दिल्ली में घमासान: धरने पर मुख्यमंत्री

arvind kejriwal protest in delhi

arvind kejriwal protest in delhi

देश की राजधानी दिल्ली वैसे तो हमेशा से ही धरना प्रदर्शनों की आदि रही है, पुराने ज़माने से लेकर आज तक न जाने कितने धरने दिल्ली ने देखे हैं, लेकिन इस बार जो दिल्ली में हो रहा है वैसा दिल्ली ने पहले कभी नहीं देखा था। इससे पहले कोई भी राजा, शासक अथवा मंत्री धरने पर नहीं बैठा था दिल्ली का इतिहास इस बात का साक्षी रहा है। ये पहली बार है जब किसी राज्य के मुख्यमंत्री को अपनी बात कहने के लिए सड़कों पर उतरना पड़ा है, सच में दिल्ली ने ऐसा रंग कभी नहीं देखा था। आखिर क्या कारन है कि, मुख्यमंत्री को स्वयं ही धरने में बैठना पड़ा ?

arvind kejriwal protest in delhi

यह तो एक सर्वविदित सच्चाई है कि, किसी राज्य या देश की शासन व्यवस्था बिना बल के नहीं चल सकती, बिना पर्याप्त पुलिस और सुरक्षाबालों के कोई भी राज्य या देश सफलतापूर्वक नहीं चल सकता।  आप खुद कल्पना करके देखिये कि अगर महाराष्ट्र में या गुजरात में उत्तर प्रदेश में या फिर किसी भी अन्य राज्य में पुलिस ही सरकार के हाथ में न रहे तो वहाँ अराजकता फैलेगी या नहीं ? हर कोई ऐसे मेंमनमानी करने पर उतारू हो जायेगा और सरकार सिर्फ मूक दर्शक बनने के अलावा कुछ भी नहीं कर सकेगी। अब जरा यह गौर कीजिये कि इन सभी राज्यों में पुलिस तो हो लेकिन वो बात सिर्फ दिल्ली की केंद्र सर्कार की माने, यहाँ तक कि किसी भी मंत्री या अफसर को भी साफ इंकार करदे भले ही अपराध ही क्यों न हो रहा हो, क्या ऐसे में राज्य की व्यवस्था सुचारु रूप से चलाना सम्भव है ?

आज ठीक यही स्थिति दिल्ली की है, यहाँ निर्वाचित सरकार तो है पर बिना किसी अधिकार के, अपराधी अपना कम करते रहें और उन्हें रोकने वाला कोई न हो तो फिर कानून मंत्री किस काम का? मुख्यमंत्री किस काम का? चुनाव का मज़ाक क्यों? स्थानीय जनता की बात तो पुलिस सुनती नहीं और जब जनता कानून मंत्री के पास मदद को जाये तो क्या वो मना करके घर पर आराम से सो जाये? क्योंकि पुलिस तो उसकी सुनेगी नहीं, तो फिर जनता क्या करे, क्या कानून अपने हाथ में ले ? जनता की आवाज उठाना गलत कैसे हो सकता है। कुछ इसी स्थिति से “आप” के २ मंत्रियो को रुबरु होना पड़ा और अब उलटे उन्ही पर आरोप लगाये जा रहे हैं, क्या हमारी राजनीती इतने नीचे गिर चुकी है कि सच का साथ देने वालों को सरेआम सताया जाये, और अगर यही करना था तो दिल्ली को राज्य बनाने का नाटक क्यों किया गया, उसे सिर्फ देश कि राजधानी ही रहने देना चाहिए था.

arvind kejriwal protest in delhi

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अगर आज “आप” के मुख्यामंत्री अरविन्द केजरीवाल को सड़कों में उतरना पड़ा है तो सिर्फ इस सड़ी गली व्यवस्था के विरोध में, वो भी चाहते तो आराम से घर में सोते रहते, क्यों बारिश में खुले असमान के नीचे सोते ? लोकतंत्र में मीडिया का बहोत अहम् रोल होता है, उसे निष्पक्ष होकर अपना कम करना होता है लेकिन इससे भी बडा एक काम होता है लोकतंत्र में और वो यह कि सच की आवाज़ को दबने न दे।  उसे अगर लगे कि दिल्ली का प्रदर्शन सही है तो उसमे सहयोग करे और जनता तक पहुंचाए न की उसे बुरा भला कहे क्योंकि यहाँ सवाल है देश हित का।

कोई भी भारतीय और कोई भी दिल्लीवासी इस धरने का समर्थन ही करेगा क्योंकि ये उन्हीकी आवाज़ है, जनता खूब अच्छी तरह से जानती है पुलिस कि कार्यप्रणाली कैसी होती है, आज अगर सड़क हादसे में कोई पड़ा मरता रहता है तो राहगीर उसकी मदद करने से क्यों कतराते हैं? क्या इस लिए कि भारत के लोगों ने अपनी संवेदना खो दी है, या फिर इसलिए कि कहीं कानून के रखवाले उन्हें बेवजह प्रताड़ित न करने लगें ? यही है हमारा और हमारे समाज का सच, कम से कम मीडिया तो इस दिशा में सहयोग करे।

इस्माइल।

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Photo Courtesy:  http://www.jagran.com/ , http://www.newsco.me/content/go/home , http://www.hindustantimes.com/

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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About ishmile khan

A Pen is always mightier then a Sword; that's what Ismail believes. He operates many blogs, social sites pages and writes for social issues & causes. Active member of PETA, AHRC, Greenpeace, Save arctic, world peace organizations and similar fields.

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