हम और हमारा लोकतंत्र

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लोकतंत्र की बहुत सी विशेषताओं में से एक यह है कि इसमें लोगों को वह शासन मिलता है जिस के वह योग्य होता है .वह नहीं जिसकी वह मांग करता है .

कोई भी समाज या देश खुले खुले अपनी आलोचना समूह के रूप में बर्दाश्त नहीं करता है .भारतीय समाज भी इसका अपवाद नहीं है .एक पुराना  देश और प्राचीन संस्कृति होने के कारण हम विशिष्ट हैं .

एक ओर हमारे संस्कारों में गहन मानव मूल्य और धार्मिकता  है तो दूसरी और निर्मम पूंजीवाद भी हमारे अंदर है . इन दोनों को हम एक समय में एक ही साथ जीते हैं .इसीलिये भारतीय समाज एक गहरे अंतर्विरोध में जीता है .

भारत में चाहे हम किसी भी धर्म को मानने वाले हों , धर्म यह सिखाता है कि जब तक पड़ोसी  भूखा हो तब तक हम खाना न खाएं .हम मानते हैं क्या ? चोरी करना पाप है .टेक्स  चोरी को कितने लोग पाप मानते हैं ? धर्म शास्त्रों के अनुसार सत्य और न्याय के साथ खड़े होना और उनके लिए जीना और लड़ना भी  धार्मिक होना है . हम कहां खड़े हैं ? हम  झूठे ,ढोंगी ,पाखंडी कहे जाएगें और  हमारी खामोशी और निष्क्रियता तो अत्याचरी को बल देती दिखाई देगी .

2002 और 1984 में हजारों लोग मारे गए . उनको मारने वाले किसी दूसरे ग्रह से नहीं आए थे फिर क्या है कि हम उन चेहरों को पहचान नहीं पाते .देश की सकल आय केवल २०% लोगों के हाथों संग्रहित है और हमारे देश का संविधान प्रकट रूप में कहता है कि हम समाजवाद की व्यवस्था वाले देश हैं .ये किसी समानता है ?

ये कैसा ऋषी मुनियों का प्राचीन महान  देश है जिस में 66 % जनता 40 रूपये रोज पर गुजरा कर रही है .जो अनपढ़ है .जिस के पास दो वक्त का खाना नहीं .सिर पर छत नहीं .समानता और न्याय तो दूर की कौड़ी हैं .इस  महान लोकतन्त्र में उनकी आवाज कहां है ? कहीं नहीं .और इस देश की  धार्मिकता तो ऐसी है कि कुछ लोग धर्म के अनुसार ही सरकार बनाना और चलाना चाहते हैं . भव्य मंदिरों मस्जिदों और  गुरुद्वारों का निर्माण हो रहा है .ढोल नगाड़े पीटे जा रहे हैं .जय घोष हो रहा है .साष्टांग प्रणाम हो रहा है .स्वर्ण  कलश  चढाए जा रहे हैं .मगर स्कूल अस्पताल के लिए पैसा और समय नहीं है .

 अपने ऐसे अनुरागी मगर निष्ठुर भक्तों को भगवान कैसे देखता होगा ? वही जाने . ऐसे भक्तों को क्यों नहीं देवी माँ अपने द्वार पर ही दुत्कार देतीं ? क्यों नहीं ,  अजान के समय ही आसमान से बिजली कडकती और यह ढोंगी वहीं खत्म हो जाता . वो मूर्ख नहीं है . उसे पता है  कि धार्मिक कहानियों में ही ऐसी घटनाएँ घटती हैं  .वास्तव में ऐसा नहीं होता . एक ढकोसला है जो ऐसे ही चलता है .

इसे कोई भी स्वीकार नहीं करेगा .अगर ईश्वरीय न्याय हो तो झूठ बोला तो तुरंत जीभ कट कर के गिरे .गरीब का हक मारे तो हार्ट अटैक आ जाए दूसरों की लड़की को बुरी नजर दे देखे तो अपनी माँ मर जाए .ऐसा होता नहीं . उसके अवचेतन मन को यह पता है .मगर बात वह इसी की करता है . बार बार दोहराता है .नहीं पापी को दंड जरुर मिलेगा . आज नहीं कल मिलेगा .नहीं तो अगले जन्म में मिलेगा .

आज सामान्य जन की धर्म की समझ ही भोथरी है .धर्म संस्थागत हो गया है और वह एक संस्था के रूप में ही व्यवहार कर रहा है . अब वह व्यक्ति या समाज को संस्कार देने की स्तिथि में नहीं है .जब धर्म संस्कार देने की स्तिथि में नहीं है तो यह जिम्मेदारी परिवार समाज और देश पर आ जाती है .

