वो जो लोकतंत्र चलाते हैं

हम एक लोकतान्त्रिक देश हैं ऐसा उस संविधान में लिखा है जिसे हमने १९५० में अंगीकार किया था .अगर चुनाव की प्रक्रिया को छोड़ दें तो इस लोकत्रंत में लोक द्वारा किए जाने वाले कुछ ऐसे  काम बतलाएं जो हमारा समाज करता है ?

वह इतना ही करता है कि वह इस तंत्र से संचालित होता है उसमें भी चालीस प्रतिशत ऐसे हैं जो वोट तक डालने नहीं जाते हैं .तो फिर वे कौन हैं जो इस देश के लोकत्रंत को चलाते हैं .आजादी के समय देश की रियासतों का एक होना और एक देश के रूप में भारत का उदय एक घटना मात्र है. वरना कौन जाने , कौन सी रियासत या राज्य या देश किस कानून या संविधान से चल रहा होता .

हमने लोकतंत्र चुना .मगर सच यह है कि इसके अलवा हमारे पास कोई विकल्प ही नहीं था .उस समय राजा महाराजा थे मगर अंग्रजों के समय में इन राजा महाराजों के अंग्रेजों के साथ सम्बन्ध और जनता के साथ सम्बन्ध में आधुनिक इतिहास में विस्तार से नहीं लिखा गया है. उस समय को अंग्रजों का शासन  काल मान लिया गया है . अपवाद के रूप में केवल राजा राम मोहन राय का जिक्र आता है .

देश आजाद होते ही , रियासतों के विलय के बाद ,राजाओं की सम्पतियाँ उन के पास ही रहीं और राज्य के बदले उन्हें प्रिवीपर्स मिलना शुरू हो गया और इससे भी बड़ी बात यह हुई कि ये राज घराने और देश के माने हुए उद्योगपति जो कल तक अंग्रेजों के साथ थे कांग्रेस में कूद गये . और फिर संसद में आ कर देश चलाने लगे .

देश का अपना संविधान बना .क्या संविधान बना ? उसका आधारभूत ढांचा ब्रिटेन का संविधान है .सम्पति ,कानून न्याय .आई पी सी . सब कानून वैसे ही बने रहे .उन्हें केवल भारतीय नाम दे दिया गया . शासन  करने की वही व्यस्था बनी रही केवल उसे चलाने  वाले बदल गए . कहने को उस संविधान में १०० से ज्यादा संशोधन हो चुके हैं मगर मूल संरचना वैसी की वैसी ही है . एक शासक है जो शासन करता है और उसका दूसरा चेहरा है जो इस सब नियंत्रित करता है जिस से यह व्यवस्था चलती रहे .

आजादी के बाद सड़सठ साल से यही व्यवस्था चल रही है .पूंजीवादी व्यवस्था ठीक ढंग से चल सके उसके लिए व्यवस्था में लोकतंत्र ही सबसे उपयुक्त मॉडल है .अमरीका और उसके सहयोगी देश .संयुक्त राष्ट्र .विश्व बैंक सभी लोकतंत्र को लाने और बचाए रखने के लिए सतत प्रयत्नशील हैं .लेकिन विडंबना यह है कि हमने संविधान की प्रस्तावना में अपने लिए समाजवादी लोकतंत्र चुना है .

इस लोकतान्त्रिक व्यवस्था में एक बड़ा परिवर्तन तब हुआ जब हम ने अपने देश को विश्व व्यपार संध (WTO) से जोड़ लिया .इस से हमारे नीति निर्धारण में सीधे सीधे बाहरी दखल होने लगा .और देश का फोकस लोक ( जनता ) से हट कर पूजी और पूंजी निर्माण हो गया .यह अनायास नहीं है कि आज देश के सभी राजनैतिक दल विकास की बात करते हैं . इतना ही नहीं इस विकास पर इतना  बल है कि इस विकास का दुश्मन देश का दुश्मन बताया जाने लगा  है .

