कान में फूल ( कर्णफूल )

f1एक देश में एक राजा था .राजा का नाम सर्वकर्मा और देश का नाम स्वर्ण पुरी था .तो कहानी ऐसे शुरू होती है एक समय स्वर्णपुरी में सर्वकर्मा नाम का राजा राज करता था .बहुत विशाल देश था स्वर्णपुरी .एक ओर लंबी पर्वतमाला थी तो बाकी तीनों तरफ विशाल समुद्र था .

प्रजा फटेहाल थी. मगर खुशहाल थी किन्तु राजाओं को लगता था कि उनके पास सम्पति कम है इसलिए वे एक दूसरे पर हमले करते रहते थे एक दूसरे को पराजित करते और फिर खुद पराजित होते .इस सब से जनता पर कोई असर नहीं पड़ता था वह हमेशा की तरह मस्त रहती थी .

कथा का नायक सर्वकर्मा ,राजपरिवार से नहीं आया था .राजधानी में राजमहल पथ पर उसकी चने बेचने की दूकान थी .ये उनकी पुस्तैनी दुकान थी .दुकान के अंदर ही भाड़ थी .आने जाने वालों को चने बेच कर अच्छी आमदनी हो जाती थी .

बालक सर्व कर्मा महल में आते जाते घुड़सवार सैनिकों को ,परेड करते जवानों को और राजकुमारों की आती जाती सवारी को देखता था तो सोचता था कि एक दिन वह भी राजमहल में प्रवेश करेगा .वहाँ नायक या घटनायक या मंत्री बनेगा .यह विचार आते ही उसने अपने भुने चनो में मसाला मिलाना शुरू कर दिया . अब वह दुकान पर खड़े हो कर चने नहीं बेचता था .गा बजा कर .घूम घूम कर चने बेचने लगा .

चने तो उसके मसालेदार हो गए थे उससे भी ज्यादा उसका गला मघुर था .क्या गाता था .चने का क्या सुन्दर बखान करता था . चने खरीदने और खाने वालों की ऐसी तारीफ़ करता कि समझना मुश्किल था कि लोग उसके चनों के दीवाने हैं या उसकी गीतों के . ऐसे ही उसकी दुकान चल निकली .एक रात उसने पास के चने वाले की भाड़ फुडवा दी .कुछ दिन बाद एक दूसरी भाड़ का अधिग्रहण कर लिया .इस तरह राज महल पथ के बाहर चने के व्यपार पर उसका कब्जा हो गया .

मगर सर्व कर्मा की नजर चने के व्यपार पर नहीं राजमहल पर थी .एक दिन अन्य कहानियों की तरह उसकी खबर भी राजा के मंत्री सूर्यसेन के पास पहुँची .मंत्री ने उसे अपने पास बुलवाया .दोनों ने एक दूसरे के गुण पहचाने . और उन्होंने सर्वकर्मा को मंत्री बनवा दिया .

सर्वकर्मा अब मंत्री हो गए .मंत्री होते ही राजकाज समझने लगे . राजा का विश्वासपात्र बनते ही उन्होंने व्यपारियों से सीधे कर वसूली शुरू कर दी जिससे राजकोष में आय बढ़ने लगी .जो उनकी योजनाओं में बाधा डालता था उसे राज्य का शत्रु माना जाता .शहर कोतवाल उनके इशारे पर तुरंत ही उसका न्याय कर देता था .इस त्वरित न्याय से अपराधी कम हो गए .राजा और व्यपारी दोनों खुश थे .प्रजा तो चने के गाने सुन कर कर ही खुश थी .

सवर्ण पुरी में सब ठीक ठाक था मगर एक दिक्कत थी कि लोग कहते थे राजा अपनी बुद्धि से कम रानी के कहने अधिक चलता था .सर्वकाम को यह पता चलते ही उसने इस बात को अपने गीतों में ढाल दिया .अब सब जगह राजा के नाकारा होने का गीत बजने लगा .सड़क चौपाल चौराहे सभी जगह यही बात होती नाकारा राजा , नाकारा राजा .लोग यह भी कहते हैं कि सर्वकर्मा ने अपने चनों में अफीम का पाउडर मिला दिया है .इसलिए लोग नशे में रहते हैं और रामधुन की तरह नाकारा राजा , नाकारा राजा गाते हैं .

एक दिन ,इसी नाकारा राजा नाकारा राजा की धुन गाते हुए लोगों की भीड़ राज महल में घुस आई और राजा रानी को तख़्त से उतार कर सर्वकर्मा को राजा बना दिया .कहने वाले कहते हैं वे उन्मादी भीड़ सर्वकर्मा के व्यपारी दोस्तों ने पैसे दे कर भेजी थी .जो भी हो सर्व कर्मा , राजा सर्वकर्मा हो गया जिसका सवर्ण पुरी एकछत्र राज था .

