नकली नायकों को गढ़ता समाज

mask 4एक मरते हुए समाज एक लक्षण यह होता है कि उसके पास वर्तमान में अपने नायक नहीं होते हैं .इन नायकों की खोज वह इतिहास में करता है या अपने लिए नकली नायक खोज लेता है .भारतीय समाज ऐसे ही दौर से गुजर रहा है .

बीसवी सदी में भारतीय समाज के पास विवेकानंद थे ,महात्मा गांधी थे , जवाहर लाल नेहरु थे , सुभाषचंद्र बोस थे ,भगत सिंह थे ,सी वी रमन थे ,रवीन्द्रनाथ टैगोर थे .जीवन के प्रत्येक क्षेत्र के लिए वहाँ नायक उपलब्ध था .जिस का समाज अनुगमन कर सकता था .वह उसका प्रेरणा स्रोत था .

देश की आजादी के बाद ऐसे नायकों की कमी हो गयी और पिछले दो दशकों में तो देश के पास कोई नायक ही नहीं है .नव उदारवादी नीतियों में बाजार ही नायक गढ़ रहा है और उन्हें नष्ट कर रहा है . कल तक श्री सुब्रत राय उद्योग रत्न थे जिन्होंने २००० रूपये की पूंजी से व्यपार आरम्भ कर एक विशाल साम्राज्य खड़ा कर लिया .वे सभी राजनैतिक दलों की आँख के तारे खिलाडियों और फ़िल्मी सितारों के चहेते थे .उनके कामों में उद्योग , खेल और देश प्रेम ऐसा घुलमिल गया कि लोग उन्हें इनका संरक्षक मानने लगे .उन्होंने अपने लोगों के लिए प्रणाम करने की एक विधि विकसित कर दी .सहारा प्रणाम .आज कहां हैं ? जेल में हैं .जमानत भी नहीं हो पा रही है .

इसी क्रम में दूसरे हैं श्री विजय माल्या .शराब बनाने वाली विशाल कम्पनी के मालिक .जिनका कारोबार दुनिया के कई देशों में फैला है .देश प्रेम व्यक्त करते हुए वे टीपू सुल्तान की तलवार वापस देश में ले आए .किगंफिशर नाम की एयरलाइन्स खड़ी की .जिस में यह शान से कहा कि इस एयर लाइन्स की एयर होस्टेस का चुनाव मैंने खुद आपके लिए किया है .इस एयर लाइन्स में आप मेरे व्यक्तिगत मेहमान होगें जिस में ये एयर होस्टेस आप का स्वागत सत्कार करेगीं .किसी ने उनकी इस भाषा पर आपति नहीं की .वे नव उद्योग रतन थे .शानदार कैलेंडर छापते थे .उनकी प्रतिभा और देश प्रेम को देखते हुए एक राजनैतिक दल ने उन्हें राज्य सभा में भी भेज दिया .आज एयर लाइन्स डूब गयी सरकारी बैंकों का करोडों रुपया डूब गया .व्यक्तिगत सम्पति नीलम होने की बातें चल रही हैं .अब उनके पुराने संपर्क और दूसरे व्यपार काम आ रहे हैं .

खेल जगत में भी ऐसा ही है .क्रिकेटर सचिन तेंदुलकर को मिलकर भगवान बना दिया .जब तक उसे भारत रत्न नहीं दिलवा दिया चैन से नहीं बैठे .उससे देश को क्या मिला .सेना उससे फायदा उठा सके इसलिए भारतीय सेना ने उन्हें ब्रांड एम्बेसडर बना दिया .मगर वे वहाँ पहुचे ही नहीं जहाँ उन्हें पहुंचना चाहिए था सो सेना ने उन से यह पदवी वापस ले ली .आजकल वे इनर्जी ड्रिंक ,तेल साबुन बेच रहे हैं .

टी वी पर इन्डियन आइडियल खोजे जा रहे हैं .ये आइडल शिक्षा , समाज सेवा या वैज्ञानिक खोज के क्षेत्र में नहीं खोजे जा रहे हैं .सबसे अच्छा गायक कौन हैं ,देश में सबसे अच्छा नर्तक कौन है .कौन सी सबसे अच्छी नर्तक जोड़ी है .बाल कलाकारों में कौन देश का आइडल है यही खोज का विषय है उसे सम्मानित किया जाता है .इन्डियन आइडल टू या थ्री में फिर नए नायक की खोज होती है .

