अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और समाज

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फ़्रांस में पत्रकारों पर हुए हमले ने भारत में भी कुछ दिन के लिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के सवाल को केन्द्र में ला दिया. भारत के समाचार पत्रों और इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों में इस विषय पर जो चर्चा हुई वह सतही और एक पक्षिय थी .इस चर्चा में वह पक्ष प्रस्तुत किया गया जो वर्तमान सरकार के पक्ष को मजबूत करता था .

पश्चिम के देशों ने अपना लोकतंत्र चर्च या राजशाही से मुक्त हो कर बनाया है इसलिए वहाँ व्यक्ति की स्वतंत्रता इतनी व्यापक है कि उस में किसी को आहत करने की स्वत्रन्त्रता भी शामिल है .आज से लगभग तीन सौ साल पहले भारत में भी यही स्वतंत्रता थी .समाज में कबीर की तरह राज सत्ता और ईश्वर को ललकारने वाले संत और अनल हक कहने वाले फ़कीर देश के हर कौने में मौजूद थे .

अभिव्यक्ति को बाधित करने वाले कानून हमारे यहाँ पहली बार १८३७ में बनाए गए थे जब थॉमस मेकाले ने भारतीय दंड संहिता बनाई थी . तब से यह संहिता लगभग आज तक वैसे ही चली आ रही है .जब देश आजाद हुआ तो संविधान निर्माताओं ने संविधान के अनुच्छेद १९ (१) के अंतर्गत हमें अभिव्यक्ति का अधिकार दिया .देश का दुर्भाग्य देखिए कि संविधान लागू होने के १५ महीने के भीतर ही इसमें कई धाराएं जोड़ कर इसे सीमित कर दिया गया .

यह धाराएँ ऐसी हैं जो स्वयं में स्पष्ट नहीं हैं जैसे कोई भी अभिव्यक्ति जिस से देश की शांति व्यवस्था या नैतिकता पर विपरीत प्रभाव पड़े या मित्र देशों के साथ सम्बन्धों पर असर पड़ता हो ,उस अभिव्यक्ति को बाधित किया जा सकता है. सरकार का यह रुख आज तक कायम है. आई टी एक्ट की धारा ६६ (ए) को इसी लिए लचीला छोडा गया है जिस से ,किसी भी अभिव्यक्ति को उस के अंतर्गत समाहित कर के बाधित किया जा सके .

पेरिस में पत्रकारों की हत्या और वहाँ की सरकार द्वारा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के निर्बाधित अधिकार के पक्ष में खड़े होने पर ,हमारे देश के नेताओं ने लगभग एक स्वर में कहा कि भारत में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता निर्बाधित नहीं हो सकती .उस पर बंधन लगाना जरूरी है .राजनेताओं की इस बात का लगभग सभी सामाजिक संस्थाओं और संपादकों ने समर्थन किया है .

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर बंधन लगाने का समर्थन करने वाले लोगों ने यह एक पल के लिए भी नहीं सोचा कि वे उस प्राचीन परम्परा के वारिस हैं जिस में कहा गया है कि मैं ब्रह्म हूँ और तू भी ब्रह्म है और हम सब में वही ब्रह्म समाया हुआ है .जिस में आत्मा और व्यक्ति की स्वतंत्रता को सर्वोपरि माना गया है .देश उसके पश्चात आता है और इसी अर्थ में हम धार्मिक हैं .व्यक्ति पर देश और धर्म के बंधन स्वीकार कर हम एक ओर जहाँ तानाशाही शासन के ओर बढ़ रहे हैं तो दूसरी ओर धर्म और उसकी भावना को व्यक्ति से ऊँचा स्थान देकर ,अपने देश को अंध धार्मिक देश की ओर धकेल रहे हैं .इस दोनों से ही हमारा लोकत्रंत आहात होता है.

