गंगा जल का ए टी एम

p5बनारस में गंगा की इतनी बात हो रही है कि काशी अधिपति शिव भी सोच रहे होंगे कि अब कि इस बार तो गंगा का उद्धार हो ही जायेगा .पतित पावनी गंगा फिर फिर पावन हो जायेगी . कोई गंगा को जीवन दायनी कह रहा है .कोई उसे माँ कह रहा है .कोई गंगा को बुला रहा है तो किसी को गंगा बुला रही हैं .

आज तक ये लोग कहां थे ? बनारस की जीवन दायनी गंगा के जल में आक्सीजन की इतनी कमी हो गयी है कि अब मछलियाँ इस में जिन्दा नहीं रह सकतीं .पूरे देश में गंगा की सफाई के नाम पर अरबों रूपये खर्च हो गए .विश्व बैंक और जापान सरकार से कर्ज ले कर सफाई की योजनाएं बनाई गयीं मगर हालत ये है कि भद्रजन गंगा जल से आचमन नहीं करते अपने साथ बीस रूपये की पानी की बोतल रखते हैं .

भारत के लोगों कि आँखों पर इतना पर्दा पड़ा है कि वे देख ही नहीं पा रहे हैं कि सरकार कि नव उदारवादी नीतियों में अब सब कुछ उसे ही मिलेगा जो उसका मूल्य चुका सकेगा .आसानी से बिना मूल्य सब के लिए उपयोग के लिए जल उपलब्ध हो यह सरकार का लक्ष्य कहां है ?

सरकार चाहे वह किसी भी दल की क्यों न हो जल और उसके प्रबंधन को वह निजी हाथों में देती जा रही है . नदियों के पानी पर ,महानगरों के पानी पर ,उसके संशोधन और वितरण पर निजी कंपनियों का कब्जा है जो अपने लाभ के लिए इस व्यापार में उतरे हैं . फिर चाहे वह राजीव गांधी राष्ट्रीय पेयजल योजना हो या राज्य सरकारों की पानी योजनाएं .सभी में निजी क्षेत्र की भागीदारी है और सरकारों के पास इन योजनाओं की उपलब्धि के रूप में बतलाने के लिये यही आंकड़ा है कि इस योजना में अब तक कितना रुपया खर्च हुआ है .

अब इसी निजी क्षेत्र से सहयोग कर दिल्ली के उप राज्यपाल श्री नजीब जंग ने दस जगह पानी के ए टी एम लगवा दिए हैं .ये पानी के ए  टी एम पुनर्वास बस्तियों में लगाये गए हैं जहाँ अब तक टेंकरों से पानी सप्लाई किया जाता था  .इन मशीनों पर ३० पैसे प्रति लीटर के दर से ग्राहक के बर्तन में पानी उपलब्ध करवाया जाएगा .ग्राहक एक बार में अधिकतम २० लीटर पानी ले सकता है .पानी लेने के लिए ग्राहक को बैंक के ए  टी एम की तरह एक कार्ड खरीदना पडेगा जिसे मोबाइल की तरह रिचार्ज किया जा सकता है .जिस तरह ए  टी एम पर कार्ड स्वीप कर पैसे निकलते हैं उसी तरह अपना कार्ड स्वीप कर पानी निकलता है .

इस योजना को सर्वजल का नाम दिया गया है वेब साईट पर दी गयी जानकारी के अनुसार इस योजना में दिल्ली सरकार के साथ ,दिल्ली परिवहन निगम भी इसमें भागीदार है .इस योजना को पिरामल वाटर प्राइवेट लिमिटेड चला रहा है जो लाभ कमाने के लिए बनाई गयी कम्पनी है .यह कम्पनी सन 2008 से इस व्यपार में है दूसरों अपनी फ्रंचईज भी बेचती है जिस में लाभ की हिस्सेदारी 60 और 40 प्रतिशत की होती है .

ऐसा नहीं है कि यह काम दिल्ली में हो रहा है मुंबई में एक्वाटेम के नाम से वंदना फाउन्डेशन, एक रुपए प्रति लीटर की दर पर और कर्नाटक में १० पैसे प्रति लीटर की दर से यह पानी मशीनों से बेचा जा रहा है .यानी सभी जगह पानी की दर अलग अलग है .

अब किसी भी दिन पानी का मुफ्त सरकारी टेंकर आपकी कालोनी में नहीं आएगा तो आप सरकार की इन मशीनों से अपनी जरूरत का पानी खरीद सकते हैं फिर सोचने की बात यह है कि पानी की मशीन से पानी बेचने वाले आपके नलों में और मोहल्लों में मुफ्त पानी टैंकर क्यों आने देंगे और वे मुफ्त क्यों भेजेंगे .

आज से दस साल पहले तक की सरकारें पानी का बिल लेने में सकुचाती थीं .पानी तो प्रकृति ने सब को दिया है ऐसे में सरकारें कहती थी कि पानी को साफ़ करने और आप के घर तक पहुँचाने का जो खर्चा है वह आपके पानी का बिल है .अब तो सरकार सीधे सीधे पानी बेच रही है और अब तो एक कदम आगे बढ़ कर उनसे बिकवा रही है जो लाभ कमाने के लिए इस धंधे में हैं .

ध्यान दें ये नव उदारवादी सरकारें ,जो निजीकरण से विकास का सपना बेच रही हैं .हाशिए पर खड़े लोंगों पर ,वंचित गरीबों पर गोली नहीं चलवायेंगी ये ऐसी व्यवस्था खड़ी करेंगी जिस से ये आदमी केन्द्र से नजर से ओझल हो जाए .ऐसी व्यस्था होगी जिस में पानी तो होगा लेकिन वही उसे खरीद सकेगा जिस में उसे खरीदने की क्षमता होगी .

आरम्भ में उसे घटी दरों पर पानी दिया जाएगा .फिर उसका कोटा निश्चित कर दिया जाएगा उसके बाद बिजली के बिल की भांति उपभोग की सीमा निर्धारित कर सब से अलग अलग दरों पर पैसा लिया जाएगा .जिस के पास पानी खरीदने के लिए पैसा नहीं है उसके लिए पानी भी इस दुनियां में नहीं है .

यह पानी पर कितना बड़ा हमला है हमारे धूर्त राजनेता और नीतिकार इसे समझते हैं वरना सोचिये जहाँ छोटी सी योजना का उदधाटन जोर शोर से होता है और उदघाटन कर्ता के नाम का पत्थर वहाँ लग जाता है वह योजना इतनी खामोशी से क्यों लागू की जा रही है .कोई इस का श्रेय लेने तक को सामने आने को तैयार नहीं है .

और हमारी व्यवस्था ऐसी है कि अगर हम आगे बढ़ कर इन पानी बेचने वाली मशीनों को तोड़ दें तो जेल जायेंगे और सड़क पर खडें हो कर अपने लिए अपने जानवरों के लिए और अपने खेतों के लिए पानी मांगे तो तो भी पुलिस के डंडे लाठी और गोली खायेंगे .सरकार तो निर्बाध रूप से अपना काम कर ही रही है .सरकार के इस विकास पर लोगों का क्या मत है जल्द ही पता चल जाएगा .

अशोक उपाध्याय

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