और एंडरसन मर गया

bhopal 3भारत में विश्व की सबसे बड़ी औधोगिक दुर्घटना 3 दिसंबर 1984 को भोपाल में हुई .जिसमें लगभग 8000 लोग जहरीली गैस से दो सप्ताह में मर गए और इतने ही उसके बाद हुई गंभीर बीमारिओं से मरे .एक अनुमान के अनुसार पांच लाख से अधिक लोगों पर इस जहरीली गैस का दुष्प्रभाव हुआ.

इस दुर्घटना के बाद क्या हुआ .वह सब इतिहास में दर्ज है .जो दर्ज नहीं है वह यह है कि जितनी बड़ी दुर्घटना आज से 30 साल पहले हुई थी आज हम वैसी ही दुर्घटना के मुहाने पर बैठे हैं .शायद उससे भी बड़ी दुर्घटना के लिए तैयार बैठे हैं .

यहाँ उल्लेखनीय है कि 1 जनवरी 1973 में भारत सरकार ने फेरा कानून को लागू किया था और तय किया था किकिसी भी कंपनी में 40 प्रतिशत से अधिक विदेशी निवेश फेरा कानूनों काउल्लंघन माना जायेगा .तब भारत सरकार ने यूनियन कार्बाइड के साथ मिल कर मिथाइल आइसोसाइनाइट बनाने का जो कारखाना स्थापित किया था उसमें उसने 60 प्रतिशतशेयर अपने पास रखे थे .अब तो सरकार ने विदेशी निवेश के लिए 40 % क्या 100 % की अनुमति दे दी है .उनके लिए एस. ई. जेड. बनाए जा रहे हैं जहाँ देश के सामन्य नियम भी लागू नहीं होते .ऐसे में इससे बड़ी दुर्घटना क्यों न होगी .

विकास के अंधी दौड़ में शामिल सरकार ने फैसला कर लिया है अब कारखानों पर सरकारी नियंत्रण भी नहीं होगा .इंस्पेक्टर की व्यवस्था समाप्त कर दी जायेगी .उद्योगपति जो घोषणा करेगा कि उसके यहाँ नियमों का पालन हो रहा है उसे ही वास्तविक मान लिया जायेगा .केवल नमूने के लिए कुछ निरीक्षण किए जायेंगे .जब उस समय निरीक्षण की कठोर व्यवस्था थी तब इतनी बड़ी दुर्घटना घट गयी .जब केवल घोषणा होगी तब क्या होगा इसका अनुमान लगाया जा सकता है .

सब जानते हैं जब यह दुर्घटना हुई थी तब केन्द्र में कांग्रेस की सरकार थी और राजीव गांधी प्रधान मंत्री थे और मध्यप्रदेश में भी कांग्रेस की सरकार थी और अर्जुनसिंह मुख्यमंत्री थे .उसके बाद केन्द्र में और मध्यप्रदेश गैर कांग्रेसी सरकारें बनी .जिसमे बी जे पी की सरकारें भी शामिल हैं .लेकिन किसी ने यह जानने की कोशिश नहीं की थी / की है कि कैसे कोर्ट गेस्ट हाउस में लगाई गई और कैसे एंडरसन को जामनत दे दी गई .

कुछ लोग कहते हैं कि स्वर्गीय अर्जुन सिंह ने तीन करोड़ रूपये की रिश्वत ले कर उन्हें छोडा था .तो कुछ लोग कहते हैं उन्हें छोड़ने के लिए दिल्ली से ही सीधा फोन आया था .वे तो आदेश का पालन कर रहे थे .अगर ऐसा था तो यह फोन किस ने किया था .क्या यह फोन राजीव गांधी ने किया था .दुर्घटना के बाद आने वाली किसी भी सरकार या उसकी एजेन्सी या पत्रकार ने इसकी खोज नहीं की है .इसके पीछे क्या रहस्य है .

उसके बाद जो हुआ वह और भी शर्मनाक है .न्याय के नाम पर सरकार ,गैस पीडितों की ओर एक पक्ष बन गई और 47 करोड़ डॉलर में पूर्ण और अंतिम समझौता कर कर लिया जिस में अपराधिक कृत्य के लिए मुआवजा भी शामिल था .देश की न्याय व्यवस्था ने 25 साल बाद यूनियन कार्बाइड के केवल आठ लोगों को अधिकतम दो साल की सजा सुनाई और उसमें भी वे तुरंत जमानत ले कर बाहर आ गए हैं . इस पूरी सुनवाई के दौरान एंडरसन कोर्ट में नहीं आया .

भारत की कोर्ट ने एंडरसन को सम्मन पर सम्मन भेजे मगर वे तामील नहीं हुए .कोर्ट ने एंडरसन को भगोड़ा घोषित कर दिया .भारत सरकार कोर्ट के सम्मन के बावजूद एंडरसन का प्रत्यापर्ण नहीं करवा सकी .सच यह यह कि भारत सरकार ने उसे भारत लाने के प्रभावी प्रयास ही नहीं किये . सरकार केवल लोक लाज के लिए डाकिये की तरह अमरीका सम्मन भेजती रही .

कालांतर में यूनियन कार्बाइड को डाव केमिकल ने खरीद लिया है जो कि अमरीका की कम्पनी है और भारत में कीटनाशक बना और बेच रही है .डाव केमिकल लगातार इस हादसे की जिमेदारी से बचने का प्रयास कर रही है .विदेशी पूंजी निवेश की लालायित सरकार को देश में आते हुए डालर के सामने इसके अपराध नहीं दिखते .

एंडरसन बिना कोर्ट में पेश हुए ही ,गुमनाम मौत मर गया .जब वह स्वयं भारत आया था तो उसे हमने आपने हवाई जाहज में बैठा कर देश से बाहर कर दिया . दूसरी ओर अमरीका है जो सद्दाम हुसैन और ओसामा बिन लादेन को खोज कर मार कर ही दम लेता है लेकिन वही अमरीका अपने देश में छिपे एंडरसन को खोज कर भारत के हवाले नहीं करता है .

दोनों देशों में लोकतंत्र है .न्याय पालिका है मगर सच यह है कि दोनों देशों का लोकतंत्र उद्योगपतियों के पैसे और प्रभाव से चलता है और उन्हीं का हित संरक्षण करता है .ऐसे में यह सोचना कि ये सरकारें उसे गिरफ्तार करतीं और और सजा देती .शायद एक कल्पना है .एंडरसन 92 साल का होकर एक सहज मौत मर गया .

उसे अपराधी की तरह न्यायालय में उपस्थित होने से बचाने वाले लोग और तंत्र आज भी मौजूद है .हम हैं कि ऐसे लोगों और तंत्र को पहचानने से भी इंकार करते हैं .एक दिन हम भी मर जाएगें .दोषी एंडरसन है तो हम भी हैं .

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