. ओपिनियन पोल के रुझानो से पार्टियों को भी अपनी स्थिति का आंकलन करने में मदद मिलती है.
ऑपरेशन प्राइम मिनिस्टर को सही माने तो ओपिनियन पोल को पार्टी विशेष के पक्ष में लाना आसान है छोटी सी कीमत देकर, लेकिन इसकी कीमत शायद आम आदमी चुकता है, ओपिनियन पोल के आधार पर अपना निर्णय बदल कर.
जिन मतदाताओ ने अपने मताधिकार का प्रयोग कर लिया उनके साथ किये साक्षात्कार (इंटरव्यू) के आधार पर एग्जिट पोल बनाये जाते है. सभी चरण का मतदान पूर्ण होने के बाद ही इनका प्रसारण मीडिया द्वारा किया जा सकता है.
कैसे किये जाते है सर्वे ?
चुनाव पूर्व किये गए ओपिनियन पोल के लिए सर्वे कंपनी के नुमायिंदे लाखो लोगो के रुझान का अंदाजा लगाने के लिए उसी क्षेत्र के कुछ लोगो का साक्षात्कार कर, उनसे आ रहे रुझानो के आधार पर अनुमान लगाते है. एग्जिट पोल के रुझान मतदान कर चुके लोगो के साथ किये गए सर्व्ये के नतीजो से निकले जाते है.
क्या कमिया है ओपिनियन/एग्जिट पोल में ?
इस तरह के सर्वे में लिए गए साक्षात्कार के कागज या उनके आधार पर बनायीं गई रिपोर्ट शीट अमूमन जनता के सामने नहीं रखी जाती. ऑपरेशन प्राइम मिनिस्टर के बाद यह कहना भी मुश्किल है की वास्तव में सभी कंपनिया सर्वे कराती भी है या केवल आंकडे डाल कर रिपोर्ट तैयार की जाती है. जो कंपनिया सर्वे करवाती है वो अपने नतीजे जनता के बिच रखे इस तरह की कोई बंदिश नहीं है, इसलिए यह कहना भी मुश्किल है की सभी सर्वे हम तक पहुँच पाते है या नहीं.
लाखो लोगो के रुझान का अंदाजा केवल 100-200 लोगो से लगा पाना मुश्किल है. एक लोकसभा क्षेत्र में 1500-2000 पोलिंग बूथ होते है. कई पोलिंग बूथ विशष्ट प्रत्याशी के पक्ष में वोट करते है. इस तरह के सर्वे में यदि सभी पोलिंग बूथ से लोगो को शामिल नहीं किया गया तो सर्वे में मिल रहे रुझान सही नहीं हो सकते.
सर्वे के दौरान सभी लोग अपनी राय देने के लिए स्वीकृति नहीं देते. सर्वे में अमूमन पढ़े लिखे शहरी तबके के लोगो से मिली राय ही आ पाती है. सर्वे के लिए दी गई जिम्मेदारी को किसी तरह पूरा करने के लिए संभव है की जिम्मेदार व्यक्ति खुद ही औरो के नाम से फॉर्म पूरा कर ले या केवल अपने परिचित लोगो से ही करवाए.
कितने विश्वसनीय है सर्वे?
पारदर्शिता की कमी, सामान प्रक्रिया का आभाव, उपयुक्त सैंपल साइज़ की कमी, सभी तबके एवं सभी क्षेत्रो (विशेषकर ग्रामीण) का समावेश न होने के कारण वर्तमान में ओपिनियन /एग्जिट पोल की विश्वसनीयता सवालो के घेरे में है.
किस तरह यह खोई विश्वसनीयता वापस पाई जा सकती है इसपर अगले लेख में चर्चा करेंगे

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About Rakesh Parikh

A doctor by profession, passionate for the change. Trying my bit for the alternative media.

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