मास्टर सूर्यसेन और अरविन्द केजरीवाल

Arvind Kejriwal delhi cm

Master Suryasen

आज आप पूछ सकते हैं कि मास्टर सूर्यसेन कौन हैं  .सौ साल बाद लोग पूछेंगे अरविन्द केजरीवाल कौन है .मै आपको बतलाता हूं .मास्टर सूर्यसेन वे नायक थे जिनके नेतृत्व में चटगांव को अंग्रेजों से आजाद करवा लिया गया था .

रेल भवन के सामने दो दिन जो हुआ है. उसमें दो ही पक्ष हैं .अरविन्द केजरीवाल और बाकी सब . या कहिए .जो उनके साथ हैं  उसकी आवाज ही  इस गणतंत्र में नहीं है .दिल्ली के खिड़की एक्सटेंशन में जो हुआ वह एक घटना मात्र है .उस घटना के बाद जो कुछ हुआ हमें उसके आलोक में अपने आप को और अपने गणतंत्र को देखना चाहिए .

भारतीय पुलिस कैसे सुनवाई करती है ,कैसे गिरफ्तार करती है .कैसे एनकाउंटर करती है न्यायालयों के रिकार्ड रूम ऐसे केसों से भरे पड़े हैं और यही पुलिस देश के नेताओं के जूते किस तरह बांधती है इसकी तस्वीर भी आपकी  आँखों के सामने होगी ही .फिर ऐसा क्या हुआ कि बवाल हो गया .

भारतीय राजनीति में सभी राजनीतिक दल लगभग एक जैसे हैं और एक जैसी ही राजनीति करते हैं .सभी कानून और संविधान की बात करते हैं . अपने दल की पूर्ण बहुमत की सरकार बनाना चाहते हैं और देश को अपने ढंग से हांकना चाहते हैं .मगर देश इतना बड़ा और विविधतापूर्ण है कि चाह कर भी इन दलों की मंशा पूरी नहीं हो पाती .अब इनके सामने एक दल है जो सत्ता परिवर्तन नहीं  ,व्यवस्था परिवर्तन की मांग कर रहा है .कितने दल हैं जो व्यवस्था परिवर्तन को तैयार हैं ? कोई नहीं . सभी दल इस व्यवस्था में थोडा परिवर्तन चाहते हैं .थोडा संशोधन चाहते हैं .जिस से यह व्यवस्था बनी रहे . ऐसे ही चलती रहे .

पूरे देश में मेट्रो ,एयर पोर्ट और फ्लाई ओवर उपलब्धि के रूप में पेश किये जा रहे हैं .उनके इस गणतंत्र में ३२ रूपये से कम में गुजर करने वाली ६०% जनसँख्या कहां है ? वे लोग क्या इन सड़कों और फ्लाई ओवरों को खाएं .समानता और न्याय की बात तो इनके लिए छोड़ ही दीजिए .यदि इनके लिए कुछ करना है तो व्यवस्था परिवर्तन  करना ही होगा .

उसके लिए कौन तैयार है ? कोई तैयार नहीं है . धर्म , जाति ,अल्पसंख्यक, बहुसंख्यक , आरक्षण की राजनीति को किन लोगों ने बढाया है ( अब जैन भी अल्पसंख्यक होने जा रहे हैं और जाट आरक्षण के अंतर्गत आने वाले हैं ) जब यही सब करके सत्ता मिल जाती है और मिलने की सम्भावना है तो कुछ और क्यों किया जाय . और जिन लोगों के हित इस व्यवस्था में सध रहे हैं वे तो बिलकुल नहीं चाहेंगे कि यह व्यवस्था बदली जाय .

ऐसा नहीं है कि राजनैतिक दल ही इस व्यवस्था को बनाए रखना चाहते हैं . वे सभी लोग जो इस से लाभ पा रहे हैं इसे बचाए रखना चाहते हैं , भ्रस्ट पूजीपति ,उद्योगपति ,प्रशासन ,मीडिया ,पुलिस ,न्यायपालिका , देश के माध्यम वर्ग सहित सब इस  व्यवस्था को बचाए रखना चाहते हैं .उनका ही असली चेहरा इन दो दिनों में देश के सामने उदघाटित हो गया .