भारत में संयुक्त परिवार अब नहीं रहे .जो एकल परिवार है वह रोजी रोटी के झंझटों से ही बाहर नहीं आ पाता .उसे पता नहीं कि आज रोटी मिल रही है कल मिलेगी या नहीं .व्यपारी भी डरा हुआ है आज व्यपार चल रहा है कल चलेगा या नहीं .पड़ोस का व्यापारी उसे दोस्त नहीं दुश्मन नजर आता है जो उसके व्यपार का हिस्सा खा जाएगा .पड़ोसी का बच्चा उसे अपना नहीं लगता उसे लगता है कि वही पड़ोसी का बच्चा नौकरी में उसके बच्चे का मुकाबला करेगा .वो कमजोर ही रहे तो अच्छा है .

वह डरा हुआ व्यक्ति ,अपनी जाति या समाज को अपने साथ जोड़ लेता है .जिस से वह शक्तिशाली हो सके .वह अपने साथ आए डरे हुए लोगों को यह समझाता रहता है हम सत्ता में आए तो हम सब का लाभ होगा .साथ ही साथ वह अपने प्रतिद्वंद्वी को वर्गों में बांटता रहता है .जैसे हिंदू मुसलमान , अल्पसंख्यक बहुसंख्यक,अनुसूचित जाति अनुसूचित जनजाति , जाट जैन इत्यादि .जिससे सामने वाला लगातार कमजोर हो सके .

इन लोगों के पास देश के समग्र विकास की कोई नीति नहीं होती .ये खुद असुरक्षा से भरे हुए हैं इसीलिए एक राष्ट्रीय दल टी वी पर अपने विज्ञापन में आ कर बतलाता है कि उसने अल्पसंख्यक लोगों के लिए क्या किया है .इसके साथ ही वह अपना नाम भी बतलाता है जिससे स्पष्ट होता है कि वह अल्पसंख्यक किस धर्म  का है .

सभी दल इन बंटे हुए लोगों को जिन्हेंजाति ,धर्म ,अल्पसंख्यक,दलित ,महिला ,पिछड़े ,किसान , मजदूर आदि वर्गों में बांटा गया है एकत्रित हो कर तीसरा चौथा मोर्चा बनाने की योजनाएं बनाते हैं .किसी दल का कोई बड़ा नेता यदि आ कर कह देता है कि अब जाति के आधार पर आरक्षण की बजाय आर्थिक आधार पर होना चाहिए तो उस दल की नेत्री सामने आ कर स्पष्ट कर देती हैं कि नहीं जाति के आधार पर आरक्षण ही जारी रहेगा .क्योंकि कोई परिवर्तन नहीं चाहता .

अपने को  देव पुरषों की  संतान बताने वाले ,महान वैदिक परम्परा का वारिस बतलाने वाले देश के लोग दुनिया के भ्रस्टतम देशों की सूची में छटे स्थान पर हैं .मानव विकास इंडेक्स पर जिसके लोग अति पिछड़े अफ्रीका के देशों से भी पीछे हैं मगर बातें करेंगे  .समानता की .मानवीय मूल्यों की .सर्वे भव् न्ति सुखिनाम की …..वासुदेव कुटम्बकम ….और भी न जाने क्या क्या .

धिक्कार इन्हें नहीं .हमें हैं .यही देश के रूप में हमारा असली चरित्र है . देश के रूप में हमने जो लोकतन्त्र का जो मॉडल चुना है वह परिवर्तन का सबसे धीमा रूप है और एक स्तर पर जा कर तो यह  यथास्थिति वाद को बनाए रखने के लिए  है .इसलिए जरा परिवर्तन देखते ही ,उन्हें अराजकता दिखलाई देने लगती है .अख़बारों के विद्वान संपादक .टी वी पर आये भट्ट विद्वान इस अराजकता से विचलित हो जाते हैं और स्तिथि यहाँ तक बन जाती है कि देश के राष्ट्रपति देश को संबोधित करते हुए कहते हैं कि हमें ऐसी अराजकता से बचाना चाहिए .

स्वाधीनता संग्राम को बहुत दिन नहीं हुए हैं .संग्रहालयों में जाकर पुराने अखबार देख लीजिए .महात्मा गांधी को अराजकता वादी , सिरफिरा ,पागल कहने वाले ब्रिटिश ही नहीं , भारत के बहुत से विद्वान और नेता थे .आज एक पार्टी अपने आप को परिवर्तन का पुरोधा कह रही है तो उस पार्टी का और उसके लोगों का ऐसा विरोध होना लाजिम है

इसी विरोध  से पता चलता है कि वे व्यस्था परिवर्तन की सही दिशा की और बढ़ रहे हैं .अगर ऐसा नहीं होता तो शक होता क्या हम सही दिशा की और बढ़ रहे हैं .सदियों का इतिहास रहा है हम मसीह को पहचानने में गलती करते हैं और उसे पत्थरों  से मारते हैं

कल क्या होगा कोई नहीं जानता .सबसे जरूरी है हम अपने आप को जाने .अपने इस चरित्र को पहचाने .फिर यह हमारे पास यह विकल्प है कि पत्थर मारने वालों में शामिल हों या मसीह के साथ खड़े हों .

अशोक उपाध्याय

 

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