राजा बनते ही उसने अपने व्यपारी मित्रों को ,राज्य में हिस्सेदार बना लिया .यह अनोखी योजना थी .इसमें लाभ ही लाभ था उसके व्यापारी मित्रों का लाभ था उनके लाभ में सर्वकर्मा का लाभ था हानि होती तो जनता की .जो अफीम खाए गीत गा रही थी .

राजा बनने कर कुछ माह के बाद सर्वकर्मा ने विदेश यात्रा की ठानी और वह अपने मित्रों को साथ ले कर दूर दूर के देशों में घूमा .वहाँ के राज महल देखे ,संग्रहालय देखे ,मेले देखे ,संगीत सुना .वहाँ के लोगों से मिला और तीन माह में वापस अपने वतन वापस लौट आया .

विदेश लौट कर आने पर सर्वकर्मा उदास रहने लगा .उसे लगने लगा कि वह तो गरीब फटेहाल देश का राजा बन गया है .विदेश में लोग पहचानते तक नहीं थे .उसे लगा कि वह राज परिवार से नहीं है इसलिए लोग उसे पहचानते नहीं हैं जो थोड़े बहुत उसे मिले उनको उन्होंने अपने देश में आने का निमंत्रण दिया तो उन्होंने कहा उन्होंने कहा कि आप का राज्य गन्दा है हम वहाँ नहीं आयेगें .वह गन्दा प्रदेश है .बस यही बात उसके हृदय में शूल सी चुभ गई .

अब वह अपने महल के बाहर प्रातकाल घूमने जाता तो सड़क किनारे शौच के लिए बैठे लोगों को देख कर उसका मन घृणा और करुणा से भर जाता था .जब वह वहाँ से गुजरता था लोग अपने कर्म से उठ कर उसे सलाम करते . उसे सलाम करते कुछ उसकी जयकार करते .उनके इस प्रयास में उनके अधोवस्त्र भी कभी कभी नीचे गिर जाते .उसने तय कर लिया कि वह देश के हर नागरिक के लिए शौचालय बनवा कर रहेगा .मगर दिक्कत यह थी कि नगर में कोई अपने घर के आस पास उनके लिए शौचालय नहीं बनाने दे रहा था .फिर नगर में शौचालय कहां बने ?

बहुत विचार कर मंत्री परिषद ने मिलकर फैसला किया कि ये विदेशी तकनीक से बने उत्तम शौचालय शहर से पांच किलोमीटर दूर बंजर जमीन पर बनवाए जाएँ .शिक्षा और स्वास्थ्य का बजट काट कर शौचालय निर्माण में लगा दिया .वहाँ जाने के लिए के एक्प्रेस हाई वे बन गया .जिसमें दो टोल नाके थे. सुबह चार बजे से ही बसें वहाँ जाती थीं .स्मार्ट कार्ड और आँख की पुतली की पहचाने करने पर ही शौचालय का दरवाजा खुलता था .अंदर देश भक्ति के गीत बजते थे .सब चकाचक था .

नागरिक बहुत खुश थे .उनका स्मार्ट कार्ड बन गया था जिसे दिखा कर वे शहर में घुस सकते थे वहाँ काम कर सकते थे .बस शौच के लिए वहीं पांच किलोमीटर दूर जाना होता था .एक सप्ताह बाद अचानक पछिया हवा चलने लगी .जिसमें बहुत बुरी गंध थी .गंध से राजा प्रजा सब परेशान हो गए .

राजा ने खोज की तो पता चला कि यह गंध नए बने शौचालयों से आ रही है .ये शौचालय उत्तम विदेशी तकनीक से बने थे इसलिए इनमें पानी का प्रबंध नहीं था .अब वहाँ पानी का प्रबंध तो नहीं क्या जा सकता था .लोगों के दुःख से दुखी राजा ने शहर के चारों ओर ऊँची दीवार चिनवा दी .मगर उससे भी हवा में बदबू कम न हुई .

लोग नाक पर रुमाल बाँध कर रहने लगे .शहर के लोगों ने एक नए वस्त्र का अविष्कार कर लिया था इसे नकबंध कहा जाता था .इसे नाक पर पीछे से बाँधा जा सकता था .महिलाओं के लिए रंग बिरंगे नाक पर लटकाने वाले नकबंध थे .सबसे अधिक प्रचलित सर्कस जोकरों द्वारा नाक पर पहने जाने वाले लाल गेंद जैसा एक यंत्र था जिसे नाक पर लगया जाता था इसे राजा के मित्र उद्योग रत्नों ने विकसित किया था कहा जाता था कि यह बदबू तो रोकता ही है साथ ही हवा को शुद्ध भी करता है .यह बहुत मंहगा यंत्र था . प्रजा इसे नहीं खरीद सकती थी .यह देख कर राजा फिर दुखी हो गया .

