कोई दीवाना कहता है

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बस इतिहास रचा ही जाने वाला है  7 मई 2014 ,बुधवार  को अमेठी में वोट डाले जायेंगे और 16 मई को परिणाम आ जाएगा .क्रांति के गीत गाने वाला ,अपने प्रेम से आकाश में इन्द्रधनुष खींचने वाला साहित्यकार जब समर में कूद पड़ता है तो क्या होता है यह देखना बाकी है.

प्रेम और क्रांति पर गाल बजाने वाले साहित्यकार तो ढेरों भरे पड़े हैं मगर अपने मूल्यों पर खड़े होने वाला उनके लिए संघर्ष करने वाला बहुत दिन बाद मैदान में आया है .

अमेठी की जनता अपने वोट के जरिये जो करेगी वह तो कुछ दिन बाद  सामने आ ही जाएगा .मगर साहित्य जगत में ऐसा सन्नाटा यह बतलाता है कि यह समाज सन्नाटे में ही जीता है

साहित्य को समाज  का दर्पण कहने वाले न तो आजकल साहित्य पढते हैं और न ही दर्पण देखते हैं बस अपना हित और मलाई देखते हैं .फिर यह कैसा समाज है .मक्कार और धोखेबाज .लिख कर अच्छा नहीं लग रहा है लेकिन यही सच लग रहा है .

किसी राजनैतिक दल ने यह हिम्मत ही नहीं कि वे किसी साहित्यकार को टिकट देकर देखते .उन सब के यहाँ ये सब  सजावट की चीज हैं  उन्हें तो बाद में राज्य सभा में पहुँचाया जाएगा .कला और साहित्य अकादमियों का सचिव बनाया जाएगा .

समाज में और संचार माध्यमों में साहित्यकार के प्रति कितना सम्मान है यह उनकी रिपोर्टिंग में दिखलाई पड़ रहा है .मगर तब भी कोई है जो अमेठी की जमीन पर एडियाँ रगड़ रहा है इस उम्मीद और जिद्द में कि पानी इसी जमीन से निकलेगा .

इतिहास बन रहा है और हमें कभी न कभी ,किसी न किसी को तो बतलाना ही पड़ेगा कि उस वक्त हम कहां थे और क्या कर रहे थे .

अशोक उपाध्याय

 

 

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