राजनीती में कुछ तो बदल रहा है; दिल्ली चुनाव के बाद का दृश्य

Changing Indian Politics

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दिल्ली का विधान सभा चुनाव ऐतिहासिक था, और उस चुनाव के पश्चात जो कुछ भी हुआ, वो भी इतीहास के पन्नो पर सदैव के लिए छाप छोड़ गया. शायद पहली बार इस देश की राजनीती में इस तरह का उत्साह देखने को मिला जहाँ देश के सुधरने की आशा में पुरे देश और दुनिया के भारतीयों ने दिल्ली के चुनाव में यथा संभव योगदान दिया. दिल्ली में जिस प्रकार की राजनीति फिलहाल चल रही है, वो वाकई में आश्चर्यजनक है. सबसे पहले तो सबसे बड़ी पार्टी ने सरकार न बना कर विपक्ष में बैठने का फैसला किया, दूसरी बात जिस कांग्रेस को AAP ने उखाड़ फेंका, आज उसी के समर्थन की सरकार आम आदमी पार्टी ने बनायीं, और पहली बार इस देश में सरकार बनाने न बनाने के फैसले में जनता की राय को शामिल किया गया. आज तक देश में अनेको चुनाव हुए, अनेको बार खंडित जनादेश देखने को मिला, लेकिन पहली बार एक ऐसा हुआ जिसकी किसी ने सपने में भी कल्पना नहीं की. दूसरी सबसे बड़ी पार्टी को सरकार बनाने के लिए मजबूर किया गया, और समर्थन देने वाली पार्टी में और समर्थन लेने वाली पार्टी में न कोई समझौता हुआ, न कोई कॉमन मिनिमम प्रोग्राम बना और नाही कोई मंत्रिमंडल में कोई हिस्सा दिया गया.

दिल्ली चुनाव के बाद क्या बदल इस देश की राजनीति में, ये सबसे बड़ा सवाल है. सबसे पहले तो इस देश में वैकल्पिक राजनीति की आवश्यकता को दिल्ली के जनादेश से महसूस किया गया. देश पारम्पारिक राजनीति की बेशर्मी से और सत्ता और विपक्ष की भ्रष्ट जुगलबंदी से मुक्ति चाहता है और यदि कोई पूरी ताकत से ऐसी राजनीति को चुनौती देता है, तो जनता उसका समर्थन जरुर करती है.

दूसरी सबसे महत्वपूर्ण चीज़ ये हुई की खंडित जनादेश के बावजूद न किसी पार्टी ने विधायको की खरीद फरोख्त की और नाही पार्टी को तोड़ने फोड़ने का प्रयास किया गया. अमोमन खंडित जनादेश के बाद सबसे बड़ी पार्टी विधायको के जुगाड़ में साम दाम दंड भेद लगा देती और येन केन प्रकारेन सरकार बना लेती है, लेकिन दिल्ली में ऐसा कुछ नहीं हुआ. बीजेपी सबसे बड़े दल के रूप में उभरी, लेकिन उसने चुनाव नतीजों के बाद ऐसा कोई अनैतिक प्रयास नहीं किया. ऐसा नहीं है की बीजेपी पूरी राजनैतिक नैतिकता का अनुसरण करने वाली पार्टियों में से एक है, बीजेपी का जोड़ तोड़ की राजनीति का एक लम्बा इतिहास रहा है. उत्तर प्रदेश, झारखंड, उत्तराखंड, कर्नाटक आदि राज्यों में बीजेपी ने विपक्षी विधायको को तोड़ने फोड़ने का काम किया है. लेकिन दिल्ली में आम आदमी पार्टी को निचा दिखने और आने वाले 2014 के लोकसभा चुनाव में अपनी छवि को साफ़ दिखाने के लिए बीजेपी ने ऐसा कुछ नहीं किया. सम्भावना है की 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद बीजेपी के लोग दिल्ली में भी जोड़ तोड़ की राजनीति करे, लेकिन फिलहाल आम आदमी पार्टी की मौजूदगी की वजह से बीजेपी को इमानदारी दिखाने पड़ी और आज वह विपक्ष में बैठ गयी. इस जोड़ तोड़ की अनैतिक राजनीती को रोकने का काम दिल्ली में हुआ है.

