क्योंकि सफ़र केवल मंगल तक नहीं है…

मंगलयान पृथ्वी से रवाना हुआ तो जैसे पूरा देश टीवी पर आँखे गड़ाए बैठा था। शहरी मध्यम वर्ग ने एक लम्बे समय बाद दूरदर्शन के दर्शन किये जिस पर इस पूरे अभियान का सीधा प्रसारण किया जा रहा था। निःसंदेह यह एक बड़ी कामयाबी थी, तो जरूरी था कि टीवी पर शाम की बहस में इसे स्थान मिलता जो मिला भी। लेकिन अलग अलग चैंलों पर बहस को सुनते वक्त कई बार दिमाग में आया कि आखिर भारत जैसे विकासशील देश के लिए इस अभियान का क्या मतलब हो सकता है?

awaz_8 (300x217)बहस के दौरान कई बुद्धिजीवी और तथाकथित वैज्ञानिक इस अभियान के फायदे नुकसान बढ़ चढ़ कर गिना रहे थे। कुछ का कहना था कि इस अभियान के कारण भारत का अंतरिक्ष में दखल बढ़ जायगा और अंतरिक्ष पर्यटन जैसी संभावनाओं के लिए रास्ते खुल जायेंगे। लेकिन जिस विचार के लिए नासा जैसी एजेंसियां भी अभी खुद को तैयार नही पा रही हैं, निजी क्षेत्र में जिसे संशय की स्थिति हो क्या वाकई भारत की सार्वजनिक क्षेत्र की सीमित संसाधनों वाली संस्था इसरो इस ओर कदम बढ़ा सकती है? शायद नहीं. लेकिन फिर भी संशय को दूर करने के लिए इसरो की साईट को देखा, सम्बंधित व्यक्तियों के इंटरव्यू देखे लेकिन इस तरह की किसी संभावना की बात करते वे दिखाई नहीं दिए. यानी अंतरिक्ष पर्यटन की संभावना ख़ारिज होती है तो अंतरिक्ष के उभरते बाजार में और क्या हो सकता है? मंगल पर खेती और लोगों को बसाने के प्रोजेक्ट तो अभी बहुत दूर की कौड़ी हैं जिन्हें पूरा होने में अभी वक्त लगेगा.

कुछ जगहों पर बहस में कहा जा रहा था कि यह अभियान इसलिए महत्वपूर्ण है कि इतने कम समय में इतनी बड़ी कामयाबी मिल जाना और वह भी इतने कम बजट में संभव ही नहीं  है. यकीनन इसके लिए हमारे वैज्ञानिक बधाई के पात्र हैं. नासा जैसा बड़ा बजट ना होते हुए भी चन्द्रयान की कामयाबी के बाद शुरू हुए इस अभियान के इतनी जल्दी कामयाब हो जाने को करिश्मा ही कहा जा सकता है. वैसे भी केवल रूस और अमेरिका के बाद केवल यूरोपीय स्पेस एजेंसी ही इसमें कामयाब हो पाई है तो यकीनन यह बड़ी कामयाबी है. लेकिन केवल इस कामयाबी का बड़ा होना इसकी उपयोगिता सिद्ध नहीं करता.

तभी अचानक 1960 का वह दौर याद आया जब रूस और अमेरिका ने मंगल पर जाने के अभियान की शुरुआत की थी. जिसमे आखिरकार 1962 में कामयाबी मिली. रूस और अमेरिका के शीतयुद्ध का वह दौर अंतरिक्ष में मिली कामयाबियों को भी अपने देश के गौरव से जोड़ते हुए अपनी व्यवस्था की कामयाबी का प्रचार करता था और भारत के साथ बाकी विकासशील देश बनते टूटते उस तिलिस्म को देखकर यह निर्णय लेने की कोशिश करते थे कि रूस किलेबंदी वाले साम्राज्यवाद के साथ जाना बेहतर होगा या अमेरिका के मुक्त बाजारवाद के साथ. खैर बीते पचास साल में यह निर्णय तो आसान हो गया है क्योंकि रूस के नीतिनियंताओं का मन भी अपने बुने क्रान्तिकारी ताने बाने की असलियत को देखकर भर गया और अमेरिका के मुक्त बाजारवाद की पोल भी जनता के सामने खुल गई है. दोनों के समर्थक अब भी दुनिया में मौजूद है लेकिन इसके मोहपाश से अधिकतर लोग निकल चुके हैं. लेकिन रूस और अमेरिका के अंतरिक्ष अभियानों से उपजी वह हनक अभी भी बरकरार है जिसे राष्ट्रीय गौरव के साथ जोड़ने का कोई मौका दोनों देश नहीं छोड़ते.

देखा जाए तो हम इस अभियान में लगभग पांच दशक पीछे हैं लेकिन राष्ट्रीय गौरव की यह घडी इन सब बातों को याद करने की नहीं है बल्कि यह वक्त है इस गर्व की अनुभूति के सही इस्तेमाल का. क्योंकि मंगलयान का असली महत्व ना उसके अर्थशास्त्र में हैं न उसकी आर्थिक संभावनाओं में. इस अभियान से हमें क्या हसिल हो सकता है यह अभी भविष्य के गर्भ में हैं लेकिन यह अभियान हमारे राष्ट्रीय गौरव को बढ़ाएगा. किसी भी देश के निवासियों के मन में यह अनुभूति पैदा करना बड़ी बात होती है कि हमने वह हासिल कर लिया जो अधिकतर देश नहीं कर पाए. समस्या यह है कि इस राष्ट्रीय गौरव का सही इस्तेमाल हम क्यों नहीं कर पाते हैं. अगर हम मंगलयान जैसे मुश्किल अभियानों को अंजाम दे सकते हैं तो आखिर हम गरीबी क्यों नहीं हटा सकते? चीन ने जिस प्रकार अपने राष्ट्रीय गौरव के क्षणों को देश की कर्मठता बढाने में इस्तेमाल किया है उस से सीखने की जरूरत है.राष्ट्रीय गौरव को राष्ट्रीय आत्मविश्वास में बदलने के लिए यह पहला कदम हो सकता है.  मंगल के लिए शुरू हुई यह यात्रा अनंत तक जा सकती है.

Share this:

PinIt

About Satish Sharma

Satish Sharma is Editor, Hindi of Awaz Aapki. Writes in many News Papers & Magazines as Columnar, Analyst. Like to work as Citizen Journalist. Doing his bit of work in raising voice of unheard. Currently he is managing two shows of Awaz Live TV named Mashal and Manthan also.

Top