“आप” को जाने और अपने आप को बदलें

arvind_kejriwal

चुनाव चार राज्यों में थे पर जाने क्यों नजर सभी की दिल्ली पर लगी हुई थी. जैसे जैसे तस्वीर साफ़ होती गई तो लगा जैसे राजनीति 22 साल पीछे की दौड़ लगा रही है. 1991 के दौर में जब राजीव गांधी की अप्रत्याशित हत्या के बाद कांग्रेस को सहानुभूति का वोट मिलने के बाद भाजपा 121 पर सिमट गई थी तो एक अखबार में रिपोर्ट को शीर्षक दिया गया था “विजेता दूसरे स्थान पर रहा”. भाजपा के लिए यह आंकड़े उसके राम मंदिर आन्दोलन के असर को देखते हुए उम्मीद से बहुत कम थे. दिल्ली में भी कुछ ऐसा ही हुआ है. सड़क से सत्ता को चुनौती देते देते सत्ता की दौड़ में जनसरोकारों के लिए दौड़ती एक नई पार्टी ने पार्टी ने नतीजों से पहले खेल के नियम बदले और नतीजों के बाद खिलाड़ी भी.

दिल्ली में उभरी राजनीति नई भी है और पुरानी भी. नई इसलिए कि नई पीढी ने इसे पहले कभी देखा नहीं और पुरानी पीढी को यकीन नहीं हुआ कि राजनीति ऐसे भी हो सकती है.लेकिन गौर से देखे तो यह पुरानी राजनीति है जो कई दशक पहले तक कभी प्रधानमंत्री कार्यालय से होती रही जहाँ देश का प्रधानमंत्री देश में पैदा हुए अन्न-संकट के बाद प्रधानमंत्री निवास के अन्दर हल चलाने लगा था, तो कभी यह राजनीति सड़क पर होती रही जहाँ बिहार के गाँधी मैदान में सरकार के द्वारा पंद्रह दिन पहले से सभी रास्ते बंद करने के बावजूद दो लाख से ज्यादा किसान बिहार के गाँवों से पहुंचे थे जो बाद में सम्पूर्ण क्रांति के नारे के साथ दिल्ली के सिंहासन को हिलाने में कामयाब हुए.

केजरीवाल भले ही मुख्यमंत्री बनने में कामयाब न हुए हो या जंतर मंतर पर कैबिनेट और रामलीला मैदान में विधानसभा की बैठक के लिए दिल्ली को अभी इन्तजार करना पड़े लेकिन बदलाव की बयार में जनता ने एक नौसिखिया पार्टी को अपना विशवास तो सौंप ही दिया है. अब इस विशवास को संभाले रखने की काबिलियत और काजल की कोठरी में सफ़ेद कुरते को पहन कर बेदाग़ बने रहने की कोशिश ही आगे का रास्ता तय करेगी.

इस नतीजे को भाजपा और कांग्रेस ने उसी तरह लिया जैसा कि उम्मीद थी. कुछ चुनिन्दा नेताओं को छोड़कर, जिन्होंने मौके की नजाकत को समझते हुए अलग-अलग मंचों से आप के नेताओं को बढ़ाई भी दी, लगभग सभी ने अभी कबूतर की तरह आँख बंद बिल्ली गायब की तरकीब अपनाई हुई है. केजरीवाल को कोसने वाले अभी भी अपना राग अलाप रहे हैं और सबसे बड़ा खतरा उनके लिए व्यक्ति केन्द्रित राजनीति का उभरना ही है. इंदिरा गाँधी से लेकर राहुल-मोदी तक व्यक्ति केन्द्रित राजनीति में कोई सन्देश ना खोजने वाले ये महान विश्लेषक आम आदमी की उस अकुलाहट को नहीं समझ पा रहे हैं जहाँ एक दल के मुकाबले एक व्यक्ति अधिक विश्वसनीय बन जाता है, बशर्ते उसका जुड़ाव आम जनमानस के मुद्दों से हो.

दिल्ली चुनाव में आखिरी समय तक भाजपा और कांग्रेस की कोशिश यही थी कि वे ये साबित कर सकें कि आप उन्हीं की फोटोकॉपी है और जनता ओरिजिनल से ही काम चलाये तो बेहतर है. लेकिन चुनाव नतीजे यह बताने के लिए काफी हैं कि वैकल्पिक राजनीति धान के खेत में जानवरों को डराने वाला एक साधारण पुतला यानी बिजूका नहीं है बल्कि अब यह लोकतंत्र का सत्य है.

पारंपरिक राजनीति से निस्तेज पड़ी पार्टियों को अगर अब भी लूट के नैतिक नियम बनाने में शर्म की अनुभूति नहीं होती तो उनके विश्लेषण इसी चालीसा के पाठ पर टिके रहेंगे कि एक दिन सब निराश होकर उनकी शरण में लौट आयेंगे. और अंत में जिंग जिगलर की उस उक्ति को याद करना होगा जिसमे वह कहते हैं कि ‘अगर आप यह इन्तजार करें कि चौराहे की बत्ती हरी होगी तभी मैं घर से निकालूँगा तो आप कभी घर से नहीं निकल पायेंगे”. समय आ गया है कि पारंपरिक राजनीति करने वाले बदलाव के लिए घर से निकले और बत्ती हरी होने का इन्तजार करें. वरना अभी तक ट्रैफिक कंट्रोल रूम में बैठकर ट्रैफिक को कंट्रोल करने वाले जल्दी ही लोकतंत्र के सिपाही द्वारा धरे जायेंगे जिसकी शुरुआत दिल्ली की गलियों में हो चुकी हैं.

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About Satish Sharma

Satish Sharma is Editor, Hindi of Awaz Aapki. Writes in many News Papers & Magazines as Columnar, Analyst. Like to work as Citizen Journalist. Doing his bit of work in raising voice of unheard. Currently he is managing two shows of Awaz Live TV named Mashal and Manthan also.

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