जूते खा और घी पीये जा

babu

यह देश के लोक जीवन से निकली एक लोकोक्ति है .इसका चित्र ( बिम्ब ) यह है कि पंगत में बैठे खाना खा रहे एक आदमी के सिर पर तडातड जूते पड़ रहे हैं वह सिर पर पड़ रहे जूतों की ओर ध्यान नहीं देता और परोसे गए घी को पीने में व्यस्त रहता है .

भारत में नौकरशाही की यही स्तिथि है चाहे वे राज्य सरकार के कर्मचारी हों या राज्य सरकार के ,चाहे पी एस यू के अधिकारी और कर्मचारी हों या किसी निगम के .फिर वे देश चलाने वाले आई. ए .एस. ,आई. पी. एस हो या चतुर्थ श्रेणी के चपरासी और रिकोर्ड क्लर्क .सभी को पूरा देश भ्रस्ट मानता है .

किसी भी संस्था में सब अधिकारी या कर्मचारी भ्रस्ट हों ऐसा नहीं हो सकता .मगर किसी एक अधिकारी या कर्मचारी कि यह मजाल नहीं है कि वह पलट कर कह नेता जी को कह सके कि आप हमें भ्रस्ट क्यों कह रहे हैं आप अपने शब्द वापस लो वरना हम आप पर मानहानि का मुकदमा दायर करेंगे .

हमारे सभी नेता चाहे वे किसी भी दल के हों शान से कहते हैं सरकारी अधिकारी और कर्मचारी अक्षम और निकम्मे हैं .वे बिजली चोरी नहीं रोक सकते ,पानी दे नहीं सकते ,रोडवेज की बस नहीं चला सकते ,अस्पताल नहीं चला सकते , स्कूलों में पढ़ा नहीं सकते , सडकों और नालियों की सफाई नहीं कर सकते .जनता को कोई सेवा नहीं दे सकते . नेता जी अपनी भाषण के अंत में कहते हैं इस सब को दूर करने का एक ही उपाय है इन सेवाओं का निजीकरण कर दिया जाय .

सब मिलकर ताली बजाते हैं जिस में ये सभी अधिकारी और कर्मचारी भी होते हैं जिन्हें भ्रस्ट और नाकारा कहा जा रहा होता है .मान लिया .ये सब भ्रस्ट और नाकारा हैं जो कि वे हैं .तो इन भ्रष्टों को सजा देने का काम किसका है .क्यों नहीं इनके खिलाफ कार्यवाही कर इन्हें नौकरी से बाहर करते .क्यों सरकार इन नाकारा लोगों को पाल रही है .क्यों नहीं कानूनी कार्यवाही कर इन्हें बर्खास्त कर दिया जाता .एक भ्रस्ट को दंड मिलता है तो दस तो उसकी ये हालत देख कर ही ठीक हो जाते हैं .

मगर ये नेता लोग ऐसे काम नहीं करते हैं .भ्रस्ट अधिकारी को दंड मिले यह उनकी प्राथिमकता नहीं होती है .सभी दलों के नेता इन सरकारी कर्मचारियों के संगठनों के संरक्षक होते हैं वे कैसे अपने संगठन के अधिकारिओं और कर्मचारियों के खिलाफ कार्यवाही होने देंगे .ये नेता लोग कम्पनी या संस्था के अध्यक्ष पर इतना दबाव बना देते हैं कि वह दोषी को दंड देने की बात ही छोड़ देता है और अपनी नौकरी की फ़िक्र करता है फिर एक कम्पनी के अध्यक्ष के लिए नेता जी की बात मान लेना ही फायदेमंद रहता है .

नेता जी हमारे भ्रस्ट समाज का हिस्सा हैं .वे तो जन सेवक हैं और एक अर्थ में सरकारी कर्मचारी ही हैं जिन्हें उनकी सेवाओं के लिए सरकार वेतन और भत्ते देती है .वे इन सरकारी कर्मचारिओं से अपने उलटे सीधे काम करवाते हैं जो नियम सम्मत नहीं होते हैं .वे काम ये अधिकारी खुश हो कर करते हैं और नेता जी ,या कहिए सरकार से बदले में मन चाही पोस्टिग और प्रमोशन पाते हैं .फिर ये सरकारी कर्मचारी इन भ्रस्ट नेताओं से क्यों डरेंगे .

वास्तव में नेताओं और सरकारी कर्मचारिओं का एक भ्रस्ट गठजोड़ है .दोनों एक दूसरे को भ्रस्ट बना रहे हैं और मिल कर देश को लूट रहे हैं .कोई इस भ्रस्टाचार को रोकना नहीं चाहता .इस भ्रस्टाचार को दूर करने के लिए जो आजकल निजीकरण की बात कही जा रही है .कोई समझे तो यह भी बिलकुल साफ़ है .निजीकरण करके सरकार ( भ्रस्ट नेता और पार्टियां ) अपनी लूट का दायरा बढ़ा लेना चाहती हैं .इस तरह से वे देश की सार्वजनिक सम्पति को निजी हाथों में बेच देंगे .जो अपने लाभ के के लिए इन्हें चलायेंगे .ये हस्तान्तरण का काम ऐसे ही सेंत मेंत में हो जाएगा ऐसा कौन मानेगा .

निजी क्षेत्र को जिस को ये सार्वजनिक उद्यम देने की बात हो रही है वह कौन सा दूध का धुला है .सत्यम घोटाला सामने है .अभी सहारा के पास पैसा है वह किसका है वह बतला ही नहीं पा रहा है .दिल्ली की बिजली कंपनियां सी ए जे से अपने खातों की जांच करवाने के बदले कोर्ट का दरवाजा खटका रही हैं .रिलाइन्स के डी ६ और गैस के दामों के बारे में कुछ न कहा जाय तो ही बेहतर है .ऐसे हजारों नहीं लाखों उदाहरण हैं जिन में भ्रस्टाचार खुदबुदा रहा है .

सरकार ने ऐसी व्यवस्था खड़ी की है जो भ्रस्टाचार को रोकती नहीं बल्कि उसे छुपाये रखने में मदद करती है .क्यों नहीं सरकार ऐसी व्यवस्था करती कि जिस कम्पनी में कर चोरी या दूसरी वित्तीय गडबडी पायी जायेगी उस स्तिथि में दोषी कम्पनी के साथ साथ उस ऑडिट फार्म को या चार्टर्ड अकाउंटेंट को भी लापरवाही या अपराध में संलिप्त माना जाएगा जिस ने उसका ऑडिट किया था .

ऐसे काम ये राजनैतिक दल नहीं करेंगे .ये दल कोर्ट के फैसले के बाद भी खुद आर टी आई के अंतर्गत नहीं आना चाहते वह इसलिए कि उनके पास ऐसा बहुत कुछ है जिसे वे देश की आम जनता से छुपाना चाहते हैं .ये जन सेवक अर्थात नेता और सरकारी अधिकारी और कर्मचारी मिल कर अपने छोटे से फायदे के लिए देश को बेचने को उतारू हैं .

क्या भ्रस्टाचार और अक्षमता से छुटकारा पाने का उपाय निजीकरण है .इसे सब ने इसे स्वीकार कर लिया है .चीर हरण हो रहा है .धूर्त मक्कार लोग सिर पर पड़ने वाले जूतों को भूल कर घी पीने में मस्त है .देश के विवेकवान लोग सिर झुकाए खामोश बैठे हैं मगर कभी तो जावाब देना ही पड़ेगा

ए उपाध्याय

 

 

 

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