क्या शिवसेना को AAP पर बोलने का कोई अधिकार है?

AAP is Item Girlमहाराष्ट्र के नेताओ में AAP की अभद्र भाषा में निंदा करने की होड़ लगी है. शिंदे ने दिल्ली के मुख्यमंत्री को येडा (पागल) कहा तो शिवसेना के नवाबजादे उद्धव ठाकरे ने CM की तुलना राखी सावंत से की. ये वही लोग है जिनका मुह आजतक जनलोकपाल और स्वराज पर नहीं खुला. खैर जनलोकपाल और स्वराज पर ये लोग कुछ बोलेंगे भी नहीं क्योकि इन्हें लोकतंत्र का राजाशाही अंदाज़ ही पसंद है और इन्हें लोगो पर शासन करना अच्छा लगता है, लोगो की राय से चलनी वाली शासन प्रणाली नहीं. उद्धव ठाकरे ने कहा की अभिनेत्री राखी सावंत अरविन्द केजरीवाल से बेहतर सरकार चला सकती है. जिन उद्धव ठाकरे को आजतक सरकार चलने का कोई अनुभव नहीं है, वो एक ऐसी तुलना कर रहे जिसका कोई मतलब ही नहीं निकल सकता. सामना में लिखे सम्पादकीय में AAP को मजाक बताया गया, लेकिन दिल्ली में 28 सीट जीतना कोई मजाक नहीं है और जिस तेज़ी से AAP का महाराष्ट्र सहित पुरे देश में विस्तार हो रहा है, अगर शिवसेना ने इस बात को मजाक में लिया तो शिवसेना से बड़ा मजाक इस देश किसी का नहीं उड़ेगा.

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शिवसेना और कांग्रेस में कोई खास अंतर नहीं है. जहाँ कांग्रेस में गाँधी होना महत्वपूर्ण है वहां शिवसेना में ठाकरे होना महत्वपूर्ण है.वंशवादी राजनीती को अब देश की जनता ने अस्वीकार कर दिया है. AAP का जनाधार इसी लिए बढ़ रहा है क्योकि की वर्तमान के राजनैतिक दल इस पार्टी के उदय से कोई सीख लेना नहीं चाहते. इन नेताओ का संपर्क जनता से टूट गया है. एक दौर था जब पार्टी के शीर्ष नेता के व्यक्तित्व को देख कर लोग मतदान करते थे. इसी का फायदा बीजेपी को वाजपेयीजी के समय मिला और शिव सेना को बाला साहेब ठाकरे के समय. अब लोगो की सोच में परिवर्तन आया है और लोग नेताओ के व्यक्तित्व को देख कर मतदान नहीं कर रहे, लोग नेताओ की नीतियों और उन नीतियों को लागु करने की नीयत को देख कर मतदान कर रहे है. दिल्ली के जनादेश ने इसी बात को सिद्ध किया.

अब देश की जनता परंपरागत राजनीती जिसमे धर्म, प्रांतवाद, भाषावाद और जातिवाद का शुमार था, उस राजनीती को छोड़ चुकी है. मराठी अस्मिता का नारा लगाकर जो नेता अपने बच्चो को हाई प्रोफाइल अंग्रेजी स्कूल और अमेरिका लन्दन की महंगी यूनिवर्सिटी में पढाई करवाते है,अब ये बात भी लोगो के समझ में आ रही है. इन नेताओ के भाषनो में कार्यकर्ताओ के लिए मराठी में शिक्षण लेने का आदेश होता है, लेकिन अपने बच्चो पर ये आदेश लागु नहीं होता. ये भी बात इस देश की जनता के सामने है. आने वाले चुनाव में इस देश की जनता ऐसे दोहरे मापदंड वाले नेताओ की बात को कितनी गंभीरता से लेती है, ये देखना होगा लेकिन, शिवसेना को एक चीज़ समझनी होगी, राजनीती में शिष्टाचार सबसे बड़ी चीज़ होती है. ये बात और है की जिन नेताओ को शिवसेना के लोग मंचो पर गालियाँ देते है, उन्हें के साथ बाद में भोजन करते है. लेकिन शिव सेना का AAP पर ऐसा अभद्र आक्षेप सही नहीं है.

शिवसेना की राजनीती हिंदुत्व और मराठी मानुस के मुद्दे पर चलती आई है. मुंबई में रहने वाले उत्तर भारतीयों के साथ आये दिन शिवसेना के लोग मार पीट करते है और कहते है मुंबई किसी के पिता की जागीर नहीं है. राज ठाकरे की राजनीती भी बहुत हद तक  शिव सेना की राजनीती के सामान ही है. और महाराष्ट्र की जनता ने न इस किस्म की राजनीती को पूर्ण रूप से स्वीकार किया है, और नाही पूर्ण रूप से नज़र अंदाज़. लेकिन पिछले 10 वर्षो की यदि बात की जाए तो महाराष्ट्र की जनता ने इस भाषावाद और प्रांतवाद की राजनीती को अब अस्वीकार करना प्रारंभ कर दिया है और इसी वजह से शिवसेना की स्थिथि विधानसभा और लोकसभा में कमजोर होती गयी. अगर शिवसेना AAP के जैसे जनहित के मुद्दों को न उठा कर वही परंपरागत राजनीती करती रहेगी, तो उसका इतीहास बनना लगभग तय है. न केवल शिवसेना, ये सभी पार्टियों के लिए चेतावनी है क्योकि AAP कोई पार्टी नहीं है, ये एक वैकल्पिक राजनीती की विचारधारा है जिसे लोगो का अच्छा समर्थन मिल रहा है. जो पार्टियाँ समझ जाएगी, उनको जनता पसंद करेगी, जो नहीं समझी, वो इतिहास बन जाएगी. अब शिवसेना को अपने विरोध प्रदर्शन के तौर तरीको में, अपने मुद्दों में और अपने कार्य शैली में बदलाव लाना पड़ेगा, अन्यथा लोग अपनी ही सरकार की संपत्ति का नुकसान बर्दाश्त नहीं करेंगे और असुविधा को भी बर्दाश्त नहीं करेंगे.

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About Yogesh Mandhani

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