इस बदबू को रोकने के राजा को वेद पुराणों से लेकर नवीनतम तकनीक की जानकारी राजा को दी गई .मगर सब प्रयोग के स्तर पर ही असफल हो गईं .इन असफलताओं से राजा और ज्यादा दुखी हो गया दुःख में उसने दही और मक्खन खाना भी छोड़ दिया जो उसके देश की पहचान थी .तब अपने दूर देश के एक राजा ने ,जो राजा सर्वकर्मा का मित्र था अपने देश की एक कम्पनी केंसेंतो को अपने मित्र की मदद करने के लिए स्वर्ण पुरी भेज दिया .

केंसेंतो कम्पनी ने सभी सभी फूलों के गुणों को मिला कर एक फूल विकसित किया था .उसमें सभी फूलों के मिलीजुली सु गंध थी .जब केंसेंतो कम्पनी के लोग अपना वे फूल लेकर दरबार में आए तो एक फूल की महक से ही पूरा दरबार महकने लगा .कम्पनी के लोगों ने उन्हें बतलाया कि राजा के नाम सर्व कर्मा पर ही उन्होंने इस फूल का नाम सर्व पुष्प रखा है .राजा को इस फूल में उम्मीद की किरण दिखाई दी .

उसने इस फूल को उगाने के लिए अपने अनाज के खेत दे दिए . अपनी गंध में ये पुष्प सभी परीक्षण में पास हो गए .राजा ने अपने मित्र को धन्यवाद भेजा और अपने राज्य का पश्चिमी क्षेत्र का एक टापू नौसैनिक अड्डा बनाने के लिए उपहार में दे दिया .

इन नए फूलों को पा कर सभी गदगद थे अब प्रश्न यह था कि इन नए फूलों को कहां रखा और लगया जाय .इस पर प्रजा से राय मांगी गई .कमेटियां बनाई गईं .इन्हें कई स्थानों पर टोकरों या गुलदस्तों में रखने में रखने पर इनका रख रखाव कौन करेगा यह समस्या था .राजा सर्वकर्मा की यह घोषित नीति थी कि अब सरकार ज्यादा कुछ नहीं करेगी .हर काम में प्रजा को भागीदारी करनी होगी .

कमीज , कुर्ते की जेब में या पर्स में रखने पर इस फूल की खुशबु कम हो जाती थी .फिर फैसला हुआ कि कोट के बटन पर टांग लिया जाय .फिर महिलायें क्या करेंगी .यह सवाल था .महिलाएं अपने सिर के बालों में लगा लें तो गंजे पुरुष कहां लगायेगें , यह सवाल था . समानता जरूरी थी .अंत में फैसला हुआ कि उसे कान में मुनीम जी की कलम की तरह खोंस लिया जाय जिसमें फूल सामने की ओर उसकी डंडी पीछे की ओर होगी .

सर्व पुष्प के प्रभाव को जांचने के लिए राजा सर्वकर्मा के दरबार में ही परीक्षण आयोजित किया गया .जिस से राजा और दोनों को इस पर पूरा विश्वास हो जाय .एक आदमी को दरबार में ही राजा की आज्ञा से शौच करने का आदेश दिया गया .चमत्कार हो गया .शौच हो गया .किसी को दुर्गन्ध नहीं आई .सब ने खुशी में ताली बजाई और स्वर्ण पुरी के राष्ट्र गीत के साथ सभा समाप्त हुई .

राजा सर्वकर्मा प्रसन्न रहने लगा .अब उसके देश में सभी लोग कान में नया फूल सर्व पुष्प लगाए रहते थे .सारे देश में सुगंध ही सुगंध थी .सभाओं में पेट की हवा निकलने को अब अशिष्ट नहीं माना जाता था क्योंकि अब बस आवाज आती थी .दुर्गन्ध का नाम औ निशान नहीं बचा था .

राजा सर्वकर्मा अपनी सफलता से गदगद था .लोगों को भी लगने लगा कि अगर राजा यह करवा सकता है तो कुछ भी करवा सकता है. डर के मारे लोगों ने अपराध कम दिए .वैसे भी राजा ने नए नियम बनाए थे जिन के अनुसार कल तक जो अपराध थे अब अपराध नहीं बचे थे .जिसके कारण देश के आरक्षि दल ( पुलिस ) की आय कम हो गई थी .

