बस यूँ ही – अन्ना आप बहरूपिये हो !

Anna-Hazare1

अन्ना जी,

सादर प्रणाम !

कभी कभी सोचता हूँ कि अब से सौ साल बाद सरकारी दस्तावेजों के आधार पर जब इतिहास लिखा जायगा (इतिहास सरकारी दस्तावेजों के आधार पर सरकारी सुविधा के हिसाब से ही लिखा जाता है) तो क्या कहेंगे लोग और आपकी क्या भूमिका होगी?

मुझे लगता है यह तीन हिस्सों में होगी। पहला भाग आपके जन्म से लेकर 2011 की शुरुआत तक होगा जहाँ आप एक समाजसेवी की भूमिका में होंगे और हर सरकारी, गैर सरकारी, अर्ध सरकारी संगठन, विभाग और नेता-अभिनेता आपके क़दमों में सर झुकाता था। आपको पुरूस्कार पर पुरूस्कार दिए जाते थे। हर कोई आपकी तारीफ करता था लेकिन जनता का अधिकतर हिस्सा आपको जानता नहीं था।

फिर कमबख्त 2011 आ गया और आप एक नादान और देश बदलने को चले एक भोले भाले ‘कुटिल’ युवा की बातों में आ गये। मैं यहाँ इस व्यक्ति यानी अरविन्द केजरीवाल का नाम इसलिए नहीं लूँगा क्योंकि यह लगभग निषिद्ध नाम रहा है मीडिया के लिए एक लम्बे समय तक। आप इसी की बातों में आकर जनलोकपाल की मांग कर बैठे और बन बैठे खलनायक बहुत से सरकारी लोगों की नजर में। आप सर से पाँव तक भ्रष्टाचार में लिप्त नजर आने लगे कई मंत्रियों को। आपको चोर और ठग की उपाधियाँ भी इसी दौर में मिली लेकिन जाने क्यों यह पागल जनता इस दौर में आपको पूजने की हद तक चाहने लगी। खैर! जनलोकपाल तो न आपको मिलना था न मिला लेकिन एक लोहे की गोली आपको चूसने के लिए इस आश्वासन के साथ मिली कि जब यह ख़त्म हो जायगी देश की संसद लोकपाल पास कर देगी। गोली आज भी आप चूस रहे हो और लोकपाल अभी भी पास होने की प्रतीक्षा में हैं।

अब अचानक 2013 में फिर आपने रूप बदल लिया है और जो लोग आपको 2011 में गोलियां और गालियाँ देने में शामिल रहे थे वही अब आपको समाजसेवी से भी बढ़कर संत की उपाधि देने लगे हैं। कारण एक छोटे से पुर्जे को बताया जा रहा है जिसे मीडिया ख़त कह कर प्रचारित कर रहा है। सुना है आपने अपने उसी एकलव्य का अंगूठा काटने का मंसूबा बना लिया था जिसे आप एक लम्बे अरसे तक अपने जैसा बताते रहे हैं। ताजा खबरों से अनुसार कैमरों के सामने आपने हैंड्स-अप करके यह दिखाया कि आपके हाथ में कोई चाकू नहीं है लेकिन देखने वालों को आपके हाथो में एक सपने का खून तो दिखाई दे ही रहा है। मीडिया और राजनेताओं के बदलते रुख के सामने केवल एक व्यक्ति अब तक अडिग रहा है जो आपको 2011 से पहले भी और आज भी अपना गुरु कहता है और मानता है। नाम लेकर हमला करने वालों का नाम लेना तो शायद जरूरी नहीं। सवाल उठता है जनता का कि ताजा प्रकरण के बाद वो आपके बारे में क्या सोचती है? छोडो! काहे परेसान हो रहे हो? जनता की सोचता कौन है जो हम सर का दर्द पालें!

बस इतिहास की फ़िक्र है कि जब आज से सौ साल बाद कोई नरेन्द्र मोदी टाइप सज्जन सत्ता-संघर्ष में (सत्ता शाश्वत संघर्ष का विषय है।) आपका नाम उद्घृत करेगा तो क्या कहेगा? शायद वह आपको वही उपमा दे जो राजनैतिक रूप से फायदेमंद हो या शायद सरकारी दस्तावेजों के आधार पर बहरूपिया कहे जो कभी सरकार का प्यारा तो कभी प्यादा बनता रहा।

आपका,
वही जो कुछ नहीं है पर आपके लिए सडकों पर घूमता रहा, तिरंगा लिए |

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About Satish Sharma

Satish Sharma is Editor, Hindi of Awaz Aapki. Writes in many News Papers & Magazines as Columnar, Analyst. Like to work as Citizen Journalist. Doing his bit of work in raising voice of unheard. Currently he is managing two shows of Awaz Live TV named Mashal and Manthan also.

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