किन्तु यही विकास की अवधारणा को पूंजी से हटा कर मानव विकास इंडेक्स से ( खद्यान शिक्षा स्वास्थ्य ) जोड़ दिया जाय तो ये लोग बगलें झाँकने लगते हैं .इन लोगों को इन्फ्रास्ट्रक्चर में पूंजी लगानी है .पूंजी नहीं है .इसलिए बाहर से लानी है .उस पूंजी से पूंजी निर्माण करना है .

यह लोकसभा चुनाव विकास के मुद्दे पर लड़ा जा रहा है .यू पी ऐ हो या एन डी ऐ  विकास को ले कर दोनों की अवधारणा एक जैसी ही है क्षेत्रीय दल भी इन घटकों जैसे ही हैं .किसान .गरीब .सब्सिडी ( साम्प्रदायिकता ,आरक्षण, रोजगार ) की चर्चा केवल इस लिए है जिस से आकर्षित हो कर वे वोट डालने आयें .बस .

अन्यथा क्या कारण है कि चेंबर ऑफ कोमर्स , ऐसोचम के व्यापारी एकत्रित हो कर इन राजनैतिक पार्टिओं से नहीं पूछ रहे हैं कि बजट का सब कुछ इन गरीबों पर ही लुटा दोगे तो देश का और हमारे व्यपार का क्या होगा और न ही देश के बड़े उद्योगपति टाटा बिरला अम्बानी गोदरेज आदि इन पार्टियों या नेताओं से पूछ रहे हैं कि हवाई जहाज से उड़ उड़ कर जन सभा कर लोगों को संबोधित कर रहे हो हमारे लिए क्या नीतियां हैं यह तो बताओ .ये न पूछेंगे और न ही वे बतलाएँगे .

कारण स्पष्ट है चाहे यू पी ऐ आए या एन डी ऐ या गठ बंधन की सरकार , व्यपार तो उसी तरह होना है .चुनाव लड़ने के लिए आखिर पैसे भी तो यही लोग दे रहे हैं फिर अपनी बात क्यों न मनवायेगे . मीडिया हम और आप लोग कह कह कर हार गए कि कौन सा उद्योगपति कितना पैसा किस पार्टी को दे रहा है यह बतला दो .ये नहीं बतलाया तो नहीं बतलाया .

पहले नेता होते थे .फिर बिरला जी की तरह उद्योगपति संसद में आने लगे .फिर नेता ही उद्योगपति होने लगे ( जैसे पावर जी ) फिर पार्टियों ही उद्योगपतियों को संसद में भेजने लगे ( जैसे विजय माल्या ) अब यही उद्योगपति और पूंजीपति अपनी ओर से नेताओं को चुनाव कर भेज रहे हैं . वरना क्या कारण है कि सूचना आयोग के आदेश के बाद भी ये राजनैतिक दल आर टी आई के अंतर्गत आने को तैयार नहीं हैं . अपनी पार्टी को प्राइवेट लिमेटेड कम्पनी की तरह चला रहे हैं और देश को अपनी बपौती मान रहे हैं .

वास्तव में देश में पूंजीपति ,राजसत्ता ,प्रशासन , न्यायपालिका का एक गठजोड़ है जो इस भ्रस्ट व्यवस्था को चला रहा है इस व्ययवस्था को चलाए रखने में इन सब के हित हैं .इस लिए बी जे पी आए या कांगेस यहाँ तक कि कमुनिस्ट भी .इनका कामकाज और व्यपार वैसे ही चलता रहता है .इसीलिए बी जे पी के शासित राज्य में कांग्रेस वालों के काम होते रहते हैं और कांग्रेस वाले राज्य में बी जी वालों के काम होते रहते हैं .ये एक दूसरे को भ्रस्ट कहना ,बाहें चढा कर ललकारना आपको भ्रमित करने के लिए एक नाटक है .

चाहे कोई भी जीते या किसी की भी सरकार बने ,यह सत्ता का गठबंधन हमेशा ऐसे ही चलता है .बस चेहरे बदलते हैं .चुनाव के बाद कुछ सीटों के कम या ज्यादा आने से ,बंटने  वाले लाभ के प्रतिशत में जो परिवर्तन आता है ये लोग उसी को परिवर्तन कहते हैं .

अशोक उपाध्याय

 

 

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