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में राज्य को सबसे ज्यादा भय ,धार्मिक भावनाओं के आहात होने से लगता है जिस की आड़ में वह अभिव्यक्ति की स्वत्रन्त्रता को बाधित करना चाहता है . अविभाजित भारत के इतिहास में सन १९२७ में लाहौर में प्रकाशक राजपाल को एक धार्मिक भावना आहत करने वाली पुस्तक के प्रकाशन के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया था .लंबी कानूनी कार्यवाही के बाद सन १९२९ में उन्हें रिहा कर दिया गया क्योंकि तब तक कोई ऐसा कानून ही नहीं था जिस में धर्म के अपमान को अपराध माना गया हो .

इसके बाद समाज में जो स्वतंत्रता थी .उसे धर्म के बाडे में ला कर गोलबंद किया गया जिस से शक्ति समूह के रूप में उसका प्रयोग किया जा सके .धर्म अब व्यक्तिगत न होकर ,समूह और संस्थागत हो गया है .जिस का उपयोग राजनेता और राजनैतिक दल अपने उपयोग के लिए करते रहे हैं .

एक अध्ययन में हमने पाया है की वास्तव में लोग आहत नहीं होते हैं उनके नेता बतलाते हैं तो वे आहत होते हैं. सच यह है कि नेता आहत करते हैं तो वे आहत होते हैं ॰ ये नेता बिलकुल नहीं चाहते कि प्रत्येक व्यक्ति विवेकवान बने और अपने विवेक से निर्णय ले .ये लोग उसे धर्म या समुदाय के रूप में संबोधित करते हैं और बतलाते हैं कि उनका अस्तित्व खतरे में है इसलिए जरूरी है कि जोरदार ढ़ंग से विरोध किया जाय .कहने की जरूरत नहीं कि वे ऐसा अपनी शक्ति बढ़ाने या प्रदर्शित करने के लिए करते हैं.

आजाद भारत में कुछ लोगों और संस्थाओं को लगने लगा कि वे जन सामान्य से अलग और विशिष्ट हैं इसलिए उनका विरोध नहीं होना चाहिए .इसके लिए उन्होंने बकायदा कानून बनाए हैं अब आप प्रधानमंत्री न्यायपालिका या किसी संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति के खिलाफ कुछ नहीं कह सकते हैं .

आम आदमी किसी बड़े आदमी या संस्था का विरोध इस लिए नहीं करता है कि उसे डर है कि बदले में वह उसका अहित कर देगा .दूसरी ओर , वह किसी आम आदमी का विरोध इसलिए नहीं कर पाता है क्योंकि उसे पता है वह आदमी , धार्मिक समूह या भीड़ बन कर आयेंगे और उसका अहित कर देंगे .

 

आम आदमी की अभिव्यक्ति तो जंगल में रोने के समान है जिस को सुनने वाला कोई नहीं है .जब वह समूह में धरना प्रदर्शन करता है तो उसकी ओर देखने वाला कोई नहीं होता है .जब वह समूह बड़ा हो जाता है जिसे अनदेखा करना शासक वर्ग के लिए कठिन हो जाता है तो उन्हें तितर बितर करने के लिए पुलिस के डंडे ,आंसू गैस और गोलियाँ तैयार हैं .जिन की कोई खबर कहीं नहीं बनती है ( जब तक इनके पीछे कोई संस्था या राजनैतिक दल न हो )

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के सन्दर्भ में यह भी महत्वपूर्ण है कि हम किस की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की चर्चा कर रहे हैं .भारतीय संविधान में प्रेस और इलोक्ट्रोनिक मीडिया के लिए कोई अलग प्रवधान नहीं है जो नागरिक के अधिकार हैं वही मीडिया के हैं .यह मीडिया बाजार से संचालित होता है . अखबार में वह छपता या मीडिया वह दिखलाता है जिस की अनुमति संपादक ,संचालक या मालिक देता है .जिस को वह पसंद नहीं है वह नौकरी छोड़ कर जा सकता है .