कहा गया ,प्रदेश के मुख्य मंत्री के धरने पर बैठने से संविधानिक संकट पैदा हो गया है .यह क्या संकट है ? इसका कोई जवाब नहीं है . सरकार तो अपना काम धरना स्थल से भी कर रही है .क्या इससे पहले मुख्य मंत्री धरने पर नहीं बैठे ? खूब बैठे हैं .करुणानिधि स्तर के मुख्यमंत्री धरने पर बैठे हैं .तो अब क्या हो गया ?

कहा गया , इस धरने से पूरी दिल्ली में घोर अव्यवस्था छा गयी है .राजधानी अराजकता की और बढ़ रही है .केन्द्र सरकार ने केवल चार मेट्रो स्टेशन बंद किये थे .ये सभी चार किलोमीटर की परिधि में आते हैं .इस क्षेत्र में कोई बाजार या कॉलेज इत्यादि भी नहीं है फिर भी रिपोर्टिग ऐसी की दिल्ली में अव्यस्था छा गई है .अतिरंजना की भी हद होती है .( अभी परेड की रिहर्सल के लिए इसके ज्यादा सडकों को बंद किया जाएगा )

कहा गया , गणतंत्र दिवस समीप है ,उसकी तैयारियां होनी है .गणतंत्र दिवस नहीं मन पायेगा .परेड कैसे निकलेगी .शहीदों का सम्मान कैसे होगा .देश के सम्मान की नाक कट जायेगी .विदेश में क्या इज्जत रह जायेगी . गणतंत्र दिवस आया नहीं था . अभी दूर था .परेड रेल भवन के सामने से नहीं  राजपथ से निकलती है .जहाँ धरना था वहाँ से परेड नहीं गुजरती . और ऐसा भी नहीं है कि परेड का रास्ता कभी बदल ही नहीं गया . पहले परेड चांदनी चौक से गुजरती थी उसे बदल दिया गया . फिर कनाट प्लेस से गुजरती थी .उसे भी बदल दिया गया .धरने पर मुश्किल से २०० आदमी थे .एनक्लोजर लगा कर आसानी से परेड निकली जा सकती थी .किसी को पता भी नहीं चलता की धरना हो रहा है .मगर सवाल बड़ा है .गणतन्त्र दिवस की परेड ऐसी होनी चाहिए .जिसे देख कर देश वासी के मन में सम्मान और सुरक्षा भर जाए .ऐसी भी क्या परेड जिसे खुद ही सुरक्षा के दायरे में निकलना पड़ता हो .लोगों की भागीदारी तो दूर की बात है.

समाचार पत्रों के संपादकों और टी वी के एंकरों के भी चर्चा कर ली जाय .हिंदुस्तान के एक संपादक को घोर आपति थी कि  अरविन्द ने देश के गृहमंत्री श्री शुशील कुमार संभाजी राव शिंदे को शिंदे क्यों कह दिया और वे खुद हर चेनल पर  कर एक राज्य के मुख्यमंत्री को अरविन्द , अरविन्द एक वचन में में संबोधित कर रहे थे. मगर उन से सवाल कौन करे .

कुछ महान पत्रकारों को ,इस धरने में विदेशी ताकतों का हाथ दिखने लगा ,कुछ दूरदृष्टि पत्रकारों को लगने लगा कि रेल भवन तहरीर चौक बनने की ओर बढ़ रहा है .सुश्री किरण बेदी टी .वी पर आ कर राष्ट्रपति जी से अनुरोध करने लगी कि ऐसी अव्यवस्था फ़ैलाने वाली सरकार को तुरंत बर्खास्त कर दें .वो भूल ही गईं कि राष्ट्रपति ऐसा कर ही नहीं सकते . केन्द्र सरकार जब तक ऐसी सिफारिश न करे वे खुद ऐसा कुछ नहीं कर सकते .

