लोकतंत्र की सफ़ेद चादर पर बिखरी कालिख

पिछले कुछ दिनों में दो ऐसी घटनाएँ हुई जिन्होंने यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि क्या वाकई यह लोकतंत्र ही है जो सत्तर सालों से इस देश को चला रहा है? या फिर यह कोई और लोकतंत्र है, उस लोकतंत्र से अलग जिसका महिमामंडन सामजिक शास्त्र और नागरिक शास्त्र की किताबों के माध्यम से स्कूलों में पढ़ाया जाता है. पहली घटना लुटियंस की दिल्ली से सम्बंधित थी जहाँ संसद और राष्ट्रपति भवन से काफी करीब एक सांसद के घर पर एक नौकरानी की पीट पीट कर हत्या कर दी जाती है.

awaz_10 (247x204)बात हत्या से सम्बंधित थी इसलिए सामने आ गई अन्यथा सत्ता के गुरूर में नौकरों को प्रताड़ित करते इस परिवार की अंदरूनी बातें कभी सामने नहीं आ पाती. धनञ्जय सिंह जौनपुर से सांसद हैं, जहाँ उन्हें बाहुबली के नाम से जाना जाता है. खबरों पर यकीन करें तो उनकी पत्नी जाग्रति नौकरों को रोज प्रताड़ित करती थी. एक नौकरानी राखी अपने जीवन से हाथ न ढो बैठती तो अमानवीय यातनाओं की यह दास्ताँ शायद निर्बाध रूप से चलती रहती. सवाल यह है कि इस पूरे मामले में वह तंत्र, जो समाज के कमजोर गरीब तबके के हकों का रखवाला कहलाना पसंद करता है, खामोश है. यहाँ बात राजनैतिक पार्टियों और समाजसेवी संस्थाएं दोनों की हो रही है.

धनञ्जय सिंह बसपा से सांसद हैं, उसी बसपा से जो गरीबों दलितों के हक़ की लड़ाई लडती है लेकिन पार्टी की ओर से किसी बयान या कार्रवाई की खबर अभी तक नहीं आई है. शायद राखी दलित नहीं थी या बसपा की परिभाषा के अनुसार दलित केवल वोट बैंक को दिया गया एक विशेषण भर है. इसके साथ ही अन्य पार्टियों ने भी इस पर कुछ बोलने की जहमत नहीं उठाई है. आखिर क्यों नहीं अन्य पार्टियाँ आगे आती और कहती कि बसपा धनञ्जय सिंह को निकाल बाहर करे और हम अपनी पार्टी में उसे स्थान नहीं देंगे. वैसे इस से पहले धनञ्जय सिंह बसपा से निष्काषित किये जा चुके हैं तब भी उन पर आपराधिक गतिविधियों में लिप्त रहने का आरोप था लेकिन उनकी ससम्मान वापसी से अपमान के सभी दाग धो दिए गए थे.

ऊँगली सामजिक संस्थाओं की ओर भी उठती है जो कभी किसी व्यवसायी तो कभी किसी नौकरीपेशा व्यक्ति के खिलाफ मानव अधिकारों का हवाला देकर मोर्चा खोले दिखाई देते हैं. मैं आज पूरी जिम्मेदारी से कहना चाहता हूँ कि इस देश की व्यवस्था को सुधारने में कोई मदद नहीं मिलती अगर आप किसी पायलट या बड़े व्यवसायी को अपने मातहत लोगों का शोषण करने के आरोप में जेल भिवा देते हैं. यकीन मानिए जिस दिन आपने यही काम दो नेताओं के साथ कर दिया उसी दिन वह व्यवसायी या पायलट न केवल सुधर जाएगा बल्कि व्यवस्था में एक डर पैदा होगा क्योंकि व्यवस्था की यह धारणा टूटना जरूरी है कि सत्ता में बैठे या सत्ता के पहियों के आसपास रहने वाली मक्खियाँ कितनी भी गन्दी हों जब तक वे सत्ता का पहिया घुमाने में सक्षम हैं कोई उन्हें हाथ नहीं लगा सकता.

दूसरा मामला भाजपा से सम्बंधित है जो मानवाधिकार, सूचना का अधिकार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हवाला अक्सर देती दिखाई देती है. उन्हीं के एक सांसद दीनू सोलंकी पर आरटीआई कार्यकर्ता अमित जेठवा की हत्या का आरोप है. लेकिन भाजपा की तरफ से कोई भी आधिकारिक बयान अभी तक नहीं आया है, ना ही पार्टी ने कोई कार्रवाई अभी तक दीनू सोलंकी के खिलाफ की है.

सवाल यह है कि क्या पार्टियों का काम आपराधिक छवि के इन लोगों के बिना चलता नहीं है या मामला केवल राजनैतिक इच्छाशक्ति और दोहरे मापदंडों का है. या इस सारे मामले में कहीं न कहीं आप और हम भी दोषी हैं आखिर किसी इमारत में नींव की ईंट होना इतना आसान काम तो नहीं. लेकिन क्या ही अच्छा हो यदि इस इमारत के शिल्पकार भी अपनी जिम्मेदारी को समझें.

