खाने की (सफल) राजनीति Amma Unavagams

2शुश्री  जयललिता जी दो सबसे बड़ी उपलब्धियां गिनायी जा सकती हैं वे हैं सस्ती दरों पर जनरिक दवाओं को बेचने के लिए बने स्टोर और दूसरी बड़ी उपलब्धि है अम्मा की किचन । यह राज्य  सरकार की अपनी योजना है जिस में एक रुपए में इडली संभार ,तीन रुपए मे लेमन राइस और पाँच रुपए में पोंगल उपलब्ध करवाया जाता है ।

जब यह योजना शुरू की गई थी तो नव अर्थ शास्त्रियों ने बहुत छाती पीटी थी ।मगर तमिल नाडु की सरकार ने नगर निगम और ऐन जी ओ की सहायता से इसे शुरू कर दिया .आज यह योजना तमिलनाडू के 200 केन्द्रों मे चल रही है ।जिस के अंतर्गत किचन में सुबह 7 बजे से रात 9 बजे तक साफ सुथरे वातावरण में स्वच्छ खाना परोसा जाता है ।अब राज्य सरकार ने इसमें रोटी भी जोड़ ली है जो 3 रुपए की होती है यह  शाम 5 बजे से 9 बजे तक सब्जी के साथ परोसी जाती है ।इस सब में राज्य सरकार का केवल 18 करोड़  रुपया खर्च होता है .राज्य सरकार अब इन केद्रों की संख्या को बढा  कर एक हजार करना चाहती है जिससे पूरे राज्य में इन भोजनालयों का जाल फैल जाय .

मेहनत कश लोगों के साथ साथ अब बड़ी संख्या में माध्यम वर्ग के लोग और महिलाऐं भी इन साफ़ सुधरे भोजनालयों में आते हैं .आधुनिक किचन में , सिर के बालों को टोपी से ढके ,दस्ताने पहने हाथों से खाना परोसा जाता है .पीने के लिए आर ओ वाटर है .साफ़ सफाई को प्रोत्साहित करने के लिए लोगों को हाथ धो कर खाने का अनुरोध किया जाता है . दिल्ली में पोंगल पर्व के अवसर पर अम्मा की किचन तमिलनाडु भवन में खोली गयी थी .दिल्ली की इतनी जनता वहाँ पहुँच गयी कि समय से पहले ही सारा खाना खत्म हो गया .

इस के मुक़ाबले में आप रेलवे में खाना देने वाली आई आर सी टी सी को देखें ।इतना मंहगा और बेकार खाना की लोग अपने घर से खाना ले जाना पसंद करते हैं । और अब रेलवे भी खुद खाना नही बनाता ।उसने यह काम ठेकेदारों को दे दिया है जो अपने लाभ के लिए रेलवे में खाना बेचते हैं  ।भारत सरकार का रेलवे मंत्रालय ठेके की कमाई से ही खुश है ।

तमिल नाडु मे इस योजना की सफलता और लोगों की प्रसन्ता  को देखते हुए दिल्ली की सरकार ने  भी 15 रुपए में खाना देने की योजना बनाई थी ।जिस दिल्ली के नेता गर्व से बतलाते हों कि  यहाँ 5 रुपए मे भरपेट खाना मिल जाता है ।वो इसे क्या चलते ।नाम के लिए यह आज भी चल रही है। मगर असफल ।

केंद्र सरकार और राज्य सरकारों ने स्कूलों में मिड डे मील योजना शुरू की है जिस में स्कूलों में बच्चों को दोपहर का खाना दिया जाता है ।स्कूल मास्टर और सरकार भी इसे बेमन से सरकारी मान कर चला रहे हैं.

लेकिन तमिलनाडू की सफलता इतनी बड़ी है की अब कर्नाटक और राजस्थान की सरकार इस योजना को अपने राज्य में शुरू करना चाहती है.

जो सबसे दुखद बात है वह यह है की केंद्र और राज्य की सरकारें खाद्य सुरक्षा बिल पर तो चर्चा करती हैं ।मगर उसमें व्याप्त भ्रस्टाचार और अव्यवस्था को नहीं देखती हैं ।अभी हाल में , केंद्र सरकार के अपने ऑडिट मे यह सामने आया है कि सरकार को एक रुपए  का अनाज गरीब तक पहुचने में  3 रुपए 75 पैसे खर्च करने  पड़ते हैं । सरकार इस योजना के भ्रस्टाचार को नहीं रोकना चाहती ।ऐसा लगता है कि भ्रस्टाचारियों का पेट भरने के लिए ही ये योजना चलाई जा रही है ।

विचार करने का विषय यह है किसी भी देश या राज्य की यह जिम्मेदारी  है कि  उसके नागरिक स्वस्थ और हृष्टपुष्ट हों ।यदि नागरिक स्वयं स्वास्थ्य वर्धक खाना नहीं खा सकते तो राज्य  की ज़िम्मेदारी है की वह अपने नागरिकों को ऐसा खाना उपलब्ध करवाए  ।राज्य सरकारें  वैसे भी तो  किसानों को ,उद्योगपतिओं को करोड़ों अरबों रुपए  की सहायता  और सब्सिडी  देती हैं  ।

यदि देश के नागरिकों को भर पेट स्वास्थ्य  वर्धक खाना मिलता है तो इससे देश ही शक्तिशाली और रोग मुक्त होगा । यदि कम दाम पर अच्छा खाना उपलब्ध होगा तो सब उसे खाना पसंद करेंगे । सोचिए हर घर में महिलाओं का कितना श्रम और समय परिवार और देश को उपलब्ध होगा । फिर सब्सिडी  वाला खाना हमारे लिए समानता की बात ही तो  है .और इस में शर्म कैसी .आखिर सब्सिडी  भी तो हमारा ही पैसा है जो सरकार हमें  देती है। जब उच्च कोटी का खाना कम दाम पर उपलब्ध होगा तो खाने के व्यपारियों को भी अपने दाम कम करने पड़ेंगे.

यह बात हमें  और आप को तो समझ आती है मगर 7000 रूपये  की एक प्लेट और संसद की केंटीन में  12 रुपए में  चिकन तंदूरी खाने वाले कर्ण धारों को नही आती है ।

अशोक उपाध्याय

 

 

 

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