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार का एक अर्थ केवल अभिव्यक्ति की स्वत्रन्त्रता ही नहीं है .वह सुने जाने का अधिकार भी है .उस अभिव्यक्ति की स्वत्रंता के अधिकार को पाने के लिए , आप न्यायालय की शरण में जायेंगे .वहाँ आप के आवेदन को एक नंबर दे दिया जाएगा फिर अपने अधिकार के लिए बरसों बरस कोर्ट के चक्कर काटते रहिए .ऐसे अधिकार और स्वत्रंता का कोई अर्थ नहीं है .

जब कोई किसान मजदूर या गरीब कर्ज तले दब कर आत्महत्या करता होगा तो उसने अपनी बात ( अभिव्यक्ति ) किस को नहीं कही होगी ? उसकी बात किस ने सुनी ? देश में व्यक्ति की आय में असमानता बढ़ रही है .असंतोष बढ़ रहा है .भूख और कर्ज से आत्महत्या करने वालों की न तो कोई आवाज है और न ही उसे कोई सुनने वाला है .ऐसे में उनके लिए अभिव्यक्ति के स्वत्रंतता का क्या अर्थ है .

यूरोप और अमरीका के बाजार में आप सलमान रश्दी की किताबें खरीद सकते हैं किन्तु भारत में नहीं खरीद सकते .भय के इस वातावरण तमिल लेखक मुरगन अपनी सभी प्रकाशित पुस्तकें वापस लेने की घोषणा करता है .राजनीति शास्त्र की एन सी आर टी की किताबों से हम दशकों पुराना शंकर का बनाया हुआ कार्टून हटवा देते हैं क्योंकि उस से किसी सांसद सदस्य की भावना आहात हो रही थी .

बी एस पी नेता शान से पेरिस में पत्रकारों के हत्यारों को ५१ करोड़ रूपये देने की घोषणा करते हैं .देश के पुलिस उनके खिलाफ मुकदमा दायर नहीं करती है .कांग्रेस के वरिष्ठ नेता यह बतलाते हैं कि पेरिस की यह घटना अफगानिस्तान और ईराक में निर्दोष मुसलमानों के मारे जाने की प्रतिक्रिया है .

साउदी अरब ने अभी ईश निंदा पर ब्लोगर रईफ बदवी को दस वर्ष की कैद और एक हजार कोडे बीस सप्ताह तक मारने की सजा सुनाई और उसमें से ५० कोडे इस शुक्रवार ९ जनवरी को लगाये गए. पूरे विश्व ने इस घटना की निंदा की थी किन्तु हमारी जबान नहीं खुली .

हमारी सरकार ब्रिटेन के वैध वीसा होने के बावजूद ग्रीन पीस की कार्यकर्त्ता प्रिया पिल्लई को इंग्लैंड जाने से हवाई अड्डे पर रोक लेती है क्योंकि वह ब्रिटेन के सांसदों को भारत में खनन के नुकसान बतलाने जा रही थीं

व्यक्ति की अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता और सुने जाने के अधिकार के लिए जिन लोगों को उस के पक्ष में खड़े होना चाहिए , जैसे समाज के धार्मिक नेता ,विश्व विद्यालय के प्राध्यापक , देश के प्रबुध नागरिक ,पत्रकार ,वकील इत्यादि वे सब इस अतिक्रमण पर खामोश हैं . उन्हें लगने लगा है की सरकार चलाना और सरकार चलाने में सहयोग देना अब उनका काम है. उन्होंने व्यक्ति के अधिकारों से अधिक महत्व राज्य के अधिकारों को दे दिया है और दूसरी और राज्य है जो अपने विकास के लिए सब को कुचलता हुआ आगे बढ़ जाना चाहता है.

http://www.jansatta.com/sunday-column/editorial-expression-and-society/17969/

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