सरकार बनाने न बनाने का खेल

17722590.cmsदिल्ली चुनाव में आम आदमी पार्टी के शानदार प्रदर्शन से पारंपरिक राजनीति के पंडित जहाँ पहली बार चौंके थे वही अब यह रोज का क्रम बन गया है। रोज एक नई और चौंकाने वाली खबर सामने आती है। जनता की राय से सरकार बनाने का फैसला भी ऐसा ही है। दरअसल जनता की इच्छा के स्वयंभू जानकार बनते जनप्रतिनिधियों ने कभी सोचा भी न होगा कि कभी ऐसा भी होगा कि सत्ता की दहलीज पर बैठी कोई पार्टी जनता की राय को कुर्सी से अधिक महत्त्व होगी। अपने भाषणों में सत्ता को जहर कहने वाले राहुल गांधी भी सोच रहे होंगे कि कहीं वाकई सत्ता जहर तो नहीं?
यूँ तो अब गेंद जनता के पाले में है और दिल्ली की जनता एक बार फिर से स्वयं तय करेगी कि उसे आम आदमी पार्टी की सरकार चाहिए या नहीं, लेकिन फिर भी सरकार बनाने और न बनाने के संशय में फंसी इस नई पार्टी का यह कदम सराहनीय है।अगर बात इस पर करें कि आखिर सरकार बनाने या न बनाने का असर ‘आप’ के भविष्य पर क्या पड़ेगा तो अजीब सी स्थिति उभर कर सामने आती है।
देखा जाए तो आम आदमी पार्टी की हिचक सही भी है और गलत भी। सही इसलिए कि व्यवस्था परिवर्तन के जिस उद्देश्य को लेकर पार्टी का गठन हुआ है उसके लिए धीमी रफ़्तार से घूमता समय का पहिया ठीक नहीं है बल्कि दिल्ली चुनाव से निकली लहर और कार्यकर्ताओं के जोश का फायदा उठाते हुए आगामी लोकसभा चुनाव में महत्वपूर्ण दांव खेलने के लिए ‘आप’ को तैयार रहना चाहिए। अन्यथा यह संभव है कि दिल्ली में सरकार बनाने की दशा में आप का प्रथम पंक्ति का नेतृत्व दिल्ली में जनता से किये वादों को पूरा करने में व्यस्त हो जाए और बड़े बदलाव के लिए शुरू हुई लड़ाई, कुछ समय के लिए ही सही, दिल्ली में सिमट कर रह जाए।
दूसरी ओर यह हिचक गलत इसलिए लग रही है कि   दिल्ली में सरकार बनाने की दशा में विधानसभा चुनाव में जनता से किये वादों का पूरा होना जहाँ ‘आप’ की विश्वसनीयता को बढ़ाएगा वहीँ इसी समय में आप के दूसरी पंक्ति के नेता देश भर में फैले संगठन की समीक्षा करके कार्यकर्ताओं की राय से लोकसभा चुनाव के लिए जरूरी बदलाव कर सकते हैं, क्योंकि दिल्ली का अनुभव भी यह बताता है कि बाहर से आये समर्पित कार्यकर्ताओं और जनता के विशवास की लहर पर लड़ा गया चुनाव भी पार्टी उन अधिकतर सीटों पर हार गई जहाँ कार्यकर्ता संशय में थे या नाराज थे भले ही इसके लिए केवल संवादहीनता ही जिम्मेदार हो। दिल्ली में किये वादे पूरे करने की दशा में जनता जहाँ लोकसभा चुनाव में आप को भरपूर सम्मान देगी वहीँ दिल्ली का राजनैतिक अनुभव आगे के संघर्ष में काम आएगा।
मौजूदा हालात को देखते हुए श्रेयस्कर यही है कि आप आगे बढे और सरकार बनाये क्योंकि पिछले एक साल के राजनैतिक जीवन में हर रोज पार्टी इस धारणा को ध्वस्त करती आई है कि उसे राज करने के लिए सत्ता चाहिए, ऐसे में सत्ता के लालची होने का आरोप लगने का डर बेबुनियाद है। एक और आरोप है जिसका सामना आप को करना पड़ सकता था और वह था कांग्रेस से मिलीभगत होने का लेकिन जनता की राय से सरकार बनाने या न बनाने का विकल्प चुनकर यह कलंक भी ‘आप’ ने अपने माथे पर लगने से पहले ही हटा दिया। इसके बाद भी अगर कोई पार्टी जनता के इस फैसले पर ऊँगली उठाती है तो जवाब जनता को देना है जो अब लाल नीली बत्तियों के अन्दर बैठे जनसेवकों से आंख मिलाना और उन्हें धूल चटाना सीख गई है।
अब सवाल यह आता है कि क्या ‘आप’ अपने चुनावी घोषणापत्र में किये वादे पूरे कर पायगी? मुझे लगता है हाँ! उदाहरण के तौर पर केवल बिजली पानी के मुद्दे को लें तो इनके दाम कम करने के लिए केवल इच्छाशक्ति और प्रशासनिक सूझ-बूझ की जरूरत है, बजट और फंड तो केवल रिश्वत कम होने से ही आ जायगा। पहले जो कम्पनियाँ रेट बढवाने के लिए अलग अलग दरबारों में जो चढ़ावा चढ़ाया करती थी अब वही उनके लाभ का हिस्सा होगा। अगर कोई कसर होगी भी तो वह सब्सिडी से पूरी की जा सकती है। अगर भाजपा या कांग्रेस किसी तरह की कोई आनाकानी बजट पास करने या अन्य कोई अडंगा लगाने के रूप में करती है तो इस्तीफा देकर जनता की कचहरी में जाने का विकल्प हमेशा खुला है।
अब तक का अनुभव यही कहता है कि ‘आप’ प्राकृतिक रूप से उभरा एक विकल्प है। बात 2011 से अब तक करें तो जहाँ अगस्त क्रांति सरकार में बैठे लोगों की अहंभावना का परिणाम थी तो दिसंबर 2011 में मिले धोखे और जुलाई 2012 में एक जनभावना के आन्दोलन की अनदेखी के साथ साथ संसद की महत्ता और कानून बनाने में सड़क के संघर्ष के महत्त्व को नजरअंदाज करने के फलस्वरूप आम आदमी पार्टी का गठन भी इन्हीं लोकतंत्र के मठाधीशों के बार बार ललकारने पर हुआ। यही हालात अब बन रहे हैं! शायद प्रकृति यही चाहती हो कि दिल्ली में आप की सरकार कुछ ऐसे चमत्कार करे कि देश की जनता चिर-प्रतीक्षित व्यवस्था परिवर्तन के सपने को साकार होते देख सके। कौन जाने भविष्य के गर्त में क्या छुपा है!
खैर! तय तो जनता को करना है क्योंकि फैसला भी जनता का होगा और नतीजे भी जनता के लिए ही होंगे।

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About Satish Sharma

Satish Sharma is Editor, Hindi of Awaz Aapki. Writes in many News Papers & Magazines as Columnar, Analyst. Like to work as Citizen Journalist. Doing his bit of work in raising voice of unheard. Currently he is managing two shows of Awaz Live TV named Mashal and Manthan also.

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