बस यूँ ही- इतिहास सीखें या बनाएं ?

firaq gorakhpuri

लोकतंत्र में हर चुनाव से पहले नेतागण एतिहासिक फैसले करते हैं जिन्हें बाद में ऐतिहासिक गलतियों के रूप में इतिहासकार याद करते हैं. कभी-कभी ये गलतियाँ भूगोल की भी होती हैं जिसके कारण कई विश्वविद्यालयों का स्थान और योद्धाओं का मृत्यु स्थान तक बदल जाता है.ऐसे में बड़े मियां के दिल में रह रह कर सवाल उठ रहा था कि इतिहास याद रखना ज्यादा जरूरी है या बनाना? ये तो सब जानते हैं कि इतिहास से हमने आज तक कुछ नहीं सीखा तो इतिहास सीखने की जरूरत क्या है? क्या फर्क पड़ता अगर बाबर और लोदी के बीच की लड़ाई न्यूयार्क में लड़ी जाती? क्या फर्क पड़ता है अगर पानीपत की लड़ाई सोनीपत में हो जाती? क्या इस से महंगाई कम हो जाती या भ्रष्टाचार मिट जाता?

खैर! ये तो सवाल हैं आते जाते रहेंगे. वैसे भी आजकल तो सौ जवाबों से बेहतर है पीएम साहब की ख़ामोशी, न जाने कितने सवालों की आबरू रख लेते हैं वो. हम तो साहेब (वो वाले ‘साहेब’ नहीं) आपको इतिहास से जुड़ा एक किस्सा सुनाने आये थे. कहो तो सुना दें, न कहों तब भी सुनाकर तो जायेंगे ही.

तो हुआ यूँ कि एक बार जवाहरलाल नेहरु इलाहबाद यूनिवर्सिटी के किसी कार्यक्रम में आये हुए थे. आये थे तो भाषण भी दिया. भाषण में इतिहास का कोई प्रसंग छेड़ दिया. प्रसंग सुनकर इतिहास के एक प्रोफ़ेसर से न रहा गया. प्रफेसर साहब आये धमकते हुए फ़िराक गोरखपुरी जी के पास, जो उस समय के महान अदीब और अंग्रेजी डिपार्टमेंट के प्रोफ़ेसर भी थे. इतिहास के प्रोफ़ेसर ने फिराक साहब के कान में कहा कि नेहरु जी ने जो प्रसंग इतिहास का अपने भाषण में कहा है वह गलत है. नेहरु जी को इतिहास का ज्ञान नहीं. फिराक साहब अपने प्रधानमंत्री की बुराई कैसे सुन लेते? पलटकर धांय से जवाब दिया ‘ नेहरु जी इतिहास पढ़ते नहीं इतिहास बनाना जानते हैं.’

तो बताइये साहब कौन बड़ा? इतिहास लिखने वाला या पढने वाला? या सबसे बड़ा वह जो खुद इतिहास बना दे और उसे अपनी सुविधा के हिसाब से लिखवा भी ले? तो छोडिये फ़िक्र इतिहास की और लीजिये मजे वर्तमान के, जहाँ नेता भी हम और जनता भी हम.

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