अगला बदलाव आम आदमी पार्टी के आम आदमी वाली छवि के कारण नज़र आ रहा है. दिल्ली में किसी विधायक मंत्री को लाल बत्ती और सुरक्षा नहीं मिलने वाली. मुख्यमंत्री अपनी नीली रंग की कार में ही घूमेंगे जैसे वो मुख्यमंत्री बनने से पहले घूमते थे, विधायक और अन्य मंत्री मेट्रो से यात्रा कर रहे है. ऐसी सादगी को अपनाने वाले नेताओ को अब बड़ी पार्टिया खोज रही है ताकि वो ये साबित कर सके की अरविन्द केजरीवाल कुछ नया नहीं कर रहे, हमारे नेता तो पहले से ही सामजिक सुचिता का पालन करते है. आजतक बीजेपी ने कभी मनोहर परिकर के सादगी की बात नहीं कही क्योकि बीजेपी के तमाम मुख्यमंत्रियों में वही एक सादगी प्रिय व्यक्ति है, बाकि के सभी CM सभी नैतिक अनैतिक खर्चे करते आये है, और यदि बीजेपी पहले से ही मनोहर परिकर की सादगी का प्रचार करती तो लोग अन्य मुख्यमंत्रियों के ठाट पर ऐसे सवाल खड़े करते जिसका जवाब बीजेपी दे ही नहीं पाती. खबरों के मुताबिक राजस्थान की मुख्यमंत्री ने अपनी सुरक्षा को कम कर दिया है और अब वो भी सादगी से रहने की कोशिश कर रही है. पूरा देश जानता है की 2003 में जब वसुंधरा मुख्यमंत्री बनी थी, तब उनसे ज्यादा हाई प्रोफाइल मुख्यमंत्री कोई नहीं था. अगर आज वसुंधरा राजे कुछ सादगी अपनाना चाहती है तो इसका स्वागत है, लेकिन सादगी से रहने की प्रेरणा दिल्ली से ली हुई नज़र आती है.

जब दिल्ली के चौकाने वाले नतीजे सामने आये और आम आदमी पार्टी को 30% से अधिक मत मिले, तो बीजेपी और कांग्रेस के पंडितो को ये स्वीकारना पड़ा की अब सबक लेने का वक्त आ गया है. लोग राजनातिक बेशर्मी को बर्दाश्त नहीं कर रहे है. कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गाँधी और बीजेपी के वयोवृद्ध नेता लाल कृष्ण आडवानी ने मीडिया में खुल कर कहा की आम आदमी पार्टी का उदय सभी के लिए सबक है. ये बात और है की आम आदमी पार्टी की सरकारी नीतियों पर हमे आपत्ति हो सकती है, सरकार चलाने के तौर तरीको पर अविश्वास हो सकता है, आर्थिक नीतियों पर सवाल उठ सकते है, लेकिन एक बात का श्रेय अरविन्द केजरीवाल और उनकी पार्टी को जाना चाहिए जिसमे उन्होंने न केवल अपने लिए सुचिता और इमानदारी के नए मापदंड स्थापित किये, बल्कि पुरे देश की राजनीति में इमानदारी के लिए नए आयाम स्थापित करने का प्रयास किया. जो राजनैतिक लड़ाई ज्यादा भ्रष्ट बनाम कम भ्रष्ट की थी, अब कम से कम दिल्ली में ये लड़ाई ज्यादा ईमानदार बनाम कम ईमानदार के बीच होने लग गयी है, जो लोकतंत्र के लिए अच्छा संकेत है.

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About Yogesh Mandhani

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