कम्युनल वायलेंस बिल या कॉमन विवाद बिल?

Communal-Violence-Bill

साम्प्रदायिक हिंसा रोकने के लिए संसद में लाये जा रहे बिल को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष में विवाद छिड़ गया है जिसकी सम्भावना पहले से दिखाई दे रही थी. कोई आश्चर्य नहीं होगा अगर ये तेवर आने वाले दिनों में और तल्ख़ हों क्योंकि देश के साम्प्रदायिक माहौल को सुधारने से अधिक होड़ इस बात की है कि कौन साम्प्रदायिक है और कौन धर्मनिरपेक्ष? इस बिल ने केंद्र राज्य शक्तियों पर भी नई बहस छेड़ दी है.

लोकसभा चुनावों की दस्तक एक साथ ही इस बिल को पास कराने का अंतिम मौक़ा होने के कारण केन्द्रीय सत्ता इस बिल को लेकर जल्दबाजी में दिखाई दे रही है. यही कारण है कि विधेयक के संशिधित मसौदे के बारे में विपक्ष से किसी प्रकार की आम सहमति बनाने के प्रयास की बजाय यह कहा जा रहा है कि बिल में जरूरी संशोधन कर दिए गए हैं और अब विपक्ष इस पर सहयोग करे. दूसरी ओर विपक्ष इस बिल को किसी भी तरह पास नहीं होने देना चाहता क्योंकि यह उसके पारंपरिक वोट बैंक से जुडा मामला है. ऐसे में बिल को लेकर होने वाली खींचतान की असलियत तो सब जानते हैं लेकिन आगामी चुनाव के पहले बिगड़ते साम्प्रदायिक माहौल की आशंका हार आम आदमी के मन में है.

बात बिल की करें तो सत्ता पक्ष अभी तक देश को यह भी नहीं बता पाया है कि आखिर इस बिल की जरूरत क्या है? क्या केन्द्रीय सत्ता इस नतीजे पर पहुँच चुकी है कि मौजूदा क़ानून सांप्रदायिक हिंसा से निपटने में पूरी तरह नाकाम हैं? यदि ऐसा नहीं है तो फिर एक और कानून को लागू करने की बजाय कानूनों की सूची में इजाफा करने से भी क्या सुधर जायगा? नये कानून के आने से तब तक कुछ नहीं बदलता जब तक उसे लागू न किया जा सके. शिक्षा के अधिकार के नाम पर एक निष्प्रभावी कानून हम देख चुके हैं. और बात लागू करने की ही है तो मौजूदा कानून भी सक्षम हैं लेकिन राजनैतिक और प्रशासनिक इच्छाशक्ति के अभाव में बेकार साबित होते हैं.

देखा जाए तो साम्प्रदायिक हिंसा का मसला कानूनी प्रतिबद्धता का न होकर नैतिक प्रतिबद्धता का है जहां  स्थानीय प्रशासन की भूमिका अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है इसके लिए स्थानीय प्रशासन की जिम्मेदारी तय करने की ओर कदम बढ़ाना चाहिये. पुलिस और प्रशासनिक सुधार जो एक लम्बे समय से अटके हुए हैं उन पर बात करने की बजाय संसद के अन्दर बैठे माननीय एक नए फेर में जनता को उलझाना चाहते हैं जहाँ जनता को मिलेगा भी तो केवल एक झुनझुना जो सांप्रदायिक हिंसा को रोकने में उसी तरह नाकाम होगा जैसा अब तक देखने में आया है.

अगर आज किसी चीज की जरूरत है तो उन कारणों के निवारण की जिनकी वजह से हिंसा होती है लेकिन इसके लिए राजनैतिक दलों को अपने तौर तरीके बदलने होंगे और जनता के सामने जवाबदेही बढानी होगी जिसके लिए कोई भी दल तैयार नहीं दिखता है.

ऐसे में जबकि इस बिल पर बहत कुछ अस्पष्ट है सत्ता पक्ष को इसे लेकर अभी और मंथन करना चाहिए क्योंकि अस्पष्ट प्रावधान कानूनों के मनमाने इस्तेमाल को आमंत्रण देते हैं. इस बिल पर मौजूदा स्वरुप में किसी सहमति बनने के आसार नजर नहीं आते और इसे सत्ता पक्ष भी जानता है लेकिन जहाँ बात अल्पसंख्यक हितों के साथ खडा होकर केवल हो-हल्ले के दम पर उनके वोट सुरक्षित करने की हो वहाँ आम सहमति बनाने की कोशिश करना भी राजनैतिक अर्थों में बेमानी कहा जाता है और यही साम्प्रदायिक हिंसा की शुरुआत की ओर पहला कदम होता है.

लोकतंत्र में विविध विचारों के बीच से ही सर्वमान्य रास्ता निकलता है. दंगा पीड़ितों की सुरक्षा निश्चित हो, संघीय ढांचा सुरक्षित रहे, दोषियों को सजा मिले, पीड़ितों को मुआवजा मिले और इसके साथ साथ राहत और पुनर्वास कार्य सही तरीके से हों ये सब चाहते हैं लेकिन वोटों के साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण की कीमत पर नहीं जैसा कि राजनैतिक दल करना चाहते हैं.

किसी भी सुसंस्कृत देश की परख इस बात से होती है कि वहां हर वर्ग की समाज में कितनी भागीदारी है. इसके लिए जरूरी है कि इस विधेयक को किसी पक्षपात का शिकार नहीं होना चाहिए. यह एक महत्त्वपूर्ण विधेयक है और इसका राजनैतिक दलों की संकीर्ण उठापटक में नहीं उलझना चाहिए.

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About Satish Sharma

Satish Sharma is Editor, Hindi of Awaz Aapki. Writes in many News Papers & Magazines as Columnar, Analyst. Like to work as Citizen Journalist. Doing his bit of work in raising voice of unheard. Currently he is managing two shows of Awaz Live TV named Mashal and Manthan also.

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