इसी प्रकार देश में हर साल मिस इण्डिया की खोज होती है .सुन्दर लड़कियों की देश भर में खोज होती है .अखबारों में शानदार तस्वीरें छपती हैं टी वी पर लाइव प्रसारण होता है .प्रतिभा और सौंदर्य का अदभुत मिश्रण इनमें बतलाया जाता है .मगर अगला साल आने तक ये सब गायब हो जाती हैं नए चेहरे आ जाते हैं .फिर अगले साल और नए चेहरे आ जाते हैं और हर बार यही कहा जाता है कि इनके जैसा पहले कोई नहीं था .यही सर्वोतम हैं.

गिनिस बुक ऑफ रिकोर्ड की तर्ज पर अब भारत में लिम्का बुक और रिकोर्ड है पहली महिला राष्ट्रपति ,पहला दलित मुख्य न्यायधीश ,पहली महिला सी ई ओ यही उनकी योग्यता है इस लिए दूसरी आते ही पहली गायब हो जाती है .

इसी तरह से आजकल नए नायक है अंतर्राष्ट्रीय मल्टीनेशनल कंपनियों में भारतीय मूल के नागरिकों के सी ई ओ बनने पर उन्हें नायक मान लेना .इस काम में हम ये भी नहीं देखते हैं अब वह आदमी भारत का नागिरक भी नहीं रहा है . कुछ समय बाद वह सी ई ओ दूसरी कम्पनी ज्वाइन कर लेता है या उसकी जगह दूसरे देश का नागरिक आ जाता है .

जब समाज के पास नायक नहीं हैं या वह समाज को नायक देने की स्तिथि में नहीं है तो नायक गढ़ने वाले बाजार में हैं .ये लोग बड़ी बड़ी कंपनियां हैं जो व्यक्ति या संस्था की इमेज बिल्डिग का काम करती हैं .अखबार टी वी और सत्ता के गलियारों में इनकी पहुँच होती है .सोशल मीडिया में भी इनकी पहुँच होती है .ये ही लोग किसी आदमी या कम्पनी को ब्रांड में तब्दील कर देते हैं .उनके पक्ष में हवा बनाते या बिगाड़ते हैं .मोदी जी, रिलाइंस और आई.पी.एल इसके ताजा उदहारण हैं .

महर्षि अरविन्द की अवधारणा के अनुरूप अब महामानव आने या होने की सम्भावना तो कहीं नजर नहीं आ रही है .अब तो बाजार तुच्छ से तुच्छ आदमी को नायक बना के पेश करता है और उसके साथ खेलता है फिर अपने काम को आगे बढ़ाने के लिए नए नायक घड़ लेता है.

समाज में यह नायक हीनता की स्तिथि पूरे संसार में है किन्तु भारत में यह रिक्तता अधिक दिखाई देती है .मानव के विकास के लिए उसके सामने उसका नायक होना जरूरी है .बचपन में बालक के लिए उसके माता पिता या गुरु उसके सहज नायक होते है और जैसे जैसे उसका विकास होता है वह जीवन पथ पर अपने लिए नायक खोजता चलता है . और महात्मा बुध के अनुसार सबसे आदर्श स्तिथि वह है जब वह अपने लिए बाहर नायक न खोज कर स्वयं ही अपना नायक बन जाता है .( अप्पो दीप भव )

किन्तु किसी व्यक्ति या समाज के लिए कोई नायक ही न होना या किसी और द्वारा छद्म से गढे गए व्यक्ति को नायक स्वीकार कर लेना एक विस्फोटक स्तिति है दुर्भाग्य से हमारी यही स्तिथि है .यह एक पतन शील समाज का लक्षण है और अगर हम यह जान लें और समझ लें तो इस से निकलने का रास्ता भी देर सवेर निकल ही आएगा .

ए उपाध्याय

 

 

 

 

 

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