लोकतंत्र के चेहरे पर कालिख

ArvindKejriwal

राजनीति में बढती असहनशीलता और विरोध के घटते तरीकों पर बहस अक्सर होती रहती है लेकिन १८ नवम्बर को दिल्ली में आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविन्द केजरीवाल की प्रेस कांफ्रेंस में इसका जिस प्रकार प्रदर्शन किया गया वह वाकई निंदनीय है. क्या वाकई लोकतंत्र में विरोध के विकल्प इतने सीमित हैं कि विरोधी पार्टी के चेहरे पर स्याही फेंकना ही एक मात्र तरीका बचे? क्या मुद्दों पर आधारित संघर्ष का दावा करने वाले भी लोकतंत्र पर इतना ही यकीन करते है जितना वे जनता से उम्मीद करते हैं?

इसके पहले भी ऐसी घटनाएं हुई हैं जब जनप्रतिनिधियों पर हमले हुए हैं, लेखकों और कलाकारों को देश तक छोड़ना पड़ा लेकिन कानून व्यवस्था बनाने का दावा करती कार्यपालिका जहाँ मूक और बधिर होने का स्वांग करती नजर आई वहीँ लोकतंत्र के पहरुए बने विधायिका के स्तम्भ भी इसे या तो नजर अंदाज करते दिखाई दिए या खुद के इसमें शामिल ना होने की दुहाई देते नजर आये, जैसे खुद के शामिल ना होने भर से उनकी बेगुनाही साबित हो जाती है जो लोकतंत्र को चलाने का दावा करते हैं.

लेकिन इस बार सवाल इसलिए भी बड़ा हो जाता है कि इस बार यह घटना एक पार्टी के पदाधिकारी द्वारा अंजाम दी गई है. खुद को भारतीय जनता पार्टी की अहमदनगर इकाई का महासचिव बताने वाले नचिकेता वाघरेकर नामक इस व्यक्ति से जहाँ एक ओर भाजपा पल्ला झडती नजर आई वहीँ महाराष्ट्र भाजपा के वरिष्ठ नेता विनोद तावडे द्वारा इस व्यक्ति को भाजपा का सदस्य मानने पर स्थिति सांप छछून्दर जैसी बन गई. तो अपना मुंह बचाने की फेर में दूसरे को नंगा बताने की परंपरा के तहत भाजपा ने कांग्रेस और आप पर इस साजिश का ठीकरा फोड़ दिया.

जनता के सामने सवाल यह है कि यदि यह संघर्ष इतने निचले स्तर पर उतर रहा है तो क्यों? आखिर क्या है इस राजनीति में जो सेवा करने का दावा करने वाले अक्सर सेवा का मौका पाने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं? पिछले कुछ दिनों में इस संघर्ष के स्तर का पतन जनता देख चुकी है और आने वाले दिनों में जैसे जैसे चुनाव के दिन करीब आयेंगे उम्मीद है कि लोकतन्त्र के ये खिलाड़ी भी फॉर्म में नजर आयेंगे.
चुनाव भी हो ही जायेंगे, नतीजे भी निकल आयेंगे, किसी न किसी पक्ष को सत्ता भी मिल ही जायेगी लेकिन नहीं मिलेगी तो खोई हुई विश्वसनीयता. और यही वह पक्ष है जिस पर सबसे अधिक सोचने की जरूरत होते हुए भी हमारे नेतागण जिसे नजर अंदाज कर रहे हैं.

इस बीच एक राहत देने वाली खबर भी है कि अरविन्द केजरीवाल ने स्याही फेंकने वाले व्यक्ति पर कोई कार्रवाई करने से यह कह कर इनकार किया है कि शायद उन्हें आप के बारे में कोई गलतफहमी हो गई होगी. देखने वाले इसे राजनैतिक हथकंडे की नजर से भी देखेंगे लेकिन शायद यह शुरुआत है राजनीति में लोगों का विशवास जगाने की, और इसके लिए क्षमाशीलता ही सबसे बड़ा हथियार है अगर सत्ता में आने के बाद भी यह कायम रहे.

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About Satish Sharma

Satish Sharma is Editor, Hindi of Awaz Aapki. Writes in many News Papers & Magazines as Columnar, Analyst. Like to work as Citizen Journalist. Doing his bit of work in raising voice of unheard. Currently he is managing two shows of Awaz Live TV named Mashal and Manthan also.

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