आरक्षि दल की अतरिक्त आय का मुख्य स्रोत रूपजीवा स्त्रियों की बस्ती थी .नए कानून के अनुसार यह एक वैध व्यपार हो गया था . जिस की आय पर १५% कर देना जरूरी था .जो कर देती थी उन्हें संरक्षण देना आरक्षि दल का काम हो गया था .इस व्यपार से पर्यटन को बढ़ावा मिलता था जो कि सवर्ण पुरी की आय के लिए राजा सर्व कर्मा ने जरूरी बतलाया था .कोतवाल नीति सिंह को यह नया नियम पसंद न आया .कल तक वह नगर वधु शीलवंती ( शीला) के भवन से मासिक आय प्राप्त करता था अब बिना पैसे लिए उसे सुरक्षा देनी पड़ रही है .धिक्कार है ऐसी कोतवाल की नौकरी पर .यह विचार आते हुए उसने एक योजना बनाई .

कोतवाल ने शीलवंती के भवन के खिड़की दरवाजों पर दूर देखी यंत्र लगवा दिए .अब वह उसके कामों पर नजर रखने लगा . एक दिन उसकी मुराद पुरी हो गई शीलवंती अपनी विदेशी ग्राहक के साथ एक नयनाभिराम कामुक मुद्रा में थी .परम रमणीय दृश्य था वह .मगर हत भाग्य .तभी शीलवती का कर्णफूल ( कान में लगया हुआ सर्व फूल) नीचे गिर गया . इशारा पाते ही कोतवाल के सिपाही अंतपुर में पहुँच गए और शीलवंती को फूल न पहनने के अपराध में गिरफ्तार कर लिया .अब स्वर्णपुरी में कान में फूल न पहनना राष्ट्र द्रोह के समान अपराध था .जानकार बतलाते हैं कि कोतवाल ने शीला से एक लाख स्वर्ण मुद्राएं ले कर उसे छोडा था .

इसी तरह भरे बाजार में बजरंग ने कबीर दास को चाक़ू मार दिया .कबीर दास चाक़ू लगने से मर गया .मामला न्यायालय में पहुंचा .सब ने देखा था कि बजरंग ने कबीर दास को चाक़ू मारा .मगर काबिल वकील स्वामी जी ने साबित कर दिया कि लड़ाई शुरू होते समय तो दोनों ने कानों में फूल पहने हुए थे किन्तु जिस वक्त कबीर को चाक़ू मारा गया जिस से उस की जान गयी उस वक्त उसने फूल नहीं पहना हुआ था .अत अब हत्या के शेष कारणों को जानने की जरूरत नहीं है जिस ने फूल नहीं पहना .वह राज द्रोही है .उस की हत्या अपराध नहीं है अत बजरंग को हत्या के आरोप से मुक्त किया गया और वह आरोप मुक्त हो गया .

सवर्ण पुरी के गरीब लोगों को पहले खाना कम मिलता था मगर वे मस्त रहते थे .खुशी में गीत गाते थे और दारु पीकर नालियों में गिर जाते थे अब वे नालियां ही नहीं थीं .मल मूत्र के लिए अपना सर्व स्मार्ट कार्ड लेकर ,बस से पांच किलोमीटर दूर जाना पड़ता था .कुछ खाना कम मिलने से और कुछ राजा के डर से अब लोगों के शौच भी कम आता था .नई व्यवस्था में अब शौचालय प्रयोग करने पर स्मार्ट कार्ड से २५ मुद्राएँ कट जातीं थीं .स्वर्णपुरी के वार्षिक समारोह में इस बार देश को दुर्गन्ध मुक्त करवाने के लिए शौचालय बनाने वाली कम्पनी जी एम एस और सर्व पुष्प बनाने वाली कम्पनी केंसेंतो को देश रत्न का सम्मान और देश का पश्चिमी भाग १०० वर्षों पट्टे पर दे दिया गया .

सब और राजा सर्वकर्मा की जय जयकार हो रही है .सवर्ण पुरी में चारों ओर से स्वर्ण बरस रहा है .सब के कानों में सर्व फूल लगा है . घर , दुकान , बाजार , विद्यालय ,अस्पताल सब जगह , सब ने अपने कानों में सर्व पुष्प लगा रखा है . केंसेंतो कम्पनी ने कहा है उसके सर्व पुष्प का अगला वर्सन अदृश्य होगा .

सुबह हो गई है .मैं उठ बैठा हूं और अपना सर्व पुष्प खोज रहा हूं

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