175000 करोड़ क़र्ज़ के भंवर जाल में गुजरात

Debt on Gujarat Governmentजी हाँ आपको ये सुनकर आश्चर्य होना लाजिमी है क्योंकि अब तक जिस तरह से गुजरात कि ब्रांडिंग और मार्केटिंग के बल पर पिछले कई सालो से पूरे देश में मॉडल स्टेट के रूप में पेश किया जा रहा हो और जिसकी छवि इस तरह से बनायी गयी हो कि हर भारतीय के दिमाग में गुजरात के विकास का जादू सर चढ़ कर बोल रहा हो ऐसे राज्य के बारे में ये ये सुनना थोडा अटपटा और अविश्वसनीय जरूर लग सकता है लेकिन ये सौ फीसदी सत्य है जिसे दिखाने कि हिम्मत आज के दौर में शायद ही मीडिया कर पाए.

यूँ अगर विकास के पैमाने पर देखा जाए तो देश में गुजरात को आज पहले स्थान पर रखने कि परम्परा सी बन गयी है लेकिन अगर प्रति व्यक्ति क़र्ज़ कि बात कि जाए तो इसमें भी गुजरात पूरे देश में अव्वल है हालांकि कुल क़र्ज़ के मामले में पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश इससे आगे है .

पिछले दस सालो में जिस गति से गुजरात का विकाश हुआ है उससे दुगुने तीगुने गति से गुजरात पर
क़र्ज़ का बोझ बढ़ा है और आज स्थिति ऐसी हो गयी है कि गुजरात का ये क़र्ज़ उसे ऐसे भंवर जाल में फंसा चूका है जिससे निकलना भविष्य में शायद ही कभी सम्भव हो पाए.

२००१- २००२ में जब मुख्यमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने सत्ता सम्भाली तब गुजरात पर महज ४५ ह्जार  करोड़ का क़र्ज़ था जो उनके कार्यकाल के साथ बढ़ते हुए आज लगभग पौने दो लाख करोड़ तक पहुच चूका है और अगले साल दो साल में ये आंकड़ा दो लाख करोड़ तक पहुच सकता है साल १९९५ में जब बीजेपी पहली बार सत्ता में आयी तब गुजरात पर महज दस हजार करोड़ का क़र्ज़ था.

आज देखा जाए तो गुजरात के प्रत्येक व्यक्ति के सिर पर लगभग 24 हजार यानि  एक परिवार पर औषतन लगभग सवा लाख का क़र्ज़ है जिसका ब्याज हर परिवार प्रतिदिन चूका रहा है. आज क़र्ज़ के एवज़ में गुजरात सरकार प्रतिदिन लगभग ३४.५ करोड़ का ब्याज चुकाती है यानि कि १०३५ करोड़ रुपया महीना और लगभग साढ़े बारह हजार करोड़ सालाना यानि कि अगर गुजरात सरकार अब और क़र्ज़ ना भी ले तब भी प्रति वर्ष उसके क़र्ज़ में १२ हजार करोड़ कि वृद्धि होती है  और साल दर साल वो चक्रवृद्धि व्याज के भंवर जाल में फंसती जा रही है जिससे निकलना शायद ही  भविष्य में कभी सम्भव हो पाए आज कि अर्थव्यवस्था कि मौजूदा स्थिति को देखते हुए.

इस महंगाई के दौर में सब्जी और फलवाले से मोलभाव करने वाला और महंगे दूध और रसोई गैस के आंसू रोने वाला गुजरात का हर औषत परिवार भी महीने में १००० रूपये का ब्याज टैक्स के रूप में चुकाता है जिसकी जानकारी कम ही लोगो को होगी . आज गुजरात के बजट का एक बड़ा हिस्सा ब्याज के रूप में चला जाता है जिसका बुरा असर राज्य कि अर्थव्यवस्था के साथ सरकारी सेवाओं शिक्षा स्वास्थ्य और अन्य बुनियादी सुविधाओं पर पड़ रहा है और शायद यही कारण है कि आज गुजरात में पेट्रोल, बिजली समेत अन्य जरूरी साधन महंगे है साथ ही अगर टैक्स कि बात करें तो गुजरात में वैट कि दर देश भर में सबसे ज्यादा है और यहाँ तक कि कृषि उपकरणों और फ़र्टिलाइज़र पर भी लोगो को वैट चुकाना पड़ रहा है.

अगर यही हाल रहा तो आज के गुजरात के चमक धमक पर पानी कि तरह बहाया जा रहा धन कल के गुजरात को कंगाली के अंधेरों में धकेल सकता है अगर क़र्ज़ के इस भंवर जाल से निकलने का रास्ता अभी से ना निकला जाए अब वक्त आ गया है जब गुजरात के चमक धमक से चौंधियायी आँखों को दर्पण के पीछे के खुरदरे हिस्से कि हकीकत को भी देखने कि जरुरत है.

संजीव सिंह”सागर”

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Photo: http://im.rediff.com/news/2013/apr/04modi1.jpg

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