एक साल बाद – बलात्कारी निर्दोष, सरकार गुनाहगार

Women-safety-mobile-apps-300x177

आज 16 दिसंबर है और उस घटना को एक साल बीत गया है जिसने न केवल समाज को दहला दिया था बल्कि जिसके बाद युवा वर्ग इतना आक्रोशित हो गया था कि लुटियंस की दिल्ली को उसके दरवाजे पर जाकर ललकारने लगा था। टीवी के विभिन्न चैनलों पर अलग अलग पैनल में बुद्धिजीवी,  राजनेता, एंकर इस बात पर बहस करते दिखे कि दिल्ली में महिलाओं की सुरक्षा को लेकर एक साल में क्या बदलाव हुए हैं?
सवाल का जवाब सब जानते हैं लेकिन फिर भी एक घंटे की बहस तो करनी है सो नेता पक्ष बदलाव और सुविधाओं की गिनती करवाते रहे तो महिला संगठनों के प्रतिनिधि कमियाँ गिनवाते रहे। लेकिन बहस के इसी एक घंटे के समय में दिल्ली और एनसीआर के इलाके में दो रेप हुए जिनके बारे में कोई खबर चौबीसों घंटे चलने वाले खबरिया चैनलों पर नहीं आई। लोकल अखबार इसे कवर करेंगे भी तो एक साधारण कोने में पड़ी खबर की तरह।
सवाल अब भी वही है जो एक साल पहले था। महिला सुरक्षा जैसे महत्वपूर्ण मुद्दे पर जहाँ एक ओर विधायिका द्वारा जस्टिस वर्मा कमिटी की कई महत्वपूर्ण सिफारिशों को नजर अंदाज करके एक क़ानून का मसौदा तैयार किया गया जो आज तक लागू नहीं हुआ है तो दूसरी ओर पुलिस और सामजिक सुधारों को लेकर कोई हलचल दिखाई नहीं दी। क्या इन्तजार किसी अगले बड़े हादसे का है? क्या महिला सुरक्षा की जरूरत केवल दिल्ली में है? देश की हजारों-लाखों-करोड़ों महिलायें छोटे छोटे शहरों गाँवों में हर दिन हर पल असुरक्षित महसूस करती हैं। हद तब हो जाती है जब कानून के रखवालों पर ही उनकी अस्मत लूटने का आरोप आता है और कानून के पैरोकार इन्साफ की देवी की तरह आँखों पर पट्टी तो बाँध लेते हैं लेकिन इन्साफ की तराजू उठाना भूल जाते हैं।
“चीजें जितनी बदलती हैं उतनी ही वे पहले जैसी रहती है” पूर्व केन्द्रीय मंत्री अर्जुन सिंह का यह कथन सबको याद होगा जिसे हम रोज भुगतते हैं।
यह आंकडा महत्वपूर्ण है कि दिल्ली के अन्दर एक दिन में जितने वाहन रजिस्टर होते हैं उसकी एक दिन की रजिस्ट्रेशन फीस से पूरी दिल्ली में सीसीटीवी कैमरा लगाए जा सकते हैं, लुटियंस की दिल्ली और बाकी दिल्ली और लगे क्षेत्र में सुरक्षा खर्च का अनुपात 1 के मुकाबले केवल 1.03 है तो आबादी का अनुपात 1 के मुकाबले 967 का है। सवाल संसाधनों का नहीं इच्छाशक्ति का है और बात केवल दिल्ली की नहीं है।

Share this:

PinIt

About Satish Sharma

Satish Sharma is Editor, Hindi of Awaz Aapki. Writes in many News Papers & Magazines as Columnar, Analyst. Like to work as Citizen Journalist. Doing his bit of work in raising voice of unheard. Currently he is managing two shows of Awaz Live TV named Mashal and Manthan also.

Top