राजभाषा अंगरेजी कब तक

hindi 7हिन्दी दिवस 14 सितम्बर को इसलिए मनाया जाता है कि 14 सितम्बर 1949 को संविधान सभा ने हिन्दी को देश की राजभाषा स्वीकार किया था . संविधान के अनुच्छेद 343 के अनुसार हिन्दी देश की राजभाषा है . उस दिन सरकार ने यह माना था कि अभी हिन्दी इस अवस्था में नहीं है कि वह देश की राजभाषा बन सके इसलिए यह प्रवधान किया गया कि अब से 15 वर्ष तक अंगरेजी का प्रयोग उसी तरह होता रहेगा जैसे अभी तक होता आया है .

15 वर्ष के पश्चात 1963 में राजभाषा अधिनियम पारित किया गया और उस के बाद राजभाषा नियम 1976 में पारित कर दिए गए जिन का पालन आज तक की सभी सरकारें कर रही सरकार कर रही हैं .

हिन्दी भाषा को लेकर जब तब मौसमी प्यार और उत्तेजना होती रहती है .गंभीर चिंतन कभी नहीं होता .हिन्दी दिवस पर भी भाषा के प्रश्न पर चिंतन करने के लिए मीडिया में धूर्त राजनेता , किसी राजनैतिक विचारधारा से प्रतिबद्ध विद्वान और आवेशित एंकर ही उपलब्ध होते हैं जो कार्यक्रम की टी आर पी को ऊँचा करने के कारण होते हैं .

संविधान निर्माताओं ने तो देश की राजभाषा को अमल में आने के लिए 15 वर्ष की समय सीमा निश्चित की थी किन्तु सरकार ने राजभाषा अधिनियम पारित कर उस सीमा को अब अनन्त काल के लिए बढ़ा लिया है .वह सरकारी कार्य जिस के पूरा होने की अवधि ही निश्चित न हो वह आखिर क्यों कर पूरा होगा .अब संविधान में तो हिन्दी देश की राजभाषा है किन्तु कब तक राज काज में अंग्रजी का प्रयोग होता रहेगा इस की कोई अंतिम तिथि नहीं है .

देश में अब तक सभी दलों की या कहिए सभी दलों से समर्थन से सरकारें बन चुकी हैं किन्तु कोई भी सरकार इस कार्य के लिए समय सीमा निर्धारित नहीं करना चाहती है .यही कार्य इन सरकारों ने अनुसूचित जाति और जनजातियों के आरक्षण के मामले में किया है .संविधान निर्माताओं ने इस कार्य के लिए 10 वर्ष की अवधि निर्धारित की थी .यह समय सीमा आगामी दस वर्ष के लिए सर्व सम्मति से आगे बढा ली जाती है .किसी भी दल का कोई सांसद कभी यह नहीं पूछता कि यह आरक्षण की व्यवस्था कितने वर्ष तक जारी रहेगी .

आरक्षण द्वारा जो कार्य समाज में 10 वर्ष में किया जाना था या हिन्दी के राजभाषा बनने का जो कार्य 15 वर्ष में पूरा किया जाना था अब किस वर्ष में पूरा होगा .कोई भी इसकी सीमा नहीं खींचना चाहता . इस अंत हीन कार्य को सदा करते रहने या करते दिखाई देते रहने में ही राजनेताओं और सुविधाभोगी वर्ग के हित निहित हैं .वे कभी नहीं चाहते कि यह उनके लिए हितकारी व्यवथा बदले .

भारतीय संविधान में राजभाषा हिन्दी और अन्य भारतीय भाषाओं के स्थान को लेकर कोई संशय नहीं है .सभी कुछ बिलकुल स्पष्ट है .विवाद की कोई समभावना नहीं है .फिर यह हिन्दी और भारतीय भाषाओं का विवाद क्यों उभरता है ? इसका कारण यह है कि देश के राजनेताओं और प्रशासकों को लगता है कि बिना अंगरेजी के यह देश न चल सकता है और न चलाया जा सकता है .

देश का दुर्भाग्य है कि यह वर्ग अपनी इस अवधारणा के समर्थन में कोई ठोस कारण नहीं देता है .कभी कोई हिन्दी शब्दावली की बात करता है तो कभी हिन्दी उर्दू और तमिल के विवाद की बात करता है तो कभी अंतर्राष्ट्रीय ज्ञान विज्ञान की बात कर अग्रेजी को बनाए रखना चाहता है .

अभी प्रधानमंत्री जी जापान हो कर आए हैं जापान में जापानी की क्या स्थिति है यह उन्होंने देखा और समझा होगा . अब चीन के प्रधानमंत्री अपने देश में आ रहे हैं .उनके देश में मंडेरियन भाषा हैं .उनके देश में मंडेरियन भाष की क्या स्थिति है यह सब को पता है .यह अचरज की बात है कि हमारे देश के कथित विद्वान इन देशों में जापानी या मंडेरियन का शिक्षा प्रशासन और न्याय व्यवस्था में क्या स्थान है यह अध्ययन करने की बजाय यह अध्ययन करते हैं कि इन देशों में अंगरेजी का क्या स्थान है और अपनी ओर से ही घोषित करते हैं कि वहाँ अग्रेजी का प्रयोग बढ़ रहा है और जन मानस को भ्रमित करते हैं .

संविधान के अनुसार देश की राजभाषा हिन्दी है .फिर भर्ती और पदोन्नति परीक्षाओं में हिन्दी अनिवार्य क्यों नहीं है .अंगरेजी अनिवार्य है ( क्योंकि काम उसी भाषा में होना है ) क्यों नहीं सरकार भर्ती परीक्षा भारतीय भाषाओं में करती और भर्ती के बाद अपने अधिकारिओं और कर्मचारियों को अंगरेजी का कार्य साधक ज्ञान दिलवाती जिस तरह अब वह हिन्दी का ज्ञान दिलवा रही है .( वास्तव में सरकार और प्रशासन का हिन्दी प्रेम और क्रियान्वयन एक ढकोसला है उसे अपना कार्य अनन्त काल तक अंगरेजी में ही करते रहना है )

अपने देश की प्रशासनिक व्यवस्था भ्रस्टाचार और शोषण पर टिकी हुई है .भाषा भी उसका एक साधन है .अंग्रजी के जाते ही देश की जनता अपनी भाषा में शिक्षा प्रशासन और न्याय मांगेगी .उसके लिए कौन तैयार है ? कोई नहीं .

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