पिछले कुछ दिनों में दो ऐसी घटनाएँ हुई जिन्होंने यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि क्या वाकई यह लोकतंत्र ही है जो सत्तर सालों से इस देश को चला रहा है? या फिर यह कोई और लोकतंत्र है, उस लोकतंत्र से अलग जिसका महिमामंडन सामजिक शास्त्र और नागरिक शास्त्र की किताबों के माध्यम से स्कूलों में पढ़ाया जाता है. पहली घटना लुटियंस की दिल्ली से सम्बंधित थी जहाँ संसद और राष्ट्रपति भवन से काफी करीब एक सांसद के घर पर एक नौकरानी की पीट पीट कर हत्या कर दी जाती है.

बात हत्या से सम्बंधित थी इसलिए सामने आ गई अन्यथा सत्ता के गुरूर में नौकरों को प्रताड़ित करते इस परिवार की अंदरूनी बातें कभी सामने नहीं आ पाती. धनञ्जय सिंह जौनपुर से सांसद हैं, जहाँ उन्हें बाहुबली के नाम से जाना जाता है. खबरों पर यकीन करें तो उनकी पत्नी जाग्रति नौकरों को रोज प्रताड़ित करती थी. एक नौकरानी राखी अपने जीवन से हाथ न ढो बैठती तो अमानवीय यातनाओं की यह दास्ताँ शायद निर्बाध रूप से चलती रहती. सवाल यह है कि इस पूरे मामले में वह तंत्र, जो समाज के कमजोर गरीब तबके के हकों का रखवाला कहलाना पसंद करता है, खामोश है. यहाँ बात राजनैतिक पार्टियों और समाजसेवी संस्थाएं दोनों की हो रही है.

धनञ्जय सिंह बसपा से सांसद हैं, उसी बसपा से जो गरीबों दलितों के हक़ की लड़ाई लडती है लेकिन पार्टी की ओर से किसी बयान या कार्रवाई की खबर अभी तक नहीं आई है. शायद राखी दलित नहीं थी या बसपा की परिभाषा के अनुसार दलित केवल वोटबैंक को दिया गया एक विशेषण भर है. इसके साथ ही अन्य पार्टियों ने भी इस पर कुछ बोलने की जहमत नहीं उठाई है. आखिर क्यों नहीं अन्य पार्टियाँ आगे आती और कहती कि बसपा धनञ्जय सिंह को निकाल बाहर करे और हम अपनी पार्टी में उसे स्थान नहीं देंगे. वैसे इस से पहले धनञ्जय सिंह बसपा से निष्काषित किये जा चुके हैं तब भी उन पर आपराधिक गतिविधियों में लिप्त रहने का आरोप था लेकिन उनकी ससम्मान वापसी से अपमान के सभी दाग धो दिए गए थे.

ऊँगली सामजिक संस्थाओं की ओर भी उठती है जो कभी किसी व्यवसायी तो कभी किसी नौकरीपेशा व्यक्ति के खिलाफ मानव अधिकारों का हवाला देकर मोर्चा खोले दिखाई देते हैं. मैं आज पूरी जिम्मेदारी से कहना चाहता हूँ कि इस देश की व्यवस्था को सुधारने में कोई मदद नहीं मिलती अगर आप किसी पायलट या बड़े व्यवसायी को अपने मातहत लोगों का शोषण करने के आरोप में जेल भिवा देते हैं. यकीन मानिए जिस दिन आपने यही काम दो नेताओं के साथ कर दिया उसी दिन वह व्यवसायी या पायलट न केवल सुधर जाएगा बल्कि व्यवस्था में एक डर पैदा होगा क्योंकि व्यवस्था की यह धारणा टूटना जरूरी है कि सत्ता में बैठे या सत्ता के पहियों के आसपास रहने वाली मक्खियाँ कितनी भी गन्दी हों जबतक वे सत्ता का पहिया घुमाने में सक्षम हैं कोई उन्हें हाथ नहीं लगा सकता.

दूसरा मामला भाजपा से सम्बंधित है जो मानवाधिकार, सूचना का अधिकार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हवाला अक्सर देती दिखाई देती है. उन्हीं के एक सांसद दीनू सोलंकी पर आरटीआई कार्यकर्ता अमित जेठवा की हत्या का आरोप है. लेकिन भाजपा की तरफ से कोई भी आधिकारिक बयान अभी तक नहीं आया है, ना ही पार्टी ने कोई कार्रवाई अभी तक दीनू सोलंकी के खिलाफ की है.

सवाल यह है कि क्या पार्टियों का काम आपराधिक छवि के इन लोगों के बिना चलता नहीं है या मामला केवल राजनैतिक इच्छाशक्ति और दोहरे मापदंडों का है. या इस सारे मामले में कहीं न कहीं आप और हम भी दोषी हैं आखिर किसी इमारत में नींव की ईंट होना इतना आसान काम तो नहीं. लेकिन क्या ही अच्छा हो यदि इस इमारत के शिल्पकार भी अपनी जिम्मेदारी को समझें.

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About Satish Sharma

Satish Sharma is Editor, Hindi of Awaz Aapki. Writes in many News Papers & Magazines as Columnar, Analyst. Like to work as Citizen Journalist. Doing his bit of work in raising voice of unheard. Currently he is managing two shows of Awaz Live TV named Mashal and Manthan also.

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