‘वीआईपी’ मतदाता बनने का दर्द और सम्मान

वैश्वीकरण के इस दौर में जब पूरी दुनिया एक गाँव का रूप लेती जा रही है तो ऐसे में एक देश के विभिन्न राज्यों को एक मोहल्ले अधिक मान भी क्या सकते हैं? रोजी रोटी की यह मजबूरियां एक गाँव के एक मोहल्ले (पढ़ें-राज्य) से दूसरे मोहल्ले में प्रवास पर रहने वाले व्यक्तियों की संख्या बढा रही है. इसीलिए राजनीति भी इस व्यवस्था में नई संभावनाएं तलाश रही है. जहाँ एक ओर प्रवासी लोगों को गोलबंद करने का प्रयास किया जा रहा है वहीँ असुरक्षा में घिरे स्थानीय निवासियों को रोजगार छिन जाने के डर से एकजुट होने का आह्वान भी किया जा रहा है जो अक्सर क्षेत्रीय दलों में दिखाई देता है.

awaz_9 (272x186)लेकिन ताजा दौर में बात नरेंद्र मोदी की करें या राहुल गाँधी की, दोनों ही तरफ से रोजगार की तलाश में दूसरे राज्यों में रहने वाले मतदाता को तरजीह दी जा रही है. इसकी एक बानगी देखिये, मोदी बिहार में जाते हैं तो बिहार से गुजरात जाकर काम करने वालों का शुक्रिया भी अदा करते हैं और इस बहाने नितीश सरकार पर भी निशाना साधते हैं जो उन्हें उनके गाँव, उनके प्रदेश में रोजगार नहीं दे पा रही है. पटना बम धमाकों में भी जब मोदी पीड़ित परिवारों से मिलाने गए तो एक परिवार से गुजराती में बात करने लगे क्योंकि वह परिवार कई पीढ़ियों पहले गुजरात से विस्थापित था. इसी तरह उत्तर प्रदेश की रैलियों में मोदी एक ओर अपने गुजरात का गुणगान करते दिखाई दिए जो इन प्रवासियों को काम दे पा रहा है तो दूसरी ओर एक सुनहरे भविष्य का सपना बुनते भी दिखाई दिए जहाँ किसी को काम के लिए दूसरे राज्य में जाने की जरूरत महसूस नहीं होगी.

बात राहुल की करें तो कभी कलावती कभी भट्टा परसौल में अचानक आ धमकने की छापामार राजनीति करने वाले राहुल गाँधी हाल ही में बुंदेलखंड गए तो कमजोर खेती और विस्थापन का दर्द झेल रहे बुदेलखंड के जख्मों पर वादों का मरहम लगाना नहीं भूले. राठ, हमीरपुर की रैली में बुंदेलखंड से बाहर काम की तलाश में जाने वालों का जिक्र करते हुए राहुल गाँधी ने कहा कि हम  बुंदेलखंड में रोजगार की व्यवस्था करेगे जिस से आपको काम की तलाश में बाहर ना जाना पड़े.

यानी जो बातें कल तक क्षेत्रीय दलों के नेताओं के लिए महत्वपूर्ण हुआ करती थी आज अचानक इन राष्ट्रीय दलों के नेताओं के लिए महत्वपूर्ण हो गई. अगर गहराई से 1990 के दशक के बाद से भारत में आये सामजिक और आर्थिक बदलावों को देखें तो उत्तर भारतीय गाँवों में निचले पायदान पर खड़े लोगों का रिश्ता उनकी भूमि और गाँव से कटा है और इसके लिए तथाकथित वैश्वीकरण की नीतियां जिम्मेदार हैं जो रोजगार के बहाने हर ग्रामीण व्यक्ति को शहर में आने का सपना देती हैं जहाँ उसे रोजगार के साथ मूलभूत बुनियादी सुविधाएं भी मिलेंगी. आंकडे इसके गवाह हैं. साल 2011 की जनगणना पर विशवास करें तो पूरी दुनिया में 74 करोड़ अंतर्देशीय प्रवासियों में लगभग चालीस करोड़ भारत के हैं यानी पूरे आप्रवासियों का 54 प्रतिशत. ये प्रवासी जिन शहरों में जाते हैं वहां के मतदाता समूहों में तो शामिल होते ही हैं साथ ही साथ अपने गाँव की राजनीति को भी जनमत निर्माण के माध्यम से प्रभावित करते हैं.

यानी लोकतंत्र में जहाँ एक एक मतदाता महत्वपूर्ण है वहां दो जगह के वोटों को प्रभावित कर सकने वाला मतदाता तो अति-महत्वपूर्ण हो जाता है. वीआईपी संस्कृति के इस देश में वीआईपी मतदाता बन जाना सुखद तो है लेकिन आसान नहीं. यकीन नहीं आता तो गांवों की ओर से शहर रोजगार के लिए जाने वाले लोगों की मलिन और तथाकथित रूप से अवैध बस्तियों में जाकर देखिये जिन्हें पिछले कई दशकों से मूलभूत सुविधाओं के नाम पर केवल वादों के झुनझुने पकडाए जाते है.

तो सवाल अब यह उठता है कि जो मतदाता कल तक क्षेत्रीय दलों के हाथ का खिलौना बना रहता था क्या राष्ट्रीय पार्टियाँ उसे कुछ दे पाएंगी? इसका जवाब तो भविष्य के गर्त में छुपा है लेकिन राजनीति की बिसात पर, जहाँ आम मतदाता महत्वपूर्ण होकर भी केवल एक प्यादे की हैसियत रखता है, महत्वपूर्ण होना किसे अच्छा नहीं लगता? नरेंद्र मोदी और राहुल की लड़ाई जैसे जैसे आगे बढ़ेगी तो क्षेत्रीय दलों की राजनीति पुख्ता करने वाली इस जमीन में अनंत संभावनाएं दिखाई देंगी और लोकतंत्र के लिए यह शुभ संकेत हैं.

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About Satish Sharma

Satish Sharma is Editor, Hindi of Awaz Aapki. Writes in many News Papers & Magazines as Columnar, Analyst. Like to work as Citizen Journalist. Doing his bit of work in raising voice of unheard. Currently he is managing two shows of Awaz Live TV named Mashal and Manthan also.

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