टी वी पर अजब उन्माद छाया था .कैप्टन गोपीनाथ आप पार्टी के प्राथमिक सदस्य हैं .मगर कहा जा रहा नेता आप केप्टन गोपीनाथ ने कहा है कि रिटेल में एफ डी आई को न आने देना गलत है .कैप्टन गोपीनाथ तो आप पार्टी के नेता नहीं हैं .सब पत्रकार मिल कर सलाह दे रहे थे कि अरविन्द अब मुख्यमंत्री हैं .मंत्रालय में जा कर बैठें .धरना प्रदर्शन सत्ता पाने के लिए किया जाता है .अब सत्ता उन्हें मिल गयी है . मंत्रालयों और विभागों के साथ लेटर बाजी करें .जनता के जो १८ वायदे किये हैं उन्हें पूरा करने की कोशिश  करें .जनता उनके साथ है.कांगेस उनके साथ है . ( बी जे पी ,कांग्रेस और अन्य दलों के नेताओं ने इस धरने के बारे में जो कहा  उसके बारे में यहाँ टिप्पणी करना भी व्यर्थ है .क्योकि उन्होंने जो कहा वह लोकतंत्र की उनकी छिछली समझ को दर्शाता है और उन्होंने जो कुछ कहा आगामी लोकसभा के चुनाव को ध्यान में रख कर कहा )

अब एक कथन श्री अरविन्द के लिए . यह सच है कि अरविन्द के साथ ऐसे देशभक्त लोग हैं जो एक आवाज सुन कर अपना परिवार काम धाम छोड़ इक्कठे हो जाते हैं .भीगी रातों में साथ खड़े होते हैं और सिरों पर डंडे खाते हैं .मगर यह भी सच है आप के साथ ऐसे भी लोग हैं ( और आ रहे हैं ) जो पार्टी में  रह कर अपने स्वार्थ साधना चाहते हैं .जब उनके स्वार्थ पर चोट लगेगी .तब वे कैसे बिलब्लायेगे .कैसे पलट कर चोट करेगें .उस के लिए आपको तैयार रहना होगा .अभी तो वह काम आपने अभी शरू भी नहीं किया है जूदास इसा मसीह के साथ ही था .आपको सावधान रहना होगा .

आप उन भूखे ,नंगे ,असहाय, सडक पर सोने वाले ,आत्महत्या की दहलीज पर पहुचे लोगों के लिए व्यवस्था परिवर्तन चाह रहे हैं जिनकी आज कोई आवाज ही नहीं है .अभी तो वहाँ चोट हुई ही नहीं ,जहां से परिवर्तन शुरू होगा .पुलिस वाले रिक्शेवाले नागरिक के प्रति सम्मानपूर्ण और जिम्मेदार हों  यह समझने में समय लगेगा .यह धर्म युद्ध है .अपनी भूमिका निभाते रहिए . बस.

चटगांव के अंग्रेजों से आजाद होने की कहानी हम सब को याद है .यह कहानी नहीं , इतिहास का सच है उसके केन्द्र में थे मास्टर सूर्यसेन .समय साथ देता तो देश १९२९ में ही आजाद हो जाता ..कुछ दिन पहले एक हिन्दी  फिल्म चटगांव देखी थी .फिल्म चली नहीं . मगर आज फिर याद आ गयी .अरविन्द और मास्टर सूर्यसेन में अदभुत साम्य है .आप फिल्म में आज के गृहमंत्री और उस समय के कलकता के ब्रिटश ऑफिसर ,और दिल्ली के वर्तमान एल जी और चटगांव के स्थानीय गवर्नर के बीच साम्य देख कर दंग रह जाएगें . कहीं समय तो अपने आप को नहीं दोहरा रहा है .

यू ट्यूब पर फिल्म का लिंक है

https://www.youtube.com/watch?v=9YgLSslPYlc

गणतंत्र दिवस के सप्ताह में देश को समर्पित फिल्म ही देख ली जाय .ध्यान दे .हमारा अतीत ही हमारा भविष्य है अगर हम देख पाएं .

अशोक उपाध्याय

 

Share this:

PinIt
Top