कांग्रेस का लोकतंत्र: गाँधी परिवार से शुरू और वहीँ पर ख़त्म

Democracy in Indian National Congress

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भारत एक लोकत्रांत्रिक देश है और इस लोकतान्त्रिक देश में कांग्रेस पार्टी सबसे पुरानी पार्टी है. आजादी से लेकर आजतक इस पार्टी ने कई उतार चढाव देखे और देश को भी दिखाए. कई सारे देश भक्त नेता इस पार्टी से देश को मिले और कई कांग्रेसी नेताओ की इमानदारी पर आज भी किसी को कोई संदेह नहीं है. लेकिन जब पार्टी के आंतरिक लोकतंत्र की बात की जाए तो गाँधी परिवार ही इस पार्टी का सर्वेसर्वा नज़र आता है. अगर 1989 से लेकर 1996 तक की कालावधि को छोड़ दे तो जवाहरलाल नेहरु से लेकर राहुल गाँधी तक सिर्फ इसी एक खानदान का वर्चस्व नज़र आता है. जो सोनिया गाँधी या राहुल गाँधी बोले, वही अंतिम निर्णय मान लिया जाता है और किसी नेता में उनके निर्णय की खिलाफत करने का न तो अधिकार है और नाही हिम्मत है.

दागी नेताओ के पक्ष में सरकार ने एक अध्यादेश लाया था जो राष्ट्रपति के पास हस्ताक्षर के लिए लंबित था. कांग्रेस पार्टी की चारो ओर से निंदा हो रही थी लेकिन कांग्रेस के तमाम मंत्री और वरिष्ठ नेता उस अध्यादेश का बचाव करने में लगे थे. इसी बीच राहुल गांधी ने एक प्रेस कांफ्रेंस में अपनी ही सरकार के अध्यादेश की कड़े शब्दों में निंदा की और कहा की इस अध्यादेश को फाड़ कर फेंक देना चाहिए. इसके बाद उन बड़े नेताओ और मंत्रियो के सुर बदल गए और जो नेता सुबह तक अध्यादेश की वाकलात टीवी और अखबारों में कर रहे थे, दोपहर बाद उन्हें राहुल गाँधी के बयान की वजह से उसी अध्यादेश की बुराई करनी पड़ी. इससे पता चलता है की कैसे ज्ञानी और विद्वान् कांग्रेस्सियो को राहुल गाँधी जैसे अल्पज्ञानी के आगे झुकना पड़ता है और उनकी हर बात का समर्थन करना पड़ता है क्योकि वो “गाँधी” है.

वही दूसरी पार्टियों में भी पार्टी का लोकतंत्र नाम मात्र के लिए है. फैसले चंद नेता बंद कमरों में ही लेते है और कार्यकर्ताओ को कोई कुछ नहीं पूछता. लेकिन कांग्रेस में तो लोकतंत्र नाम मात्र के लिए भी नहीं है. पूर्ण बहुमत की सरकार बनने के बावजूद, विधायक दल में सर्वसम्मति से नेता चुने जाने के बावजूद मुख्यमंत्री और मंत्री परिषद् के गठन का अंतिम निर्णय 10 जनपथ से लिया जाता है. जो पार्टी अपने पार्टी की निर्णय प्रक्रिया में लोकतंत्र के मूल्यों को नहीं अपनाती, उस पार्टी से लोगो के सहभाग से चलनी वाली शासन व्यवस्था की आशा करना मुर्खता के सिवा और कुछ नहीं है. लोकतंत्र में हर उस फैसले में जनता का दखल होना चाहिए जिसका असर उस जनता पर होता हो. लेकिन भारत का लोकतंत्र बड़ा ही विचित्र लोकतंत्र है. यहाँ जनता को केवल वोट देने का अधिकार है और उसके पश्चात MP और MLA सदन में लोगो के प्रश्न उठाने के लिए भी पैसे लेते है.

कांग्रेस में AAP को समर्थन देने पर भी बिखराव है। अच्छा होता अगर कांग्रेस के 8 विधायक हाई कमांड से न पूछ कर, अपने अपने इलाको में जनता से पूछते की AAP को समर्थन दे या न दे। कांग्रेस की सबसे बड़ी दिक्कत हाई कमांड है, ये हाई कमांड न कार्यकर्ताओ से मिलता है न उनसे कोई रायशुमारी होती है। शायद इस वजह से कांग्रेस अब जनता से बहुत दूर हो गयी है. सोशल मीडिया इस देश के युवा लोगो का मीडिया माना जाता है, वहां पर कांग्रेस की स्तिथि बेहद ख़राब नज़र आती है और इसी आधार पर ये कहा जा सकता है की अब कांग्रेस के पास सिवा युवा राहुल गाँधी के, कोई युवा नहीं है। अब थोडा सा बदलाव कांग्रेस में नज़र आ रहा है, राहुल गाँधी कांग्रेस के घोषणा पत्र के लिए विभिन्न तबको के लोगो से मिल रहे है. लेकिन ये सब सद्भावना से किया हुआ काम कम और टीवी पर लोकप्रियता हासिल करने का काम ज्यादा नज़र आता है.

शुरू से ही कांग्रेस की कार्यशैली लोकतान्त्रिक नहीं रही है। पार्टी के वरिष्ठ नेता गाँधी परिवार से ज्यादा अक्लमंद होने बावजूद गाँधी परिवार की गुलामी करते नज़र आते रहे है। उनके ज्ञान और विद्वक्ता के सामने सोनिया और राहुल गाँधी का ज्ञान पर्वत के आगे राई के सामान है, लेकिन कांग्रेस के दिग्गजों में राहुल और सोनिया के ज्ञान और नेतृत्व क्षमता की तारीफ करने हेतु होड़ लगी रहती है। अपनी निजी उपलब्धियों का भी श्रेय कांग्रेस के नेता राहुल गाँधी और सोनिया को देने से नहीं हीचकिचाते। शायद इसीलिए बुजुर्ग कहते है की भारत को अंग्रेजो के गुलामी से तो मुक्ति मिल गयी, लेकिन गुलाम मानसिकता से नहीं मिली।

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About Yogesh Mandhani

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